उसकी मां सांत्वना की शीतल छाया प्रदान करती, जो अनीता का संबल था. पर किसी पराई स्त्री को जब कोई नरपिशाच अपनी हवस का शिकार बना लेता है तो क्या यह समाज उसकी रक्षा कर पाता है? नहीं न! तो फिर कैसे आशा की जाए कि अनीता उस दुष्प्रभाव की ज्वाला से बच जाएगी?
सुबह-सुबह कॉलेज मोड़ के पास पड़े नवजात शिशु का क्रंदन सुनकर लोगों की भीड़ इकट्ठी हो जाती है. लोग तरह-तरह की बातें करते हैं. अनीता भी अपने को नहीं रोक पाती. वहां जाकर वह शिशु की हालत देख अंदर तक दहल जाती है. लोगों की बातें उसे नश्तर सी चुभती हैं.
अनीता की शादी को तीन वर्ष बीत चुके थे, लेकिन गौना अभी तक नहीं हुआ था. उसके ससुर हर बार इस बात को टाल जाते थे. इधर अपने घर में भी अनीता को भाभी के ताने सुनने पड़ते थे. रोज़मर्रा की इन बातों से वह टूट चुकी थी.
एक दिन अनीता के जीजाजी प्रशांत आते हैं. प्रशांत का मज़ाकिया लहज़ा अनीता को अच्छा लगता है. वह उनके स्वागत की तैयारी करने में व्यस्त हो जाती है. घर के अन्य सदस्य उस दिन फिल्म देखने गए हुए थे. अनीता अकेली थी, यह अकेलापन प्रशांत की भावनाओं को उद्वेलित करता है. न चाहते हुए भी अनीता प्रशांत की वासना का शिकार हो जाती है.
घर में अन्य सदस्यों की अनुपस्थिति ने प्रशांत को वह शक्ति प्रदान कर दी थी, जिसके तहत वह कुकर्म करने में सक्षम था.
"मैं बर्बाद हो जाऊंगी जीजा... मुझे छोड़ दो... मैं पैर पकड़ती हूं."
प्रशांत की पकड़ कसती जा रही थी. उसने अनीता को जबरन बिस्तर पर ला पटका, वह चीख-चिल्ला रही थी, जिसे मेघ की गर्जना ने ढंक लिया था.
उसने अपने को बचाने की भरसक कोशिश की थी, पर वह अपने को बचा नहीं सकी. वह शिकार हो ही गई उसकी हवस का.
बारिश थम गई थी, किंतु अनीता की आंखें बरस रही थीं. आंसुओं की आड़ी-तिरछी रेखाएं उसके चेहरे पर उभर आई थीं. सिर झुकाए वह सिसकती रही थी. उसका अंतस मर्माहत हो गया था.
धूर्त जीजा को लगा, कहीं बात बिगड़ न जाए, लोग जान न जाएं, तत्क्षण उसके दिमाग़ में एक नाटक ने जन्म लिया. वह बिना वक़्त गंवाए अनीता का पैर पकड़कर गिड़गिड़ाने लगा, "माफ़ कर दो... शर्मिंदा हूं मैं अपनी करनी पर, न जाने कौन सा भूत सवार हो गया था मुझ पर..."
वह यों सिसकती चली जा रही थी, मानो उसने कुछ सुना ही न हो. प्रशांत पैर पकड़कर लगातार भिक्षुक की तरह माफ़ी मांग रहा था, "माफ़ कर दो. तुझे मेरी क़सम, मेरे मुन्ना की क़सम, माफ़ कर दो..."
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अनीता उसे माफ़ कर सकी या नहीं, कहना बहुत ही मुश्किल था.
कुछ देर बाद दरवाज़े पर दस्तक हुई थी. अनीता अस्त-व्यस्त वस्त्रों को ठीक करते हुए दूसरे कमरे में भाग गई थी. दस्तक़ लगातार जारी थी. प्रशांत ने फुर्ती से तौलिया से मुंह पोंछा, बालों में कंधी को और तेज़ी से चल पड़ा दरवाज़ा खोलने.
दरवाज़ा खुलने पर माता जी, बहू और बेटी खड़े थे.
"आप कब आए?" कांति ने पूछा.
