
संगीता माथुर
“बारात में कुछ ऐसे भी थे, जो चुपके से दूसरों की प्लेट में झांकते, प्रभावित होते और फिर वही व्यंजन अपनी प्लेट में परोस लेते. कई स्टूडेंट्स को हमेशा दूसरों के पढ़ने का तरीक़ा और पाठय सामग्री ही लुभाते हैं और वे उन्हें अपनाने में ही लगे रहते हैं. तो कुछ ऐसे भी होते हैं, जो संयम से एक-एक व्यंजन प्लेट में परोसते हैं. पूरा समाप्त करते हैं, फिर अगले व्यंजन की तरफ़ बढ़ते हैं. पर जब अपने पसंदीदा व्यंजन तक पहुंचते हैं तो पता चलता है पेट ही भर चुका है.” प्रोफेसर आनंद गंभीर थे.

चारों ओर हंसी-ख़ुशी और उल्लास बिखरा पड़ा था. प्रोफेसर आनंद और उनकी पत्नी जया भी जेन ़ज़ेड के साथ सभी रस्मों का मस्ती और ठहाकों सहित लुत्फ़ उठाते ख़ुद को युवा महसूस कर रहे थे. युवा वही होता है जिसके हाथों में शक्ति, पैरों में गति, दिल में ऊर्जा और आंखों में सपने होते हैं. और प्रोफेसर आनंद और उनकी पत्नी ऐसा ही महसूस कर रहे थे. लगभग आधे से ज़्यादा जी बैच अंगद की शादी में उपस्थित हो गया था. कुछ तो सपत्नी तो कुछ बच्चों सहित भी थे. नाच-गाने से लेकर हल्दी, मेहंदी, जूता छुपाई, रिंग सेरेमनी हर रस्म में अंगद के साथी बैचमेट बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे. उन सभी के पसंदीदा प्रोफेसर डॉक्टर आनंद ने सपत्नी शादी में सम्मिलित होकर विवाह समारोह में चार चांद लगा दिए थे.
शादी में सम्मिलित लोग कहने लगे थे कि यह शादी कम, कॉलेज की रियूनियन पार्टी ज़्यादा लग रही है. अधिकांश रस्में निपट चुकी थीं. अब बस मध्य रात्रि के फेरे होने बाकी थे. दुल्हन उसके लिए तैयार होने चली गई, तो दूल्हा अंगद भी थोड़ा फ्री और रिलैक्स अनुभव करते हुए शामियाने में गपियाते अपने दोस्तों के संग आ बैठा.
“अभी फेरों में टाइम है. क्यों ना गरम-गरम कॉफी का एक दौर हो जाए! ये जो हमारे कुछ ऊंघते हुए प्राणी हैं, इन्हें भी होश आ जाएगा.” अंगद के ख़ास दोस्त रमन ने चुटकी ली. उसका इशारा जय, नलिनी और अमेय की ओर था, जो थककर जम्हाइयां ले रहे थे. सभी ठठाकर हंस पड़े.
“अरे ये तो कॉलेज के ज़माने से ऐसे ही हैं. याद नहीं, पढ़ाते वक़्त आनंद सर इनसे बीच में कितने सवाल-जवाब करते रहते थे, ताकि ये सो न जाएं. ठीक कह रहा हूं ना सर?” सारंग ने चुटकी ली. अब तक कॉफी आ गई थी. सारंग ने ऊंघते दोस्तों की ओर इशारा करते हुए फिर परिहास किया.
“पहले उन मुरझाई सब्ज़ियों पर छिड़को भैया.”
“सर आप तो हम सब स्टूडेंट की रग-रग से वाकिफ़ रहे हैं. थोड़ा बताइए ना कौन कैसा था? आप टीचर्स क्या बात करते थे हमारे बारे में?” पल्लवी ने आनंद सर से आग्रह किया, तो सबकी उत्सुक निगाहें सर की ओर उठ गईं.
