कहानी- मूलमंत्र (Hindi Shor...

कहानी- मूलमंत्र (Hindi Short Story- Moolmantra)

By Admin June 21, 2019 in Digital PR
आराधना खरे

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“तुम जा रही हो प्रिया? मैं बहुत अकेला हो जाऊंगा.”
“पर, मैं तो तुम्हारे साथ भी अकेली हूं.”
“तुम सच कहती हो प्रिया, मैं बहुत बुरा हूं. मैंने तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया. क्या करूं, मैं कुछ कह ही नहीं पाता.” अभिनव ज़ोर से रो पड़े… “मुझे माफ़ कर दो प्रिया, मैं अपने आपको सुधार लूंगा. मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता.”

 

मुझे याद है जब मैं छोटी थी, तब लोग मुझे ‘नटखट’ कहते थे. प्रतिदिन नई-नई शैतानियां, हंसी-मज़ाक और हास-परिहास करना मुझे बहुत अच्छा लगता था. जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई, उम्र के अनुसार स्वभाव में परिवर्तन होते गए. पर एक बात हमेशा एक-सी रही- स्वयं ख़ुश रहकर हमेशा दूसरों को ख़ुश रखना. मैं सोचती थी तनाव तो जीवन का एक हिस्सा है. उसे तो झेलना ही पड़ेगा. परन्तु पूरे समय बोझिल वातावरण ओढ़े रखने से क्या लाभ? अपनी सभी ज़िम्मेदारियों को पूरा करो और ख़ुश रहो.

पढ़ाई-लिखाई में मेरी बहुत रुचि थी. मास्टर डिग्री प्राप्त करने के बाद बैंक की नौकरी के लिए मेरा चयन हो गया. भाई आनंद अभी छोटा था और पढ़ाई में व्यस्त था. मेरी उम्र विवाह योग्य हो गई थी. पापा-मम्मी ने भी वर खोजना प्रारंभ कर दिया. देखने में मैं ठीक-ठाक थी और नौकरी में तो थी ही. इसलिए अधिक परेशानी नहीं हुई और पापा को एक रिश्ता पसन्द आ गया. बोले, “लड़का बहुत सीधा-साधा है और अच्छी नौकरी में है. परसों मीनू को देखने आ रहा है.”

मम्मी ख़ुशी-ख़ुशी तैयारियां कर रही थीं. मैं भी उत्सुक थी- सीधे-साधे लड़के अर्थात् अभिनव से मिलने के लिए. अभिनव जब आए, तो उन्होंने बड़ी मुश्किल से मुझसे एक-दो वाक्य ही बात की. मुझे अभिनव की शालीनता बेहद पसंद आई- गंभीर और सधा हुआ व्यक्तित्व. अभिनव को मुझमें क्या अच्छा लगा, यह तो मैं नहीं जानती, पर हमारी शादी तय हो गई.

जैसा आजकल होता है कि विवाह तय होते ही लड़का-लड़की फ़ोन पर घंटों बातें करते हैं. मुझे भी लगा, अभिनव मुझसे बाते करेंगे, मुझसे मिलना चाहेंगे, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. मैं प्रतीक्षा ही करती रही. सभी विवाह की तैयारियों में व्यस्त थे. शायद अभिनव भी व्यस्त होंगे, यह सोचकर मैं शांत रही. विवाह की शुभ घड़ी आई. दोनों पक्षों ने बड़ा उत्साह दिखाया और सात फेरों के साथ मैं अभिनव की पत्नी बन गई. ससुराल में सभी का व्यवहार अपनत्व से भरा था. प्रथम रात्रि के मादक क्षणों में वाणी की आवश्यकता ही कहां होती है? मैं पुलकित मन से समूची अभिनव की हो गई.

