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कहानी- आस-पास (Short Story- Aas-Paas)

चन्दवानी जब चलती थी अपनी देह को बिल्कुल दोहरा कर लेती थी. झील में उठती-गिरती लहरों की भांति लहरें उत्पन्न करती हुई वह सर्र से निकल जाती थी.

इस दिन चन्दवानी बड़ी घबराई सी बाहर खड़ी थी अस्त व्यस्त साड़ी रूखे बेतरतीब बाल और चेहरे पर बुझी हुई मुस्कराहट… उसके चेहरे पर एक तरह कीझल्लाहट भी दिखाई दे रही थी.

मुझे आता देख उसने झटके से बालों को पीछे किया और बड़ी तेज़ी से एक ओर हट गई. आज उसकी चाल में लहरें नहीं थीं, थिरकन नहीं थी और वह कोमलता था जिस पर ऑफिस के बूढ़े सिन्हा बाबू भी ल‌ट्टू थे. वह सामान्य चाल से कमरे के बाहर निकल गई और मैं उसे जाता देखता रहा,

बॉस को आज ही हेड ऑफिस जाना था और वह मुझसे बड़े ज़रूरी काग़ज़ात मांग रहा था. सुबह से ही मैं उन सारी सूचनाओं को ढूंढ़ने में लगा था और अभी एक सूचना के सिलसिले में चन्दवानी के पास जा रहा था.

लेकिन जब चन्दवानी को बाहर जाते देखा तो एक बार तो इच्छा हुई उसे वापस बुला लूं और कहदूं कि पहले मुझे फाइल दे जाओ, बाद में बाहर चली जाना. फिर यह सोचकर रह गया कि न जाने किस काम से वह बाहर जा रही है.

जब से उसकी नियुक्ति हुई है, वह मशीन की तरहकाम कर रही है. दिनभर फाइलों में उलझी रहती है. एक इन्सान कब तक मशीन बना रह सकता है. कब तक वह लगातार काम करते रह सकता है, घुटन भरे कमरों में कब तक घुटता हुआ रह सकता है. वह भी शायद बाहर थोड़ी ताज़ी हवा लेने गई है, आ जाएगी. अभी तो मेल के आने में तीन घंटे की देर है.

इसके अतिरिक्त, मेरे भीतर उसे जाती हुई देखने की भावना भी ज़ोर मार रही थी. ऑफिस का हर व्यक्ति उसकी चाल पर फ़िदा था. चपरासी तक उसकी चाल के प्रशंसक थे. गुप्ता तो जब तब सबसे कहता फिरता था,‌”चन्दवानी जब चलती है, मेरे दिल पर सांप लोटनेलगते हैं. ऐसा लगता है जैसे दूब पर नागिन चल रही हो.”

चन्दवानी जब चलती थी-अपनी देह को बिल्कुल दोहरा कर लेती थी. से उठती-गिरती लहरों की भांति ही लहरें उत्पन्न करती हुई वह सर्र से निकल जाती थी.

लेकिन आज उसकी चाल में वह शोखी नहीं थी. मछलियों सी चंचलता नहीं थी और न ही लहरों की भांति कंपन था.

मैं उसकी सीट पर जाकर बैठ गया और उसके लौट आने की प्रतीक्षा करने लगा. बैठे-बैठे चन्दवानी की उदासी का कोई भी कारण मैं नहीं समझ सका. अपनी समझ से मैंने उसे बहुत हल्का काम दे रखा‌ है, यदि कोई जमकर बैठे तो एक-दो घंटों में निबटा सकता था.

फिर भी चन्दवानी कुछ दबी-सी रहती थी, उखड़ी-सी रहती थी. मैं कई बार उससे पूछ चुका था, “काम यदि ज़्यादा हो, मुझसे बोल देना, मैं दूसरा इन्तजाम कर दूंगा.” लेकिन उसने आज तक इस संबंध में कुछ नहीं कहा था और हर बार हंस कर रह जाती थी.

उसकी सीट पर बैठे हुए मुझे आधा घंटा बीत गया. इस बीच कई क्लर्क आए और मुझे वहां बैठे देख रहस्यपूर्ण आंखों से घूरते हुए चले गए, उनके हावभाव देखकर ऐसा लगता था जैसे कमरे में फूलों की ख़ुशबू की जगह ढेर-सी बदबू मिल गई हो, जिसने उनके इधर आने का उद्देश्य ही विफल कर दिया हो.