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“अरे छोड़ो ये सब पुरानी बातें. अभी सबका करियर अच्छा चल रहा है. मैं इसी में ख़ुश हूं.” आनंद सर ने टालना चाहा. लेकिन सब पीछे ही पड़ गए. “सर, आपने हमारे इस कॉलेज रूपी परिवार को मालिक बनकर नहीं, माली बनकर संभाला है. जो ध्यान तो सबका रखता है, पर अधिकार किसी पर नहीं जताता. आपको शायद लग रहा है कि कुछ की फैमिली साथ है, तो क्यों उनकी सबके सामने पोल खोली जाए. पर सर ऐसा कुछ नहीं है. मेरे बीवी-बच्चे भी साथ हैं. हमें आपके मुंह से अपने बारे में सुनकर अच्छा ही लगेगा.” नितिन ने आग्रह किया. “हां सर, हम भी सुनना चाहते हैं. सर, हम सभी नॉस्टैल्जिक हो रहे हैं. प्लीज़ बताइए ना!” ज्योत्सना ने सबकी हां में हां मिलाई. प्रोफेसर आनंद मुस्कुरा उठे. “तुम आज भी वैसी की वैसी ही हो ज्योत्सना! पहले सबको देखती, सुनती हो और फिर बहुमत की ओर ही झुक जाती हो.”
“आपने इसे सही जज किया सर. अभी जब बारात का खाना चल रहा था, हम चार-पांच दोस्तों को चाइनीज स्टॉल पर मंचूरियन फ्राइड राइस बहुत पसंद आए थे, तो हम प्लेटों में वही भरकर बाकी दोस्तों के पास आ गए और तारीफ़ कर करके खाने लगे. ज्योत्सना उठी. अपनी अधूरी प्लेट डस्टबिन में डाली और मंचूरियन फ्राइड राइस उठा लाई.” नलिनी ने कहा तो सभी की गर्दनें सहमति में हिलने लगीं. ज्योत्सना भी खिलखिला उठी.
“मुझे अपने बारे में जानकर बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा. पर सर, औरों के बारे में भी तो बताइए.”
“अभी तुम्हारी बात ही पूरी नहीं हुई. पढ़ाई को लेकर भी तुम्हारा नज़रिया ऐसा ही था. सब जो सब्जेक्ट ले रहे हैं, सब जो बुक्स पढ़ रहे हैं, सब जिससे ट्यूशन ले रहे हैं, तुम भी वही करने लगती थी. इनफैक्ट ज़्यादातर स्टूडेंट्स तुम्हारी तरह सेफ साइड में रहना ही पसंद करते हैं. ऐसे लोग बारात के खाने में भी सदाबहार दाल-चावल, पनीर लेकर खाना पसंद करते हैं. कोई नया व्यंजन ट्राई करने में वे हिचकिचाते हैं.” पहले प्रिया, फिर धीरे-धीरे प्रणव, नयन के हाथ उठ गए.
“सर हम भी इसी कैटेगरी में आते हैं.” वे हिचकिचा रहे थे.
“और तुम सभी आज सिविल इंजीनियर हो. कामयाब सिविल इंजीनियर. परंपरागत मार्ग चुनने में कोई बुराई नहीं है. बस, स्वभाव की बात है.” प्रोफेसर ने उनका उत्साहवर्धन किया, तो उनके चेहरे खिल उठे.
प्रोफेसर ने बातचीत आगे बढ़ाई, “कई बाराती ऐसे भी थे, जिन्होंने अपनी प्लेट में ढेर सारे व्यंजन भर लिए थे. बल्कि सारे व्यंजन उन्होंने एक साथ प्लेट में भर लेने का प्रयास किया था. लेकिन जब स्वाद नहीं जंचा या पेट भर गया, तो बचा हुआ खाना चुपके से डस्टबिन में उड़ेल आए. मैं नाम नहीं लूंगा आप ख़ुद ही ख़ुद को जज कर लें. कई स्टूडेंट्स का प्रयास रहता है कि उनके पास सारी बुक्स, रेफरेंस बुक्स, टयूटोरियल नोट्स आदि होने चाहिए. भले ही वे उसका एक चौथाई भी ना पढ़ पाएं.” यश ने हिम्मत जुटाकर हाथ उठाया, “सर मैं अपनी यह कमज़ोरी जानता हूं. अब से सुधारने की कोशिश करूंगा.” दो-तीन हाथ और उठ गए और सभी ने यही संकल्प दोहराया. प्रोफेसर आनंद ने उनके लिए ताली बजाई, “ऊंचाई पर वे लोग ही पहुंचते हैं, जो बदला लेने की नहीं बदलाव लाने की सोच रखते हैं. मन सभी के पास होता है, मगर मनोबल कुछ ही लोगों के पास होता है.” बाकियों के सब्र का बांध अब टूटने लगा था. वे जानने को उत्सुक थे कि वे किस कैटेगरी में आते हैं?