जब मैं पगफेरे के लिए मायके आई तो जैसे अपना मन मैं अभिनव के पास ही छोड़ आई थी. वे भी उतने ही व्यग्र थे, परंतु उन्होंने फ़ोन पर मुझसे बहुत कम बात की. अधिकतर मैं ही बोलती रही, वे बस ‘हां-हूं’ में उत्तर दे देते. जैसी मिठास भरी बातें सुनने के लिए मेरे कान व्याकुल थे, वो मैं नहीं सुन पाई. सोचा, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा.

उस समय अभिनव की पोस्टिंग ग्वालियर में थी. मेरा स्थानान्तरण भी आसानी से वहां हो गया और हम लोगों के नए जीवन की शुरुआत हो गई. वैवाहिक जीवन का प्रथम वर्ष एक-दूसरे को समझने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होता है, पर मैं चाहकर भी अभिनव को समझ नहीं पा रही थी. हम दोनों ही नौकरी में व्यस्त थे. शाम को मिलते ही मैं अभिनव को दिनभर की सारी बातें बताती, हंस-हंसकर रोचक प्रसंग सुनाती. अभिनव चुपचाप सुन लेते. अधिक प्रतिक्रिया व्यक्त न करते और न स्वयं कुछ कहते. उनका यह आचरण देखकर मैं मायूस हो जाती.

एक वर्ष बाद ही हम दो से तीन हो गए. हमारे बीच प्यारा-सा बेटा ‘वत्सल’ आ गया. मैं बेटे की देखभाल में व्यस्त हो गई. अभिनव वत्सल को बहुत प्यार करते, उसका ध्यान रखते, पर बात न करने की उनकी प्रवृत्ति यहां भी यथावत् थी. मुझे खीझ होने लगती. मैं बार-बार उन्हें अभिव्यक्ति की ज़रूरत समझाती. हंसने-बोलने का महत्व बताती, पर उन पर इन बातों का कोई असर नहीं होता.

जैसे-जैसे वत्सल बड़ा होता गया, परिवार का वातावरण शांत-सा रहने लगा. वत्सल को स्कूल भेजकर मैं अपना काम करती रहती. अभिनव चुपचाप बैठे कुछ पढ़ते रहते. उन्हें तो बोलना पसन्द ही नहीं था. मैंने भी बात करना बन्द कर दिया. केवल आवश्यक बातें होतीं और हम लोग अपना-अपना काम करते रहते. घूमना-फिरना भी उन्हें पसन्द नहीं था. अभिनव के लिए ये सब सामान्य था. पर ऐसी मूक, ठंडी और बदरंग ज़िन्दगी मुझे ज़रा भी पसन्द नहीं थी. हम लोग मशीन तो थे नहीं, जो संवेदनाहीन बनकर केवल काम करते रहते. पति-पत्नी के मध्य तो भावनाओं और संवादों का इतना संसार होता है कि पता ही नहीं चलता कि उनके व्यक्तित्व कब एक-दूसरे में समाहित हो जाते हैं. मैंने कभी क्रोध से, कभी प्रेम से उन्हें समझाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन अभिनव पर कोई असर नहीं हुआ.

परिवार के बीच पसरे सन्नाटे का वत्सल के कोमल मन पर ग़लत प्रभाव पड़ रहा था. पर मैं क्या करती, मजबूर थी. उस समय तो गज़ब ही हो गया… मुझे तेज़ बुखार था, अभिनव ने वत्सल को स्कूल भेज दिया, मुझे भी डॉक्टर को दिखाकर दवा रखकर बोले, “तुम दवा खा के आराम करो, मैं ऑफ़िस जा रहा हूं.”

मैंने मना किया तो बोले, “ज़रूरी काम है.” और अपना बैग उठाकर तेज़ी से बाहर निकल गए. मुझे बहुत दुख हुआ. अपनी विवशता पर रोना आया और मैं बहुत

देर तक रोती रही. मुझे लगा, यदि अभिनव भी और लोगों की तरह होते तो मेरे पास बैठते, मेरे सिर पर हाथ फेरते, थोड़ा-सा स्नेह मुझे देते.

