‘‘उसका नाम सुकुमार सोनी है.’’ निराली की कांपती आवाज़ में ज़रा सी निराशा घुल गई, ‘‘उन लोगों से एक बार मिल तो लीजिए. कोई कमी लगे तो मना कर देना.’’
‘‘अपना मोबाइल दो.’’ सख्ती से आदेश देकर आरती ने मोबाइल ले लिया, ‘‘किसी सोनी-फोनी को घर बुलाने की ज़रूरत नहीं है और तुम भी उस लड़के को भूल जाओ.’’
रविवार की सुबह घर में युद्ध के बाद की शांति पसरी हुई थी. जयेश हाथ में अख़बार पकड़े सोफे पर बैठे थे. अट्ठावन साल की उम्र में आंखों की रोशनी अडिग थी, फिर भी एक भी अक्षर समझ में नहीं आ रहा था.
उनकी पत्नी आरती रसोई में थी. झगड़े की जलन बर्तनों पर उड़ेल रही हो, इस तरह की थोड़ी-थोड़ी देर में धड़ाधड़ आवाज़ आ रही थी. वह आवाज़ आती तो जयेश के हृदय में छोटा सा भूकंप उठ जाता था. मन ही मन वह चाहते थे कि कोई रिश्तेदार अभी एक घंटे के लिए ही आ जाए. घर में तलवारें लहराई जा रही हों और बाहर का कोई व्यक्ति आ जाए तो ज़बर्दस्त अभिनय करके स्थिति संभाल लेने की कला आरती के पास बहुत अच्छी थी. मेहमान के विदा होने तक उसका दिमाग़ शांत हो जाता था.
बर्तनों की धड़ाधड़ के साथ धीमी आवाज़ में अकेली-अकेली बड़बड़ाकर आरती अपना ग़ुस्सा निकाल रही थी. उसकी ओर से नज़र हटाकर जयेश ने बेडरूम के दरवाज़े की ओर देखा. अंदर जाते समय निराली ने दरवाज़ा बंद कर लिया था. उसमें से उसके सिसकने की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी.
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चौबीस साल की बेटी की रग रग से जयेश परिचित थे. पलंग पर उलटी पड़ी हुई वह रो रही होगी, सिसकियां भर रही होगी. अंदर जाकर उसकी पीठ पर हाथ फेरकर उसे चुप कराने की इच्छा तो हो रही थी, लेकिन मामला गंभीर था. अगर वह ख़ुद अंदर जाते तो आरती दौड़कर आती और फिर से महाभारत शुरू कर देती, इस डर से भारी मन से वह बैठे रहे.
अब उन्होंने अपना मन चिंतन की प्रतीक्षा में लगाया. निराली से दो साल छोटा चिंतन सीए की तैयारी कर रहा था. बेटा क्लास से आएगा तो उसे खाना खिलाने में आरती का मन लग जाएगा. इस आशा से वह बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे.
तीस साल के वैवाहिक जीवन के अनुभव से घटनाओं का पूर्वानुमान लगाना जयेश के लिए आसान था.
चिंतन की थाली परोसकर आरती उसके सामने बैठेगी, “छोटी थी, तब से ही तुम्हारे पापा ने उसे बिगाड़कर रख दिया है…” इस वाक्य के साथ आरती बोलना शुरू करेगी और नमक-मिर्च छिड़ककर कहेगी, “तुम्हारे पापा के प्रोत्साहन से निराली सिर चढ़ गई है.” चिंतन के खाना खाने तक आरती बोलती रहेगी.
मां-बेटी की छोटी-बड़ी खटपट में आरती अंत में तोप का मुंह जयेश की ओर घुमा देगी, “यह लड़की मेरे सामने बोलती है, यह तुम्हारे पिता के लाड़ का नतीज़ा है. उन्होंने इसे सिर पर चढ़ा रखा है.’’
बेशक, आज की बात काफ़ी गंभीर थी, इसलिए आरती का ग़ुस्सा जायज़ था, ऐसा जयेश को लग रहा था. क्या हुआ था?
