"शर्मिंदा तो मैं हूं तुम्हारी नीचता देखकर संपत. क्या समझा है तुमने नारी को? पैरों की जूती? जब चाहा पहना, जब चाहा उतार कर फेंक दिया. तुम्हें वंश चलाने की चिंता थी. मैं तुम्हारे लिए लड़का नहीं पैदा कर सकी थी. लाए तो थे सच्चरित्र और लड़का पैदा करने वाली पत्नी, क्या हुआ उसका?.."
किस चीज़ की कमी है विनीता के पास? कार, बंगला, नौकर-चाकर, बैंक बैलेंस, सभी कुछ तो है उसके पास. और ये सब चीज़ें उसने अपने दम पर अकेले ही बटोरी हैं, जो भी ठान लेती है, करके ही छोड़ती है. और सच पूछो तो यही है उसकी सफलता का एकमात्र राज़.
सुबह से लेकर शाम तक लोग उसके आगे-पीछे घूमते रहते हैं और प्रतीक्षा करते रहते हैं इस बात की कि उन्हें कोई हुक्म दें, जिसे पूरा करके वे स्वयं को धन्य कर सकें. उसकी आंख का एक इशारा ही काफ़ी होता है लोगों के लिए, तभी तो संभाल पाती है वह अंकना (इंडिया) प्रा. लि. को, जिसमें सैकड़ों लोग काम करते हैं.
अंकना नाम है उसकी बेटी का, जो बिल्कुल अपनी मां पर गई है. वही नैन-नक्श, वैसी ही बोलचाल, वही आदतें और एकदम वही ज़िद. बिल्कुल विनीता का पूर्वरूप. अपने ही हाथों से खिला-पिला कर विनीता ने उसे पाला-पोसा और इस लायक बनाया कि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके. पढ़ाई पूरी करने के बाद आज अंकना अपनी मां की फैक्ट्री में उसका हाथ बंटाती है.
अभी पिछले माह ही अंकना की शादी हुई है. उसका पति जयेश इंजीनियर है. दोनों ने प्रेम विवाह किया है. जयेश इंटरमीडिएट में अंकना का क्लासफेलो था. तभी से चली आ रही थी प्यार की यह मेल, जिसने शादी के स्टेशन पर आकर ही स्टॉप लिया. चूंकि जयेश के माता-पिता नहीं हैं, इसलिए वह अंकना के घर में ही रहता है. अंकना व जयेश की शादी की स्वीकृति भी विनीता ने तभी दी थी, जब जयेश ने शादी के बाद उसके साथ रहने की शर्त मान ली थी.
आख़िर इस दुनिया में अंकना के सिवा और कौन है विनीता का? वही उसके लिए सब कुछ है उसके जीवन का एकमात्र सहारा. उसी के सहारे ती खड़ी की है विनीता ने इतनी बड़ी गृहस्थी. अंकना को भी इस बात का एहसास है इसलिए वह भी ऐसा कोई कदम नहीं उठाती है, जिससे उसकी मां के दिल को ठेस पहुंचे. अच्छी तरह से याद है उसे बचपन की वे काली रातें, जो उसने तूफ़ानों के बीच बिताई थीं. और आज भी जब कभी वो बातें उसके सामने बिम्बित होने लगती हैं तो न चाहते हुए भी उसकी आंखें भर आती हैं.
परिवार के नाम पर विनीता के घर में यूं तो बस तीन लोग ही है, लेकिन फिर भी उसमें किसी भरे-पूरे परिवार का नक्शा स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. जब भी तीनों लोग नाश्ते या खाने की मेज पर इकट्ठा होते हैं तो लगता है कि एक आदर्श परिवार की कल्पना इससे अलग न होगी. तीनों का व्यवहार आपस में दोस्तों की तरह है. बात-बात पर हंसी के ठहाके और हंसाने को मजबूर कर देने वाले अंदाज़ जैसी ख़ुशियां विरलों को ही नसीब होती हैं इस मशीनी दौर में.
पर ज़्यादा दिनों तक ये ख़ुशियां ज़माने से देखी न गई और वह चांद, जैसे उस ख़ुशनुमा माहौल में ग्रहण की तरह चिपक गया. सुख और शांति के माहौल में मज़े से तैर रही परिवाररूपी नैया तूफ़ानी हवाओं के बीच जा फंसी और देखते ही देखते उस सपनों से संसार में यथार्थ के काले कैक्टस उग आए.
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अंकना के साथ विनीता जब उस शाम घर लौटी, तो दरबान ने ख़बर दी कि संपत खन्ना जी आए हुए हैं. बिजली सी कौंध गई विनीता के दिमाग़ में यह ख़बर सुनते ही और उसके मुस्कुराते हुए चेहरे पर चिन्ताओं के बादल छा गए. भला अब वह यहां क्या करने आया है? क्या चाहता है वह मुझसे? ऐसे ही अनेकानेक प्रश्न उसके दिमाग़ की चक्रवात की तरह मथने लगे. अंकना ने मां की तरफ़ देखा तो उसे लगा कि वह बेहद डरी हुई हैं. शायद कुछ और छिन जाने का ख़ौफ़ उसके ज़ेहन में मंडराने लगा था.