प्रोफेसर आनंद उनकी मनःस्थिति भांप मुस्कुरा उठे. फिर कुछ सोचकर बोले, “बारात में कुछ ऐसे भी थे, जो चुपके से दूसरों की प्लेट में झांकते, प्रभावित होते और फिर वही व्यंजन अपनी प्लेट में परोस लेते. कई स्टूडेंट्स को हमेशा दूसरों के पढ़ने का तरीक़ा और पाठय सामग्री ही लुभाते हैं और वे उन्हें अपनाने में ही लगे रहते हैं. तो कुछ ऐसे भी होते हैं, जो संयम से एक-एक व्यंजन प्लेट में परोसते हैं. पूरा समाप्त करते हैं, फिर अगले व्यंजन की तरफ़ बढ़ते हैं. पर जब अपने पसंदीदा व्यंजन तक पहुंचते हैं तो पता चलता है पेट ही भर चुका है.” प्रोफेसर आनंद गंभीर थे.
“सर मेरे साथ ऐसा ही होता है. मैं हर शादी से ऐसे ही लौटती हूं. पेट तो भर जाता है, मन रिक्त रह जाता है.” सलोनी ने स्वीकारोक्ति दी.
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“जया भी पहले ऐसा ही करती थी. फिर उसने इसका समाधान खोज निकाला. अब वह पहले पूरे पंडाल का चक्कर लगाती है. समस्त व्यंजनों में से अपने पसंदीदा व्यंजन सिलेक्ट करती है. और उन्हें ही एक-एक करके प्लेट में परोसती जाती है और भोजन का भरपूर लुत्फ़ उठाती है.” प्रोफेसर आनंद ने बताया.
“वाह, अब से मैं भी ऐसा ही करूंगी. बल्कि सोच रही हूं कि मैं जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हूं उनकी तैयारी में भी यही तरीक़ा अपनाऊं. पहले संबंधित पाठ्य सामग्री की विस्तृत सूची बना लूं. फिर उसमें से रुचि, सिलेबस और समय के अनुसार पाठ्य सामग्री चुन लूं और तदनुसार पढ़ाई करूं.”
“बेस्ट आईडिया है.” कइयों के मुंह से एक साथ निकल गया.
“जिस इंसान के पास समाधान करने की शक्ति जितनी ज़्यादा होती है, उसके रिश्तों का दायरा उतना ही विशाल होता है. जैसे कि तुम्हारे पास है. अपनी जया आंटी को बताना. वे बहुत ख़ुुश होंगी. अरे जया कहां है? काफ़ी देर से नज़र नहीं आ रही?” प्रोफेसर आनंद व्यग्रता से इधर-उधर नज़रें दौड़ाने लगे, तो सभी स्टूडेंट्स की नज़रें भी उन्हें तलाशने लगीं. तभी दूर से जया जी थके कदमों से इधर ही आती दिखाई दीं.
“अरे तुम कहां रह गई थी?”
“जूठी प्लेट रखने गई, तो नज़रें बरबस ही शामियाने के दूसरी तरफ़ चली गई थी. बहुत वीभत्स दृश्य था. मन बहुत अशांत हो उठा है.”
“अरे ऐसा क्या देख लिया?” प्रोफेसर आनंद के कदम स्वतः ही शामियाने के उसे छोर की ओर उठ गए. तो बाकी सब भी उत्सुकता वश उनके पीछे-पीछे हो लिए. दृश्य वाकई बहुत करूणा जनक था. कुछ गरीब बच्चे जूठी प्लेटों में से भोजन के अवशेष उठा-उठाकर खा रहे थे. कइयों ने तुरंत मुंह फेर लिया. कुछ की आंखें नम हो उठीं, तो कुछ के चेहरों पर घृणा के भाव उभर आए. ज़्यादा देर वहां खड़े रहना दुरूह था. सब थके कदमों से जया जी के पास लौट आए. जो अभी भी शोक मग्न बैठी थीं. उनके साथ-साथ कई प्रत्यक्षदर्शी भी गहरे आघात में थे.
“मैम, मैं आज से प्रण लेती हूं. शादियों में तो क्या, मैं घर में भी प्लेट में अन्न का एक दाना भी जूठा नहीं छोडूंगी.” ज्योत्सना गंभीर और दृढ़ थी. कुछ अन्य साथी भी उसके समर्थन में उतर आए. जयाजी छोटी उम्र के इस बड़े निर्णय से ख़ासी प्रभावित हुईं.