शर्मा ने तो यहां तक कह दिया था, “बड़े बाबू की निगाह अब जाकर चन्दवानी पर पड़ी है. अब तो ख़ुद घंटों उसके पास बैठने लगे हैं.”

शर्मा के शब्द मेरे कानों में तीर की तरह लगे थे. मैंने एक बार खिड़की से इधर-उधर देखा. चंदवानी को गए पूरा घंटा भर हो गयाथा. लेकिन अभी तक वह लौटकर नहीं आई. बॉस के जाने में केवल दो घंटे रह गए थे और चपरासी के द्वारा वह जल्दी ही सूचनाएं ले आने के लिए दो बार कहला चुका था.

चन्दवानी पर मुझे क्रोध हो आया. सिधाई का वह नाजायज़ फ़ायदा ले रही है. घंटे भर तक बिना पूछे ऑफिस से गायब रहती है. मुझे कुछ देर और प्रतीक्षा करनी चाहिए, अन्यथा मजबूरन चपरासी को बुलाने भेजना पड़ेगा, या फिर आज की छु‌ट्टी लेने के लिए उससे कहना पड़ेगा. मेरी अपनी भी आख़िर मजबूरियां हैं. बॉस छाती पर खड़ा है. यदि यह सूचना उसे मेल से पहले नहीं दी गई तो पता नहीं, ऑफिस के ऊपर क्या आफ़त आ जाए. मुझे चार्जशीट मिल जाए. बॉस का रुखभी मेरे प्रति आजकल अच्छा नहीं है.

हर समय वह मेरे प्रशाासन की ढिलाई के विषय में कहता रहता है कि मेरा क्लर्कों पर रौब नहीं है. मेरे सेक्शन के क्लर्क आवारा घूमते रहते हैं.

आख़िर जब आधा घंटा और बीत गया तो मेरे धैर्य की सीमाएं जवाब दे गई. मैने स्वयं ही फाइलें ढूंढ़ना शुरू कर दिया. चन्दवानी की मेज क्या थी जैसे अटाला की जाने मस्जिद हो. कोई काग़ज़ कहीं पड़ा है, कोई फाइल मेज के नीचे पड़ी है तो किसी का आधा हिस्सा मेज पर और आधा ज़मीन पर पड़ा है. सारी मेज कबूतर के पंखों की भांति लग रही थी.

अन्त में जब मेल के जाने में केवल एक घंटा रह गया तो राम बिहारी दौड़ता हुआ मेरे पास आया. मुझे फ़ाइल ढूंढ़ते देखकर और न मिलने से उत्पन्न हुई घबराहट को ताड़कर वह चुपचाप खड़ा हो गया. उसे यूं चुपचाप खड़े देखकर मैं झुंझला उठा.

“यहां क्यों खड़ा है. जाकर देख चन्दवानी कहां गई है.” लेकिन राम बिहारी तो जैसे बुत बना हुआ था, जब मेरे कहने पर भी वह नहीं हिला तो मुझे लगा कि क्लर्क ही नहीं, चपरासी भी मेरे सीधेपन का अनुचित लाभ उठा रहे हैं और आगे से मुझे बहुत कठोर होने की ज़रूरत है.

“साहब का प्रोग्राम कैंसल हो गया. वे कल जाएंगे.”

“क्या बकता है.”

“अभी-अभी बोला बड़े बाबू को कह आओ हम कल जाएंगे.”

मेरे माथे से एक बोझ-सा उतर गया, मेरे सिर पर शायद पसीना आ गया था. रुमाल से मैंने वह सब पोंछा और वापस अपनी कुर्सी पर आ बैठा.

“एक ग्लास पानी तो ले आ…”

चन्दवानी अब तक भी नहीं आई थी. न उसके आने के कोई चिह्न ही दिखाई दे रहे थे. संभव है, वहबीमार हो गई है. इसी कारण घर चली गई हो. कहती तो यही रहती है उसे यहां का पानी मुआफिक नहीं आता. वह आए दिन बीमार रहती है.