मैं स्वस्थ हो गई, पर दिल तो टूटा ही था. इतने उबाऊ और भावहीन इंसान के साथ जीवन जीने का मतलब क्या था? धीरे-धीरे मेरी नाराज़गी, चिढ़ में और फिर घृणा में बदलने लगी. मैं प्रतिदिन इतने तनाव में नहीं रह सकती थी. मैंने हमेशा के लिए मायके जाने का निश्‍चय कर लिया. जब अभिनव को इस कठोर निर्णय के बारे में बताया, तो वे कुछ न बोले. बस, मुझे देखते रहे. मैं आपे से बाहर हो गई. अब मेरा जाने का निश्‍चय और दृढ़ हो गया.

सुबह मुझे वत्सल को लेकर जाना था. मैं बहुत तनाव में थी. घर टूटने का दुख तो था ही. अभिनव को इतने मन से चाहने के बाद भी जो मिला, उससे मैं निराश, दुखी और अपमानित भी थी. रात काफ़ी हो चुकी थी. सुबह जल्दी उठना था. मैं सोने का प्रयास कर रही थी कि इतने में मुझे लगा किसी ने मेरा हाथ पकड़ा है. मैं चौंक गई, देखा तो अभिनव थे. वे बोले, “तुम जा रही हो प्रिया? मैं बहुत अकेला हो जाऊंगा.”

“पर, मैं तो तुम्हारे साथ भी अकेली हूं.”

“तुम सच कहती हो प्रिया, मैं बहुत बुरा हूं. मैंने तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया. क्या करूं, मैं कुछ कह ही नहीं पाता.” अभिनव ज़ोर से रो पड़े… “मुझे माफ़ कर दो प्रिया, मैं अपने आपको सुधार लूंगा. मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता.”

“ऐसा मत कहो अभिनव.” हम दोनों बहुत देर तक रोते रहे. शायद उन कलुषित दिनों की कालिमा धो रहे थे. फिर मैंने अभिनव को बच्चों के समान आत्मीयता से सुला दिया. मुझे क्या करना चाहिए, मैं सोच नहीं पा रही थी.

अगले दिन से मैंने महसूस किया कि अभिनव स्वयं को बदलने का बहुत प्रयास कर रहे थे. मैं संतुष्ट थी, पर जानती थी ऐसे परिवर्तन बहुत समय तक नहीं रहते. उस दिन मैं अभिनव के क़िताबों की आलमारी लगा रही थी कि इतने में मैंने अभिनव की डायरी देखी. जिज्ञासावश डायरी के पन्ने पलटने लगी, पर यह क्या? इतना अच्छा लिखते हैं अभिनव? इतने श्रेष्ठ विचार… इतनी ऊंची सोच…! अभिनव के जिस प्यार को पाने के लिए मैं तरस गई थी, डायरी के प्रत्येक शब्द में वह छलक रहा था. मैं हतप्रभ थी, यह कैसा विरोधाभास था? इतने मूक व्यक्ति की लेखनी इतनी जादुई कैसे हो सकती है? ख़ुशी से मेरी आंखें छलक आईं. मैंने सोचा, यदि मैं अभिनव को छोड़कर चली जाती तो अनर्थ हो जाता.

इस घटना को तीन वर्ष हो गए हैं. अभिनव ने स्वयं को थोड़ा बदल लिया है और थोड़ा बदला है मैंने अपनी सोच. हम दोनों ने एक-दूसरे को पूरी तरह स्वीकार लिया है. शायद यही दाम्पत्य का ‘मूलमंत्र’ है, पर एक धृष्टता मैं अवश्य करती हूं. कभी-कभी छिपकर अभिनव की डायरी पढ़ती हूं, जो मुझे आत्मविभोर कर देती है.

 

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