“तज़ुर्बे का नहीं उम्र से कोई वास्ता, कम उम्र के तज़ुर्बे भी बदल देते हैं रास्ता.” उनके मुंह से बरबस ही निकल गया. “मेरे ख़्याल में हमें शादियों में डस्टबिन के पास कुछ बाउंसर खड़े कर देने चाहिए, जो किसी को भी जूठा नहीं डालने देंगे. कम से कम अपनी शादी में तो मैं ये सब हरगिज नहीं होने दूंगी.” रोशनी ने दृढ़ता से कहा. उसे भी जोश आ गया था. सभी की प्रशंसात्मक नज़रें उसकी ओर उठ गईं.
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“अभी फ़िलहाल मैं इन सब बच्चों को यहां से ले जा रहा हूं. जो कोई भी ढाबा खुला मिलेगा, वहां इन्हें खाना खिलाकर लाऊंगा.” परेश तीर की भांति अपना इरादा बताकर निकल गया. सभी उदास चेहरे लिए थके कदमों से अपने-अपने कमरों की ओर रवाना हो गए. जया जी अपने कमरे में आकर बिस्तर पर निढाल लुढ़क गई थीं. कुछ समय पूर्व के हंसी-मज़ाक के माहौल में यकायक ही बोझिलता और उदासी पसरने लगी थी. प्रोफेसर आनंद पत्नी की मनःस्थिति समझ रहे थे. वे यह भी जानते थे कि जब तक वह कोई निदान नहीं खोज लेंगी, ऐसे ही विचलित रहेंगी. विदाई के वक़्त तक जया जी आश्चर्यजनक रूप से काफ़ी शांत नज़र आने लगी थीं.
दुल्हन की विदाई के बाद सारे स्टूडेंट्स प्रोफेसर आनंद के कमरे में एकत्र हुए. इसके बाद सब एक-दूसरे को गुडबाय कहकर विदा लेने वाले थे. जया जी ने रात वाली घटना के प्रति सभी को कंसर्न दिखाने के लिए धन्यवाद दिया.
“मैंने महसूस किया कि सलाह के सौ शब्दों से ज़्यादा अनुभव की एक ठोकर इंसान को ज़्यादा मज़बूत बनाती है. कौन सीखता है बातों से, सबको एक हादसा ज़रूरी है. सबने जिस विनम्रता से अपनी-अपनी ग़लती क़बूल की, मैं अभिभूत हूं. यही नहीं, सुधरने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने मुझे अंदर तक भिगो दिया है. विनम्रता स़िर्फ यह देखती है कि क्या सही है? कौन सही है कि चिंता नहीं करती. ग़लती स्वीकारने और गुनाह छोड़ने में कभी देर नहीं करनी चाहिए. रास्ता जितना लंबा होगा, वापसी उतनी ही मुश्किल हो जाएगी. आप सभी की चिंता और निदान के सुझाव जानकर मुझे प्रसन्नता हुई. मुझे उम्मीद है आप सभी इन्हें व्यवहार में भी लाएंगे. जूठा छोड़कर हम अपने पैसों के साथ-साथ देश के प्राकृतिक संसाधनों का भी दुरुपयोग कर रहे हैं. ये सब बातें मेरी जानकारी में पहले भी थीं. लेकिन आज आंखों से देखा, तो दिल-दिमाग हिल गया. मैंने सोच लिया है कि घर लौटकर मैं अपने आसपास की झुग्गी-झोपड़ियों में नियमित रूप से जाऊंगी. वहां के बच्चों-बड़ों सभी में परिश्रम, आत्म सम्मान और आत्मनिर्भरता की भावना जागृत करने का प्रयास करूंगी. उन्हें स्वच्छता से रहने, खाने-पीने की प्रैक्टिकल ट्रेनिंग दूंगी. जब उन्हें अपनी मेहनत से काम कर खाने-पीने की लत लगेगी चाहे, वह दाल-रोटी ही क्यों ना हो. पर एक बार उनका आत्म सम्मान जाग उठा तो फिर वे भूखा मरना क़बूल कर लेंगे, पर ऐसा घृणित क़दम नहीं उठाएंगे. मुझे समझ आ गया है कि है हमें समझने की ज़रूरत तो है ही, पर साथ ही साथ जूठा उठाकर खाने वाले तबके में भी स्वच्छता, आत्मसम्मान, आत्म संयम और आत्मनिर्भरता के भाव जगाना आवश्यक है.”
सभी ने इस मुहिम में उनका साथ देने का वादा किया. बारात का खाना, बारात का खाना नहीं रह गया था, बल्कि जीवन का आईना बन गया था.

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