प्रशांत ने कांति का चरण स्पर्श किया और बहू को नमस्ते कहते हुए उसने आगे कहा, "पिकनिक से लौट रहा था, सोचा मुलाक़ात करता चलूं." सब लोग अंदर की ओर चल पड़े.
"मुन्ना, राकेश... बचिता का हालचाल कहिए?"
"सब कुशल है मांजी," हकलाते हुए प्रशांत ने कहा.
"आप परेशान दिख रहे हैं, पसीने से तर कमीज़ देखकर मां ने पूछा.
"नहीं, नहीं... बात ऐसी है, गर्मी अधिक है... तबीयत ठीक नहीं लग रही है... सिर में भी..."
"आराम कीजिए, जाइए कमरे में, अनीता सुनती हो, कहां छिप गई है?" चारों तरफ़ देखते हुए कांति ने कहा.
"बिस्तर पर पड़ी अनीता मां की आवाज़ सुनती रही, पर अपने कमरे के बाहर नहीं निकली. कुछ ही पल बाद उसकी मां अनीता के पास पहुंची. अनीता को बिस्तर पर पड़ी देखकर हैरत से बोली, "तू क्यों नहीं बोलती? तेरी ज़ुबान को क्या हो गया है?"
"मेरा मन कैसा तो कर रहा है मां... मेरी तबीयत ठीक नहीं है." उसने बिस्तर में मुंह छिपा लिया था. उसकी आंखें भर आई थीं, जिनके बहने पर जबरन रोक लगा दी थी. मां कमरे से बाहर निकल गई थी.
बिस्तर पर पड़ी रही, देह में दर्द का बहाना बनाकर वह किस मुंह से अपने जीजा के धिनौने कर्म को उजागर करे अपनी मां के समक्ष? शर्म व लज्जा से गड़ी जा रही थी. पर-पुरुष से संबंध की बात कहना? दूसरे तो दूसरे ही हैं, अपने मां-पिता भी क्या इसे बर्दाश्त कर सकते है? नहीं ना.
वह सोच रही थी कि अगर इस हादसे के बारे में प्रचार हो गया तो वह जीते जी मर जाएगी. क्या उसका पति इसे सहन कर पाएगा? शायद उसका त्याग भी कर दे, उसका अंतस हाहाकार कर उठा. वह क्या मुंह लेकर रमेश के सम्मुख उपस्थित होगी? इस बात ने उसके कलेजे को चाक करके रख दिया था.
उसके जीजा ने उसकी गृहस्थी बसने के पहले ही उसमें जहर घोल दिया था. इस घिनौने कर्म ने अनीता के चेहरे पर मर्द जाति के प्रति घृणा के भाव अंकित कर दिए थे. पर क्या कर सकती थी? वह विवश थी उस कामुक मर्द की यातना झेलने के लिए.
यह समाज औरत की विवशता और व्यथा सुनकर सिवा अपमानित करने के और क्या करता.
बिस्तर पर वह बेचैनी से करवटें बदलती रही, पर नींद उससे कोसों दूर भाग गई थी. दिमाग़ की नसें तन गई थीं. मालूम पड़ता था, जैसे सिर फट जाएगा. इसी ऊहापोह में उसने इस घटना को अपने ही तक सीमित रखने का फ़ैसला किया.
उसके जीजा की ख़ातिरदारी में कोई कमी नहीं हुई. वह निष्कलंक बनकर ससुराल का सुख भोगता रहा और दूसरे ही दिन वह ज़रूरी काम का बहाना कर वहां से प्रस्थान कर गया.
प्रशांत के जाने के बाद ही अनीता की सांस में सांस आई. जब तक वह रहा, उसे सशंकित नेत्रों से देखती रही और अपने को बचाने का प्रयास करती रही थी.
दिन सप्ताह में, सप्ताह महीनों में तेज़ी से बदलने लगे. अपनी व्यथा से अस्त, दिल में बने ज़ख्म को वेदना को अपने सीने में छिपाए वह जिए जा रही थी.
पांच माह बीत चुके थे वह आसमान से तब गिरी, जब उसकी देह में परिवर्तन आने लगा.
मन का जुनून तन को शक्ति देता है. तन की शक्ति ज़िंदगी को परवान चढ़ाती है.
