करवा चौथ व्रत कथा: इस कथा को करवा चौथ के दिन पढ़ती हैं सुहागिनें (Karwa Chauth 2017: Story Of Karwa Chauth Every Woman Must Read)

पूर्णिमा के चांद के बाद जो चौथ पड़ती है, उस दिन करवाचौथ मनाया जाता है. भारतीय महिलाएं इस दिन अपने पति की लंबी उम्र के लिए करवा चौथ का व्रत करती हैं. करवा चौथ के दिन कथा पढ़ना अनिवार्य माना गया है इसलिए महिलाएं सूर्यास्त से पहले कथा सुनती या पढ़ती हैं. आइए, जानते हैं करवा चौथ की कथा के बारे में.

Karwa Chauth Story

करवा चौथ कथा

एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी. एक बार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सेठानी सहित उसकी सातों बहुएं और उसकी बेटी ने भी करवा चौथ का व्रत रखा. रात के समय जब साहूकार के सभी बेटे भोजन करने बैठे तो उन्होंने अपनी बहन से भी भोजन करने को कहा, लेकिन बहन ने मना कर दिया. बहन ने कहा- ”भाई, अभी चांद नहीं निकला है, चांद के निकलने पर उसे अर्घ्य देकर ही मैं भोजन करूंगी.”

साहूकार के बेटे अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे, उन्हें अपनी बहन का भूख से व्याकुल चेहरा देखकर बहुत दुख हो रहा था. साहूकार के बेटों को अपनी बहन को भोजन कराने की एक तरकीब सूझी. सातों भाई नगर के बाहर चले गए और वहां एक पेड़ पर चढ़कर उन्होंने अग्नि जला दी. घर वापस आकर उन्होंने अपनी बहन से कहा- “देखो बहन, चांद निकल आया है. अब तुम उन्हें अर्घ्य देकर भोजन ग्रहण कर सकती हो.” साहूकार की बेटी ने अपनी भाभियों से कहा- “देखो, चांद निकल आया है, तुम लोग भी अर्घ्य देकर भोजन कर लो.” ननद की बात सुनकर भाभियों ने कहा- “अभी चांद नहीं निकला है, तुम्हारे भाई धोखे से अग्नि जलाकर उसके प्रकाश को चांद के रूप में तुम्हें दिखा रहे हैं.”

साहूकार की बेटी ने अपनी भाभियों की बात नहीं सुनी और भाइयों द्वारा दिखाए गए चांद को अर्घ्य देकर भोजन कर लिया. इस प्रकार करवा चौथ का व्रत भंग करने के कारण विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश साहूकार की लड़की पर अप्रसन्न हो गए. गणेश जी की अप्रसन्नता के कारण उस लड़की का पति बीमार पड़ गया और घर में बचा हुआ सारा धन उसकी बीमारी पर खर्च हो गया.

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साहूकार की बेटी को जब अपने किए हुए दोषों का पता लगा, तो उसे बहुत पश्चाताप हुआ. उसने गणेश जी से क्षमा प्रार्थना की और फिर से विधि-विधान पूर्वक चतुर्थी का व्रत शुरू कर दिया. उसने उपस्थित सभी लोगों का श्रद्धानुसार आदर किया और उनसे आशीर्वाद लिया.

इस प्रकार उस लड़की की श्रद्धा-भक्ति को देखकर भगवान गणेश जी उस पर प्रसन्न हो गए और उसके पति को जीवनदान दे दिया. उसे सभी प्रकार के रोगों से मुक्त करके धन, संपत्ति और वैभव से युक्त कर दिया.

कहते हैं, जो भी मनुष्य छल-कपट, अहंकार, लोभ, लालच को त्याग कर श्रद्धा और भक्तिभाव से चतुर्थी के व्रत को पूर्ण करता है, उसे जीवन में सभी प्रकार के दुखों और क्लेशों से मुक्ति मिलती है.

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