लेकिन उसे दर्द था तो मुझसे पूछकर घर जाना चाहिए था. मैं क्या उसे मना कर देता. आज तक मैंने किसी क्लर्क को मना नहीं किया. जब भी किसी ने छुट्टी मांगी है मैंने हमेशा उसे छुट्टी दे दी है.

बास कल जाएगा. लेकिन सूचना तो निकालनी हीहै. संभव है, चन्दवानी सचमुच बीमार हो जाए और वह कल न आ सके तो फिर भी तो मुझे ही वह सब ढूंढ़ना पड़ेगा. यही सोचकर एक बार मैं फिर उसकी सीट पर गया और फाइल ढूंढ़ना शुरू किया.

पहले मैंने मेज के दराज नहीं देखे थे. कई क्लर्क ज़रूरी फाइलें मेज़ की दराजों में रखते हैं, इसीलिए मैंने मेज के दराज खोले.

राम बिहारी पानी ले आया था. पानी पीने के बाद ग्लास उसे देते हुए मैंने पूछा, “चन्दवानी कहां गई है, कुछ पता चला.”

“साहब ने शाम को उसे बंगले पर बुलाया था. उसने आने के लिए मना किया, जिससे साहब उससे नाराज़ हो गया. बस, तभी से वह रोती हुई बाहर चली गई है.”

रामबिहारी की बात सुनकर मैं एकदम सुन्न हो आया. मैंने जल्दी से दराज़ के काग़ज़ देख डाले. मेरी आंखों के आगे अंधेरा-सा छा गया था. यह मैंने अवश्य सुना था साहब आजकल अकेला ही है. मेमसाहब बाहर गई है और मिस आपटे भी आजकल छु‌ट्टी पर हैं.

दराज में फाइल नहीं थी, छोटे छोटे कागज के टुकड़ों को एक बड़े से कागज के साथ नत्थी करके बांध दिया गया था, मैं जल्दी से काग़ज़ के टुकड़ों को पढ़ गया.

“हम तुम पर जान देते हैं.”

“तुम्हारी चाल दिल पर तीर चलाती है.”

“रात को सोता‌ हूं तो तुम्हीं आगे आती हो. मैं झील में डूब जाता और नींद में भी लहरों में तैरता रहता हूं.”

“अब तो ज़्यादा मत तड़पा जालिम, वरना मेल के आगे लेटकर आत्महत्या कर लूंगा.”

और इन सबके अंत में एक लम्बा-सा पत्र था, जिसे हेड ऑफिस को सम्बोधित किया गया था और नीचे चन्दवानी के कांपते हुए हस्ताक्षर थे.

“मैं इस बदबू में सांस नहीं ले पाती हूं. कैसी बदबू है, कैसी दुर्गन्ध है, हर क्लर्क मुझे खाने दौड़ता लगता है.

रात दिन इनके कटु कटाक्ष सुनते-सुनते मैं तंग आ गई हूं. अब तक तो क्लर्कों में ही मैं यह बदबू पाती थी, और सोचती थी किसी दिन हवा का कोई साफ़ सा झोंका आएगा और यह बदबू शायद दूर हो जाएगी. लेकिन कुछ दिनों से बॉस की निगाहों में भी वही जानवर मुझे दिखाई दे रहा है जिसे हर समयमैं अपने आसपास देखती थी. वह बार-बार मुझे बुलाता है और चाहता है कि मैं हमेशा हीउसके पास बैठी रहूं. क्लर्कों से होती हुई यह बदबू बॉस तक भी जा पहुंची है और इसका एहसास मुझे आज हो गया.

मैं बॉस के बंगले पर जाने की अपेक्षा मर जाना बेहतर समझूंगी. इस ऑफिस में घुटन में मैं सांस नहीं ले पा रही. एक क्षण भी मैं यहां नहीं रह पाऊंगी…”

मुझे लगा आसपास चारों ओर बदबू भर गई है. तीखी तीखी, कड़वी-कड़वी, जिससे इस ऑफिस की दीवारें काली हो गई हैं. फाइलें, मेजें, कलम, दवात, काग़ज़ सभी इस बदबू में सन गए हैं.

मैंने उन काग़ज़ों को वैसे ही रखा और चुपचाप अपनी कुर्सी की ओर चल दिया.

– रवीन्द्र उपाध्याय 

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