मोबाइल पर किसी से बात पूरी करके निराली बालकनी से अंदर आई. जयेश सोफे पर थे. आरती नीचे बैठकर भिंडी काट रही थी. निराली मां के पास बैठ गई. फिर धीमे से बोली, ‘‘मुझे एक बात कहनी है, पापा आप भी सुनिए.’’ नीचे देखते हुए वह कांपती आवाज़ में बोली, ‘‘मेरी क्लास में एक लड़का है. हॉस्टल में रहता है. इस साल वह सीए हो जाएगा. उसके माता-पिता आज नोएडा आए हैं. आप हां कहें तो वे सब शाम को घर आएं.”
लड़खड़ाती आवाज़ में उसने आगे कहा, ‘‘लड़के में कोई कहने जैसी कमी नहीं है. आपको पहली नज़र में ही पसंद आ जाएगा, ऐसा सीधा-सादा है. अच्छा, संस्कारी परिवार है. लखनऊ में सोने-चांदी की दुकान है.’’ लंबी पलकें उठाकर निराली ने आशाभरी नज़रों से मां की ओर देखा, ‘‘फोन करूं?’’
‘‘सोने-चांदी की दुकान?’’ आरती की आवाज़ में आघात के साथ आश्चर्य था, ‘‘लड़का ब्राह्मण नहीं है?’’
‘‘उसका नाम सुकुमार सोनी है.’’ निराली की कांपती आवाज़ में ज़रा सी निराशा घुल गई, ‘‘उन लोगों से एक बार मिल तो लीजिए. कोई कमी लगे तो मना कर देना.’’
‘‘अपना मोबाइल दो.’’ सख्ती से आदेश देकर आरती ने मोबाइल ले लिया, ‘‘किसी सोनी-फोनी को घर बुलाने की ज़रूरत नहीं है और तुम भी उस लड़के को भूल जाओ.’’
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तीखेपन के साथ आवाज़ ऊंची हो गई, ‘‘पहली बार और आख़िरी बार कान खोलकर सुन लो. ब्राह्मण के अलावा कोई वर नहीं चलेगा. क़िस्मत में होगा तो इससे भी अच्छा लड़का मिल जाएगा. सुन लिया न? अब यह मोबाइल शाम तक मेरे पास ही रहेगा. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी.’’
आरती ने मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया और फिर तोप का मुंह जयेश की ओर तान दिया, ‘‘आपने ही इसे आज़ाद पंछी बना दिया है न? अपनी इस लाड़ली को साफ़-साफ़ कह दीजिए कि कोई सोनी महाजन नहीं चलेगा. बात इतनी बढ़ गई है तो पिता के रूप में क्या बेटी को डांटना आपका कर्तव्य नहीं है?’’
‘‘तुम्हारी मम्मी की बात सही है.” आरती झगड़ा न करे, इसलिए पूरी तरह अनिच्छा से जयेश ने मुंह खोला. चुभते हुए हृदय से बुदबुदाए, ‘‘अलग जाति के बिलकुल अंजान परिवार के लिए हम सहमति नहीं दे सकते.’’
‘‘साफ़ मना करने की बजाय इतना ढीला क्यों बोल रहे हैं? कह दीजिए कि नहीं यानी नहीं.’’
‘‘मुझ पर विश्वास नहीं है? एक बार मिल तो लो.” दयनीय नज़र से पापा की ओर देखने के बाद निराली मां से गिड़गिड़ाई, ‘‘मम्मी, उन लोगों को देखने के बाद तुम्हारी राय बदल जाएगी. मोबाइल दो, प्लीज़.”
‘‘पूरी तरह सोने का हो, तब भी सोनी का लड़का नहीं चलेगा. मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया है. बार बार रिंग करके थक जाएगा, इसलिए जवाब समझ जाएगा.”
आरती ने सख्ती से आगे कहा, ‘‘इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं होगी. अब मोबाइल मांगोगी तो हमेशा के लिए नहीं मिलेगा. समझ में आया?’’