शारीरिक प्रक्रिया में परिवर्तन तो कई माह पहले से ही पारंभ हो गया था. पर लज्जावश वह लम्बे समय तक उस घटना को छिपाए रही. सृजन की प्रक्रिया उसकी कोख में अविरल गति से जारी थी.
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वह व्यग्र हो उठी, जाल में फंसी हिरणी की तरह. वह कातर दृष्टि से कभी मां को, कभी अपने बापू को देखती. वह चाहती थी कि मां से सारी बातें बता दें, पर उसकी ज़ुबान पर बात आते-आते रुक जाती. हर रात सोते वक़्त सोचती कि कल अपने जीजा के घिनौने कारनामे को अपनी मां के समक्ष उजागर कर देगी, पर हर सुबह उसकी हिम्मत जबाव दे देती.
उस दिन अनीता की उल्टी बंद नहीं हो रही थी. उसका जी मिचला रहा था. डॉक्टर बुलाया गया. डॉक्टरी जांच के बाद डॉक्टर ने जो बातें उसके पिता के कान में कहीं, उससे घर में हड़कम्प मच गया. लगता था, जैसे भूचाल आ गया हो. घर से डॉक्टर के जाने के बाद उसके पिता की आंखें ग़ुस्से से लाल हो गईं. उन्होंने धीमी पर गंभीर आवाज़ में कांति को फटकारा. उसकी मां कांपती गाय की तरह भयभीत, सशंकित जगत के सामने खड़ी थी. उसने दांत पीसते हुए तल्ख़ आवाज़ में कहा, "यह मैं क्या सुन रहा हूं तू घर में आंख बंद किए रहती है? मैं दुकान संभालू या घर देखूं? तुझ पर मैं कितना भरोसा करता था कांति, लेकिन मेरे मुंह पर कालिख पोत कर रख दी तेरी लाड़ली ने.... मुझे कहीं का नहीं रखा."
कांति को काटो तो खून नहीं. उसके पांव के नीचे की ज़मीन खिसक गई थी. अप्रत्याशित घटना ने कांति को उस समय बेज़ुबान बना दिया था. उधर जगत प्रलाप कर रहा था, "अरे। कैसे दिखाऊंगा अपनी ज़ात-बिरादरी में सूरत, हे ईश्वर! अरे, ऐसा मैं जानता तो इस कलमुंही का जन्मते ही गला घोंट देता."
कुछ देर बाद कांति सामान्य स्थिति में लौट आई. अपने परिवार की नाज़ुक स्थिति का आभास होते ही बिगड़ी परिस्थिति को संभालने के ख़्याल से कांति ने कहिए, "अजी चुप भी रहो! पास-पड़ोस के लोग सुन लेंगे तो इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी. कितनी जग हंसाई होगी? चुप रहो. लोगों ने सुन लिया तो थूकेंगे हम पर."
उसी क्षण दरवाज़े की ओट से अनीता की भाभी ने मुंह बिचकाते, हाथ नचाते हुए कहा, "छीः छी! कैसा घृणित काम किया अनीता ने, मुंह काला करने के पहले कुछ तो सोचती."
"चुप रहो बहू. इस मुसीबत में धीरज से काम लो. इससे कैसे छुटकारा मिले, मिल-जुल कर सोचो."
मैं तो चुप रहूंगी, कितनों का मुंह बंद करोगी सासूजी? मुझे तो पहले से ही शंका थी, जब मोहल्ले के लौंडों के साथ घंटों हंसी-ठिठोली करती थीं महारानी, पर कौन सुने मेरी बात. मेरी बात से तो सबको जलन होती थी भुगतो अब."
अनीता बिस्तर में मुंह छिपाए रोए जा रही थी. भाभी को एक-एक बात बुझे तीर की तरह कलेजे में चुभ रही थी. उसकी इच्छा हो रही थी, आत्महत्या कर ले, पर ऐसा कुछ वह नहीं कर सकी. वह मानसिक और शारीरिक यातना के भंवर में फंसती जा रही थी.
जगत अपने कमरे में सिर पकड़कर बैठा था. उसके परिवार पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा था. मसला नाज़ुक और गंभीर था.
