लता मंगेशकर ने ‘ऐ मेरे वतन...

लता मंगेशकर ने ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गाने से कर दिया था इनकार, जब गाया तो छलक आई नेहरू की आंख (Lata Mangeshkar Had Refused To Sing ‘Ae Mere Watan Ke Logon’, When She Sang, Nehru’s Eyes Fell)

पूरी दुनिया में भारत देश को गौरवान्वित करने वाली स्वर कोकिला के नाम से मशहूर गायिका लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) ऐसी शख्सियत हैं, जिनके हाथों में आकर उपलब्धियां भी गौरवान्वित हो जाया करती हैं. जिनके गले में सरस्वती निवास करती हैं, जिनकी मधुर आवाज़ सुन अंतर आत्मा तक झंकृत हो जाया करती हैं, वो महान गायिका हर साल 28 सितम्बर को अपना जन्मदिन मनाती हैं. वैसे तो लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) की उम्र 92 साल हो गई है, लेकिन उनकी आवाज़ की वो मिठास आज भी बदस्तूर जारी है. उन्होंने अनेकों अमर गीतों में अपनी आवाज़ देकर उसे सदा के लिए अमर बना दिया. उनके गाए गानों का लोगों के दिलों पर ऐसा जादू चलता है, जिसे भुला पाना नामुमकिन होता है.

Lata Mangeshkar
फोटो सौजन्य – इंस्टाग्राम

ऐसे तो लता जी ने एक से बढ़कर एक गाने गाए, लेकिन आज हम बात कर रहे हैं उस गीत की, जिसे सुनकर हर किसी के रोंगटे खड़े हो जाया करते हैं. ये गीत सुन लोगों के दिलों में देशभक्ति की उबाल आ जाती है. इस गीत को सुन सीमा पर तैनात जवानों के जोश कई गुना ज्यादा बढ़ा जाया करते हैं. जी हां दोस्तों, हम आपको बता रहे हैं उस सदाबहार गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ के बारे में, जिसे आवाज़ दी है स्वर कोकिला लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) ने. इस गीत की रचना से लेकर इसकी पहली प्रस्तुती की कहानी भी काफी ज्यादा खास और दिलचस्प है.

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कवि प्रदीप को मिला था इस गीत की रचना का ऑफर

ये बात साल 1962 के दौरान की है, जब भारत को चीन से हुए युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था. ऐसे में देश का माहौल काफी ज्यादा गमगीन हो गया था. देश का हर नागरिक दुखी था. हर किसी का मनोबल मानो टूट सा गया था. ऐसी विसम परिस्थिती में आवश्यक्ता थी कुछ ऐसा करने की, जिससे देशवासियों का मनोबल बढ़ सके, लोगों का आत्मविश्वास जाग सके. ऐसे में लोगों की उम्मीद देश के कवियों और फिल्म जगत से बढ़ गई.

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सरकार की ओर से फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गजों से ये आग्रह किया गया, कि वो कुछ ऐसा करे जिससे देशवासियों के अंदर फिर से जोश भर सके. इसी दौरान उन दिनों के जाने-माने कवि प्रदीप के पास एक गीत की चरना करने का प्रस्ताव आया था, जिसके बारे में एक इंटरव्यू के दौरान खुद कवि प्रदीप ने ही बताया था. दरअसल कवि प्रदीप को इस गीत की रचना का प्रस्ताव इसलिए आया था, क्योंकि उन्होंने पहले भी देशभक्ति के गाने लिखे थे.

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लता मंगेशकर को ध्यान में रखते हुए लिखा ये गीत

इंटरव्यू के दौरान कवि प्रदीप ने बताया कि, उन दिनों इंडस्ट्री में तीन महान गायक थे, मुकेश, मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर. मोहम्मद रफी ने उस दौरान ‘अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं’ गीत को गाया था, जबकि राज कपूर के आग्रह पर मुकेश ने ‘जिस देश में गंगा बहती है’ गीत को गाया था. अब बच गईं थीं लता मंगेशकर. कवि प्रदीप इस बात को मान रहे थे कि लता जा की मखमली व मीठी आवाज़ में कोई जोशिला गाना फिट नहीं बैठेगा. इसी वजह से उन्होंने लता मंगेशकर के लिए एक भावनात्मक गीत लिखने के बारे में सोचा और इस तरह गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ की रचना हुई.