आंखों में आंसू लिए निराली खड़ी हुई. भीगी आंखों से पिता के चेहरे की बेबसी पढ़कर वह तेजी से अपने कमरे में चली गई और रोने लगी.
उसके जाने के बाद आरती ने पति की ओर देखा, ‘‘आपने इस लड़की को इतना बिगाड़ रखा है कि कभी हमारा नाम डुबो देगी.” निराली के छोटी होने के समय का इतिहास याद करके उसने स्थाई आरोप-पत्र सुनाना शुरू कर दिया, ‘‘आठवीं में थी तब बालाजी की यात्रा पर जाने के लिए उसने घर सिर पर उठा लिया था. मैंने मना किया था, फिर भी मेरी बात के ऊपर जाकर आपने उसे यात्रा पर भेज दिया. बंदर जैसी हरकतें करने गई, उसमें पेड़ से गिरकर पैर तोड़ बैठी थी. महीने भर पैर प्लास्टर में रखना पड़ा और ऊपर से ख़र्च हुआ सो अलग. कॉलेज में आई तो दूसरी लड़कियों की देखा देखी एक्टिवा के लिए ज़िद की. मैं तो मना कर रही थी, लेकिन मेरी कौन सुनता है? आपने इस लड़की के मन में यह छाप बना दी है कि आप अच्छे हैं और मैं बुरी हूं.” आवाज़ में कड़वाहट मिलाकर उसने आगे कहा, ‘‘बाकी था तो आपकी लाड़ली ने आज पूरा कर दिया. सोनी के लड़के की बात कहते समय उसे ज़रा भी शर्म नहीं आई. यह सब आपकी ग़लती है.’’
आरती के अधिकांश संवाद जयेश को कंठस्थ हो गए थे. आरती की एक और खासियत थी. जिस काम की वह ख़ुद इच्छुक नहीं होती थी, उसका दोष बड़ी चालाकी से जयेश के सिर मढ़ देती थी.
कॉलेज से पांच दिन का राजस्थान का दौरा था. आरती ने निराली को धमकाकर साफ़ मना कर दिया था. तब रजनी की मां ने आरती को फोन करके कहा था कि अगर निराली जाने वाली हो तो रजनी को भेज दूंगी. तब सयानी सीता की तरह आरती बोली थी कि बेटी बाहर घूमे फिरे और कुछ सीखे, इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन उसके पापा ने साफ़ मना करके कहा है कि जवान बेटी को पांच दिन बाहर नहीं भेजा जा सकता. उनका फ़रमान हो तो फिर मैं क्या बोल सकती हूं.”
अपनी मौजूदगी में ही आरती का ऐसा जवाब देना सुनकर जयेश भीतर तक तिलमिला उठे थे. ऐसा कई बार हुआ था. कोई पड़ोसी कोई चीज़ उधार मांगता तो आरती बहुत आसानी से कह देती कि चिंतन के पापा ने मना किया है. ऐसा होता तो जयेश को भीतर कुछ चुभता हुआ महसूस होता, लेकिन कष्ट सहकर वह शांत रहते.
चार बजे तक धधकती आग जैसी स्थिति में डोरबेल की आवाज़ सुनकर आरती ने दरवाज़ा खोला और उसी के साथ वह आश्चर्य से उछल पड़ी, ‘‘गायत्री? कितने साल बाद तुझे देख रही हूं. मोटी हो गई है, फिर भी एक झटके में तुझे पहचान गई न?’’
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उन दोनों की ओर जयेश देख रहे थे, इसलिए आरती ने परिचय कराया, ‘‘यह गायत्री शुक्ला है. कॉलेज के तीन साल हम एक ही बेंच पर बैठकर पढ़े हैं. एक थाली में खाने जैसी दोस्ती थी हमारी.’’
उसने गायत्री की ओर देखा, ‘‘कहां है तू? कॉलेज छोड़ने के बाद तो हम मिले ही नहीं. मेरी शादी का निमंत्रण देने जब तेरे घर गई थी, तब सब बड़े नाराज़ थे. कह रहे थे कि उस लड़की ने हमारा नाम डुबो दिया. भागकर प्रेम विवाह किया है, उस दिन से वह हमारे लिए मर चुकी है. तेरा पता भी नहीं मालूम, ऐसा कहकर मुझे भगा दिया था.’’