अनीता के भाई का खून खौल उठा अपनी पत्नी से इस अप्रत्याशित घटना को सुनकर आवेश में चाय की प्याली फेंकते हुए गरज उठा, "कौन है वह कमीना? खून कर दूंगा मैं उसका, जिसने हम लोगों के मुंह पर सरेआम कालिख पोत दी."
वह बैठा नहीं रह सका. कुछ क्षणों के लिए वह अपने होश-हवास गंवा बैठा वह ग़ुस्से में कांपते हुए चीख पड़ा, "अनीता, तूने यह क्या किया? मैं तेरी बोटी-बोटी काट कर..."
वह दौड़ पड़ा अनीता के कमरे की ओर उसकी पत्नी ने तेज़ी से लपक कर बलवीर को अपने बाहुपाश में जकड़ लिया. बलवीर की आंखों में खून उतर आया था. उसकी पत्नी ने व्यंग्यबाण छोड़ते हुए कहा, "अजी, ख़ामोश रहो. अब क्या करोगे? जब चिड़िया चुग गई खेत तो सिर पीटने से क्या होगा?"
"क्या बकती हो? मैं उस कुत्ते को किसी क़ीमत पर नहीं छोडूंगा, चाहे जो हो."
"उसका क्या दोष? मर्द के पास औरत जाए तो वह उसे कैसे छोड़ दे? बाघ के पास जाकर कोई कहे कि मुझे खा जाओ तो क्या छोड़ देगा? इसमें सब तेरी बहन का कसूर है. न जाने किसका पाप अपनी कोख..."
"ख़ामोश रहो." बलवीर चीख पड़ा.
"मुझ पर क्यों बिगड़ते हो? मैं तो चुप हूं." नाराज़ होकर उसकी पत्नी अपने शयन कक्ष से बाहर निकल गई. अनीता का घर बारूद के ढेर पर अवस्थित था, जिसमें एक छोटी-सी चिंगारी भी बहुत बड़े हादसे का कारण बन सकती थी.
उस रात चारों ओर सन्नाटा छाया था. अनीता और कांति को छोड़ परिवार के सभी सदस्य ख़ामोश ड्रॉइंगरूम में बैठे थे. घृणा और क्षोभ के वशीभूत हो अनीता की ओर से सभी ने मुंह मोड़ लिया था.
ड्रॉइंगरूम में कांति के कदम रखते ही सभी उतावले हो उठे. कुछ पल वह ख़ामोश रही. कांति की नज़र जगत से मिली. आंखों ही आंखों से कुछ इशारा पाकर जगत ने तत्काल ही बलवीर और बहू को कमरे से बाहर जाने का इशारा किया. बेटे और बहू के बाहर निकलते ही कांति ने घृणा से मुंह सिकोड़ते हुए बताया कि यह करनी अपने ही जमाई की है. लेकिन दीवार को भी कान होते हैं. घर के सारे लोग कुछ ही पल में प्रशांत के कारनामों से अवगत हो चुके थे.
सच्चाई जब बे-परदा हुई तो सब विस्फारित नेत्रों से क्षितिज की ओर देखते रह गए थे. मानो सबको लकवा मार गया था. सबका सिर शर्म से झुक गया. बलवीर के आवेग के उफान पर घड़ों पानी पड़ गया था. कांति की खड़े रहने की शक्ति जाती रही. वह अपने कमरे में धम् से बिस्तर पर जा गिरी. उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे.
इस हादसे का प्रणेता कभी अपना काला चेहरा दिखाने उपस्थित नहीं हुआ. काफ़ी सोचने-विचारने के बाद उसके माता-पिता ने डॉ. से गुप्त परामर्श लेकर एबॉर्शन करवाने का निश्चय किया.
अनीता के घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी गई. सख्त हिदायत दी गई कि वह किसी से भी न मिले. वह अपने ही घर में क़ैदी की ज़िंदगी जीने को विवश थी.
दूसरे ही दिन डॉक्टर घर में बुलाया गया. मेडिकल चेकअप के बाद डॉक्टर ने जो परामर्श दिया, उसे सुनकर जगत के होश उड़ गए. वह काफ़ी चिंतित नज़र आने लगा. डॉक्टर के अनुसार पांचवे माह में एबॉर्शन करवाना ख़तरे से खाली नहीं था. इसमें जान जाने का भी भय था.
