फिल्म समीक्षा- मनोरंजन का डबल धम...

फिल्म समीक्षा- मनोरंजन का डबल धमाका- हंगामा 2 और 14 फेरे… (Movie Review- Comody Double Dose- Hungama 2 And 14 Phere…)

Hungama 2

हंगामा 2
कलाकार- शिल्पा शेट्टी, प्रणिता सुभाष, परेश रावल, आशुतोष राणा, मीजान जाफरी, राजपाल यादव, जाॅनी लीवर, टीकू तलसानिया, मनोज जोशी.
लेखक व निर्देशक- प्रियदर्शन
रेटिंग: * 1/5

ओटीटी प्लेटफार्म पर मनोरंजन से भरपूर दो फिल्में रिलीज हुई हंगामा टू और 14 फेरे, लेकिन दोनों ही अपने नाम और कलाकारों के अनुरूप भरपूर मनोरंजन करने में कामयाब नहीं हो पाईं. आइए दोनों फिल्मों के बारे में संक्षेप में जानें.
हंगामा 2 फिल्म का मुख्य आकर्षण प्रोमो को देखकर परेश रावल, शिल्पा शेट्टी और जावेद जाफरी के बेटे मीजान जाफरी महसूस होते थे. परतुं फिल्म देखने के बाद काफ़ी निराशा होती है. शिल्पा शेट्टी ने 14 साल बाद फिल्मों में वापसी की थी, लेकिन निर्देशक प्रियदर्शन उनसे सही तरीक़े से अधिक काम नहीं ले पाए, वहीं परेश रावल के साथ भी हुआ. ऐसे मंजे हुए कलाकारों के साथ निर्देशक न्याय नहीं कर पाए.
किसी कॉमेडी फिल्म में मज़ेदार डायलॉग और टाइमिंग काफ़ी मायने रखता है. जॉनी लीवर या फिर बच्चोंवाले सीन राहत देते हैं.
कहानी भी भूलभुलैया जैसी है. एक तरफ़ एक अधेड़ पुरुष परेश रावल अपनी पत्नी शिल्पा शेट्टी पर उसके दोस्त मीजान जाफरी से अफेयर का शक करता है, तो दूसरी तरफ़ आशुतोष राणा अपने बेटे मीजान के बिन बताएं शादी, बहू और पोते के चक्कर में फंसा है. कह सकते है हंगामा जैसी बात इसके सीक्वल में कहीं नज़र नहीं आती.
अनु मलिक का संगीत ठीक-ठाक है. अलबता सिनेमैटोग्राफी, कॉस्ट्यूम, बैकग्राउंड म्यूज़िक बढ़िया है. रॉनी रफेल ने बैकग्राउंड म्यूज़िक में बेहतर काम किया. समीर अनजान के गीत हैं. शिल्पा शेट्टी की फिल्म का गाना चुरा कर दिल मेरा… का रीमिक्स तो पहले से ही हिट हो गया है. निर्माता रतन जैन की तो पूरी कोशिश रही होगी मसालेदार सुपरहिट फिल्म बनाने की, पर बात बन न पाई.

14 Phere

14 फेरे
कलाकार- विक्रांत मेसी, कृति खरबंदा, विनीत कुमार, यामिनी दास, गौहर खान, जमील खान
निर्देशक- देवांशु सिंह
रेटिंग- ** 2/5
फिल्म की कहानी बस इतनी सी है विक्रांत मेसी और कृति खरबंदा एक दूसरे को प्यार करते हैं, दोनों का परिवार उनकी शादी के खिलाफ़ हैं. कैसे लव मैरिज को अरेंज्ड मैरिज का ताना-बाना बुनकर दोनों ही परिवार के लोगों को बेवकूफ़ बनाने की नाकाम कोशिश की जाती है. सभी ने अभिनय ठीक किया है, बस कहानी और पटकथा कमज़ोर कड़ी बन जाती है.
वैसे कहानी मनोज कलवानी ने लिखी है. बिहार और राजस्थान के लोगों की पृष्ठभूमि पर बेहतर लेखन है, पर इसके बावजूद उतना प्रभाव नहीं छोड़ पाती. कहानी कई दृश्यों में बिखरी लगती है. चूंकि विषय जातिवाद का उठाया गया है, तो उस पर थोड़ा और गंभीरता पूर्वक काम करने की आवश्यकता थी. क्लाइमेक्स कमज़ोर है. विक्रांत मेसी, कृति खरबंदा, गौहर खान, विनीत कुमार, यामिनी दास ने अपनी अपनी भूमिकाएं बेहतर ढंग से निभाई है. निर्देशक दिवांशु सिंह की कोशिश तो एक मनोरंजन से भरपूर फिल्म बनाने की थी, पर अपने शीर्षक के अनुसार फिल्म दिलचस्प नहीं बन पाई.
संगीत कर्णप्रिय है. गीत दिल को छूती है, पर कहानी के साथ न्याय नहीं कर पाती. विक्रांत मैसी ने हमेशा की तरह लाजवाब अभिनय किया है. गौहर खान फिल्म का ख़ास आकर्षण है. उनके फैन्स उन्हें अलग अंदाज़ में देख ज़रूर ख़ुश होंगे. वैसे मसाला फिल्मों के शौकीन लोगों को दोनों ही फिल्में पसंद आएगी.


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