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लता मंगेशकर ने किया इस गीत को लेकर खुलासा

वहीं एक इंटरव्यू के दौरान लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) ने बताया कि, 1063 में ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत को गणतंत्र दिवस के मौके पर गाने का उन्हें ऑफर मिला था. जब उन्हें इस गीत को गाने का प्रस्ताव मिला तो उस वक्त उन्होंने साफतौर पर मना कर दिया था, क्योंकि लता जी के पास इस गीत को गाने के लिए रहर्सल का समय नहीं था. इंटरव्यू के दौरान लता जी ने इस गीत से जुड़े किस्से को बताया. उन्होंने कहा कि, “कवि प्रीदीप ने इस गीत के अमर बोल लिखे थे और उन्होंने ही इस गीत को गाने की मुझसे गुजारिश की थी, लेकिन व्यस्तता की वजह से उनके लिए इस गीत को विशेष अटेंशन देना संभव नहीं था.”

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लता जी ने आगे बताया कि प्रदीप जी के काफी कहने पर वो इस गीत को गाने के लिए मान गईं, लेकिन वो इस गीत को अकेले नहींं, बल्कि आशा भोसले के साथ मिलकर गाने के लिए तैयार हुईं. अब जब प्रोग्राम के लिए दिल्ली जाने की बात आई तो आशा जी ने वहां जाने से मना कर दिया. आशा जी को मनाने की काफी कोशिश की गई लेकिन वो नहीं मानीं और आखिर में लता मंगेशकर को अकेले ही इस गीत को गाने की तैयारी करनी पड़ी.

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रास्ते में किया गाने का रियाज

लता जी की मुश्किल तब और बढ़ गई जब ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत की धुन तैयार करने वाले रामचंद्र जी भी 4-5 दिन पहले ही दिल्ली चले गए थे. ऐसे में लता जी को रियाज के लिए उनका साथ नहीं मिल पाया था. हालांकि रामचंद्र जी ने लता जी को गाने का एक टेप दे रखा था, जिसे सुनकर वो अपना रियाज करने में जुट गईं. लता मंगेश्कर (Lata Mangeshkar) ने बताया कि, जब वो दिल्ली पहुंची तो उनके पेट में तेज दर्द शुरु हो गया था. गाने को लेकर वो काफी ज्यादा चिंतित थीं. फिर 27 जनवरी 1963 को उन्होंने दिल्ली के नेशनल स्टेडियम जाकर इस गीत को गाया.

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पंडित नेहरु की छलक आई थी आंख

लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) ने बताया कि जब वो गाना खत्म करने के बाद स्टेज के पीछे चली गईं, तब महबूब खान ने वहां आकर उनका हाथ पकड़कर उनसे कहा कि, चलो नेहरु जी ने बुलाया है. महबूब खान की ये बात सुन लता जी को काफी हैरत हुई थी, कि आखिर क्यों पंडित जी उनसे मिलना चाहते हैं. जब लता जी वापस स्टेज पर गईं तो पंडित जी के साथ-साथ वहां मौजूद सारे लोगों ने खड़े होकर उनका स्वागत किया. पंडित जी ने उनके गाए उस गाने की जमकर तारीफ की और कहा कि उनकी आंखों में पानी आ गया.

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लता जी को भरोसा नहीं था कि ये गाना इतना मशहूर होगा

लता जी को इस बात का बिल्कुल भी यकीन नहीं था कि ये गाना इतना ज्यादा मशहूर हो जाएगा. ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत लोगों को इतना ज्यादा पसंद आया कि हर प्रोग्राम में उनसे इस गीत को गाने का आग्रह होने लगा.

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