माना तेरी कसौटी पर
उतरा मैं खरा नहीं हूं
पर जितना सोचा है तुमने
उतना भी मैं बुरा नहीं हूं...
बहुत कुछ कहना था तुमसे
बहुत दिनों से थे हम चुप से
कुछ मजबूरी ने रोका मुझको
कुछ मर्यादा ने टोका तुमको
जाने क्यों तुमको पाने की ख़ातिर
मैं ज़िद पर कभी अड़ा नहीं हूं
पर जितना सोचा है तुमने
उतना भी मैं बुरा नहीं हूं...
ज़िम्मेदारियों के बोझ ने
छीन लिया मुझ से बचपन मेरा
सच मानो जितना सबको लगता हूं
उतना तो मैं बड़ा नहीं हूं
तुम बिन जीना अब तक
सीख नहीं पाया हूं
पर तुम्हें पाने की ख़ातिर
क़िस्मत से भी मैं लड़ा नहीं हूं
कितनी दूर चले आए हम
पर तेरे घर के रास्ते से
आगे अब तक बढ़ा नही हूं
उस मोड़ से मुड़ा नहीं हूं
भले टूट गया हो रिश्ता अपना
पर सच मानो
और किसी से मैं जुड़ा नहीं हूं
जितना सोचा है तुमने
उतना भी मैं बुरा नहीं हूं...
- प्रज्ञा पाण्डे 'मनु'

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