उसके परिवार के लोगों के आक्रोश का उफान चरम बिंदु पर था, यह बात सुनकर सबको सांप सूंघ गया घर में श्मशान-सी नीरवता छा गई. एक ही दिन में माता-पिता और भाई का चेहरा निस्तेज, बासी, पीले पत्ते की तरह दिखने लगा था. विक्षुब्ध कांति घर की देहरी पर ख़ामोश बैठकर टकटकी लगाए राहगीरों को देखती. अनीता के पिता कमरे में निढाल पड़े थे. कमरे में गिरफ़्तार अनीता निर्विकार भाव से पड़ी थी. घर में मातम व्याप्त था. अनीता के दर्द को समझने वाली अकेली मां ही उस परिवार में थी.

सहसा कांति की आवाज़ ने घर के सन्नाटे को तोड़ा, "छोड़िए जी. अभी कुछ कराने से मेरी बेटी की जान को ख़तरा है."
किचन में व्यस्त अनीता की भाभी अपनी सास की बात सुनकर आ धमकी और हाथ नचाते हुए कहा, "हां, हां, हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहिए, लोगों में ख़बर फैल गई न... तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहिएगा."
"ऐसा मत कहो बहू. ऐसा नहीं होगा. यह ख़बर हम लोग फैलने नहीं देंगे."
"हूं! दीवार के भी कान होते हैं. इस लड़की को तो ज़रा भी शर्म व हया नहीं. ऐसा कर्म करने के पहले कुछ तो सोच लेती. छी! छी।!नाक कट गई."
"खामोश रहो बहू. इसी तर्क-वितर्क में बात फैलने का डर रहता है."
"मैं तो चुप हूं. ज़माना चुप रहे, तब ना!"
"अब क्या करें? नासमझी में ग़लती कर बैठी तो क्या उसकी जान ख़तरे में डाल दूं? और इसमें मेरी बच्ची का क्या दोष? दोष तो उस मुंहजले का है, जिसने मेरी बेटी की ऐसी गत बना डाली."
"हां, हां, इसमें आपकी बच्ची का क्या दोष? आपकी बच्ची तो दूध पीती बच्ची है न. रोटी दोनों हाथ से पकती है मांजी." बहू ने व्यंग्यबाण छोड़ा.
"नहीं बहू. मर्द जब अड़ जाता है तो औरत
बेचारी क्या कर सकती है?"
वाद-विवाद, बातों की खींचा-तानी, तर्क-वितर्क के बाद जगत की सहमति से यह निर्णय लिया गया कि गर्भ के परिपक्व होने के बाद ही प्रसवोपरांत कोई उपयुक्त कदम उठाया जाएगा.
चार माह के लिए वह घर कारागार में तब्दील हो गया था, जहां मानसिक यंत्रणा से परिपूर्ण यातना के आघात से वह आहत होकर टूटती रही थी. आंखें हमेशा भीगी रहतीं. समय के उस अंतराल में उसके भाई और भाभी उसकी ओर निगाह उठाने में भी तौहीन समझते थे. उसके कमरे के समीप आते-जाते नज़र पड़ भी जाती तो घृणा से मुंह दूसरी ओर फेर लेते. उसके दर्द को उसे जन्म देने वाली मां के सिवा कौन समझ सकता था? मां ही उसका ख़्याल रखा करती थी.
अनीता को एक-एक पल काटना दूभर था. उसे एक-एक क्षण दशक के तुल्य था, संत्रास के दो माह झेलकर वह सातवें माह में पहुंच गई. उसके दिल में एक छटपटाहट थी इस अपमानजनक ज़िंदगी से मुक्ति के लिए. अपने जीजा की हवस का शिकार वह जीती थी, न मरती थी. ऊपर से भाभी की प्रताड़ना उसके कलेजे में नश्तर की तरह चुभती थी. वह बार-बार अपनी मां से मौत की भीख मांगती, "थोड़ा-सा ज़हर लाकर दे दो मां, मैं किस मुंह से इस संसार में जीऊंगी? क्या लोग मुझे चैन से जीने भी देंगे?"