‘‘छह महीने में ही पिताजी का दिमाग़ ठिकाने आ गया था. हमें घर बुला लिया था.’’ गायत्री ने हंसकर आगे कहा, ‘‘तेरी शादी का निमंत्रण भेजने के लिए तुझे मेरा पता नहीं मिला, लेकिन निमंत्रण देने के लिए आज मैंने तेरा पता ढूंढ़ लिया.’’
अपने सामने आश्चर्य से ताक रही आरती की पीठ पर धप्पा मारकर गायत्री ने कहा, ‘‘तेरी बेटी ने अभी तक घर में कोई बात नहीं की? हम तो फोन का इंतज़ार करके बैठे थे. फोन नहीं आया तो लगा कि कुछ गड़बड़ है. सुकुमार और उसके पापा को कार में नीचे ही बैठने के लिए कहकर मैं ऊपर आई और तेरे दर्शन हो गए, तो मेरी चिंता दूर हो गई. तेरी बेटी मेरे घर आए, इससे बढ़कर और क्या होगा?’’
आरती अभी भी उसे विस्मय से देख रही थी, इसलिए गायत्री ने स्पष्ट किया, ‘‘घर से भागकर मैंने सुकुमार के पापा से शादी की थी. हमारे घर के सामने ही उनके मामा का बंगला था. हर छुट्टी में वह वहां आता था और हमारी जोड़ी जम गई. पापा सहमति नहीं देंगे, यह पता था, इसलिए भागकर शादी कर ली थी.”
पर्स से मोबाइल निकालकर उसने पति को बधाई दी, ‘‘फटाफट तीसरी मंज़िल, 304 नंबर के फ्लैट में आ जाओ. मिठाई के डिब्बे में ही गहनों का छोटा डिब्बा है, उसे संभालकर लेते आना. दुल्हन की मां तो मेरी ख़ास सहेली ही निकली. जल्दी आओ, फिर बात करती हूं.’’
बात ख़त्म करके उसने आरती की ओर देखा, ‘‘कहां है तेरी बेटी? मेरे सुकुमार ने कैसी हीरोइन पसंद की है, यह तो देखने दे.”
आरती अंदर जाकर निराली को बुला लाई. निराली ने झुककर गायत्री के चरण स्पर्श किए. उसे उठाकर गायत्री प्यार से गले लगा लिया.
मिठाई का डिब्बा लेकर पिता-पुत्र ऊपर आ गए थे सुकुमार को देखकर आरती और जयेश के चेहरों पर ख़ुशी और संतोष छलक रहा था. आपस में परिचय के बाद एक-दूसरे को मिठाई खिलाते समय कमरे में मीठी-मधुर ख़ुशी छलक रही थी.
मेहमानों की ओर देखकर आरती ने फोन के बारे में सफ़ाई दी, ‘‘निराली ने कहा, तब झटका लगा था, लेकिन वह मेरे ऊपर गई है, इसलिए उसकी पसंद कच्ची नहीं होगी, इतना विश्वास था. लड़का उसे पसंद हो और दमदार हो तो फिर क्या चाहिए. वह सोनी हो या सुथार, बस निराली को संभालने वाला हो, तो मैंने गंगा नहा लिया.’’
उसने जयेश की ओर नज़र की, ‘‘ब्राह्मण के अलावा लड़के की बात सुनकर यह साहब भड़क गए. निराली को डांटकर इन्होंने मोबाइल ही जब्त कर लिया, इसलिए हम मां-बेटी लाचार थी.’’
ख़ुद को आगे करके आरती बेधड़क झूठ बोल रही थी. फिर भी हृदय में चुभन की बजाय इस समय जयेश को चंदन के शीतल लेप जैसी अनुभूति हो रही थी.
– वीरेंद्र बहादुर सिंह
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