उसकी मां सांत्वना की शीतल छाया प्रदान करती, जो अनीता का संबल था. पर किसी पराई स्त्री को जब कोई नरपिशाच अपनी हवस का शिकार बना लेता है तो क्या यह समाज उसकी रक्षा कर पाता है? नहीं न! तो फिर कैसे आशा की जाए कि अनीता उस दुष्प्रभाव की ज्वाला से बच जाएगी?
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घर के लोग कलेजे पर पत्थर रखकर एक-एक दिन गिन रहे थे. छोटी सी बात पर भी पिता पुत्र पर, पुत्र मां पर, पति पत्नी पर उबल पड़ते. माहौल कलह से सराबोर था. इस हादसे का ज़िक्र बरक़रार रखने की चिंता खाए जा रही थी. हर शाम को जगत दुकान से लौटने के बाद अनीता की गतिविधियों का हिसाब-किताब करता.
समय के क्रम के साथ सृजन की प्रक्रिया त्वरित हो रही थी. कोख में पलने वाला आकार ले चुका था. उसमें जीवन का संचार हो चुका था. पेट में पलने वाले की हलचल से अनीता का दिल दरक गया था.
उस घटना को घटे नौ माह बीत चुके थे. उस रात की कालिमा उत्तरोत्तर बड़ी होती जा रही थी. मानो रात के चेहरे पर किसी ने जबरन कालिख पोत दी हो. आकाश घिर गया था काले काले बादलों से. तारों ने बादलों के दामन में अपना चेहरा छिपा लिया था. चातुर्दिक नीरवता व्याप्त थी. झींगुरों व मेढ़कों की आवाज़ से वातावरण उद्विग्न था.
जब सारी दुनिया सो रही थी, उस वक़्त हलचल मची थी जगत के घर में. डाक्टर, नर्स व अन्य सहायकों का दल चुपके से घर में दाख़िल हो चुका था. ख़ामोश रहकर काम करने तथा इस ख़बर को इधर-उधर नहीं फैलाने की सख्त हिदायत दी गई थी. मुंह बंद रखने की क़ीमत पहले ही अदा कर दी गई थी.
अनीता की देह के पोर-पोर में असहनीय दर्द व पीड़ा व्याप्त थी. जानलेवा वेदना से बदन टूट रहा था. उसे खुलकर रोना भी मना था. उसकी आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे.
डॉक्टरों का तंत्र प्रसव कराने की प्रक्रिया में मुस्तैदी से जुट गया था.
अनीता भयानक पीड़ा से कराह रही थी. उसके ज़ोर से चीखने पर पाबंदी थी.
बंद कमरे के बाहर ओसरे में जगत बेचैनी से चहलकदमी कर रहा था. अन्य लोग दूसरे कमरे में ख़ामोश पड़े थे, मानो उन्हें सांप संघ गया हो. समय-समय पर जगत डाक्टर से स्थिति की जानकारी लेता रहा था.
अचानक उसका चेहरा क्षोभ और घृणा से विकृत हो गया था, जब उसने नाली में पानी मिश्रित खून का बहाव देखा था.
कुछ पल बाद ही शिशु के रोने की आवाज से घर का वातावरण कुम्हला गया था. उस आवाज़ को ढंक लिया था बारिंश की आवाज़ ने. जगत के घर में हड़कंप मच गया था. वातावरण में धीमी आवाज़ें रेंगने लगी थीं. डॉक्टर अपने कारिन्दों समेत घर से जा चुका था.
बारिश थम गई थी. चारों ओर घनघोर अंधेरा छाया था रह-रहकर उल्लू के चीखने की आवाज़ें माहौल को भयावह बना रही थीं.
अनीता बिस्तर पर अर्द्ध मूर्छित अवस्था में पड़ी थी. बगल में बिस्तर पर पड़ा था सृजनहार का अवैध सृजन. सहसा निष्ठुर दो पंजे झटके से आगे बढ़े और लपक लिया था शिशु को. बच्चे का रुदन उभरा, जिसे झट मुंह पर कपड़ा रखकर उसकी आवाज़ को शिशु के गले में ही दफन कर दिया था. अंधेरे में दो आदमी चल पड़े थे अवैध सृजन को विनष्ट करने.
- गुरुबचन सिंह

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