संपत खन्ना उस व्यक्ति का नाम है, जिसके साथ अब से बाइस साल पहले विनीता की शादी हुई थी. संपत लखपति मां-पिता का इकलौता बेटा था. कॉलेज के दिनों से ही दोनों में जान-पहचान थी और विनीता शादी के पहले ही उसे अपने मन के साथ-साथ तन भी समर्पित कर चुकी थी, जिसकी वजह से वह शादी के पहले ही गर्भवती हो गई.
संपत को जब यह बात मालूम हुई तो उसने अपने परिवारवालों की मतों के ख़िलाफ़ कोर्ट में जाकर शादी कर ली और अलग मकान लेकर रहने लगा. संपत के इस फ़ैसले से उसके माता-पिता बहुत दुखी हुए और वे यह प्रयत्न करने लगे कि संपत वापस घर लौट आए, पर वे जहां संपत को घर वापस बुलाने के लिए लालायित थे, वहीं विनीता के नाम से ही उन्हें घृणा थी, क्योकि उसी की वजह से उनका बेटा उनसे दूर चला गया था.
शादी के सात माह बाद विनीता ने एक लड़की को जन्म दिया, जिसका नाम उन्होंने अंकना रखा. चूंकि संपत पहले से ही लड़के की कामना किए बैठा था इसलिए लड़की के जन्म से उसे ख़ुशी नहीं हुई और वह मन-ही-मन कुछ खिन्न रहने लगा.
संपत के माता-पिता ने अपने बेटे के मन की यह बात भांप ली और उसे उभारने का भरसक प्रयत्न करने लगे. साथ ही जब भी उन्हें मौक़ा मिलता, वे अंकना के समय से पहले हुए जन्म पर व्यंग्यात्मक बाण छोड़ना न भूलते और परोक्ष रूप से विनीता को चरित्रहीन साबित करने का प्रयत्न करते रहते.
जैसे एक-एक बूंद से धीरे-धीरे घड़ा भर जाता है, वैसे ही धीरे-धीर संपत को इस बात का पूरा विश्वास हो गया कि अंकना उसकी बेटी है ही नहीं. इससे विनीता के प्रति उसका रवैया एकदम से बदल गया. दिन-रात वह शराब में डूबा रहने लगा और अक्सर देर रात में घर पहुंचा करता.
एक दिन संपत जब देर रात को शराब के नशे में घर लौटा तो विनीता ने उसे ख़ूब खरी-खोटी सुनाई, बस उसी दिन मिल गया संपत को मौक़ा और उसने मन की सारी भड़ास निकाल डाली. उसी समय वह हमेशा के लिए घर छोड़कर अपने माता-पिता के पास चला गया. विनीता तो भौंचक्की रह गई, जिसके लिए उसने घर बार, मां-पिता सब कुछ छोड़ दिया, उसी ने उस पर अविश्वास किया. जिस मुख से निकले एक-एक शब्द को उसने अपना सौभाग्य मान लिया, उसी मुख ने उस पर चरित्रहीनता का लांछन लगाया. जिसकी सेवा को उसने स्वर्ग की प्राप्ति माना, उसी ने उसे संसार में अकेला छोड़ दिया. वो भी महज़ एक शक़ की बिना पर.
उसे लगा कि अब जीना बेकार है इस दुनिया में. आख़िर जिए भी तो किसके लिए? किसके सहारे? कोई भी तो नहीं है उसका? मां-पिता को तो वह शादी के समय ही बिसरा आई थी. सास-ससुर ने उसे हमेशा अपना बैरी ही समझा और पति तो स्वयं ही पराया हो गया. अब जाए तो कहां? उसे लगा कि आत्महत्या ही अब एकमात्र उपाय बचा है. मौत की गोद में ही मिल सकती है उसे शान्ति, क्योंकि तब वहां उसे कुलच्छिनी जैसे उपनामों से अलंकृत करने वाला तो कोई न होगा.
पर सहसा उसे अंकना की याद हो आई. उसका क्या होगा मेरे बाद? मेरे सिवा उसका तो इस दुनिया में कोई भी नहीं.
नहीं-नहीं उसे जीना ही होगा, अपने लिए नहीं, तो अपने लख्ते जिगर के लिए. और बस उसी क्षण उसने प्रतिज्ञा कर ली कि उसे जीना है. अपनी बेटी का सहारा बनना है. उसे ज़िंदगी की बुलंदियों पर पहुंचाना है. चाहे इसके लिए उसे कितने ही तूफ़ानों का सामना क्यों न करना पड़े.
जितना कठिन जीवन किसी अपाहिज़ का हुआ करता है, उससे कहीं असाध्य होती है ज़िंदगी एक परित्यक्ता की. बात-बात पर सवाल, हर कदम पर शंका और मुंह छूटते ही कटाक्षों के उपहार, जैसे उसे समाज में इज्ज़तदार बनकर रहने का कोई अधिकार ही नहीं है.
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पर विनीता हार नहीं मानने वाली थी. उसे तो बस अपने लक्ष्य से मतलब था. बीच के अवरोधों और कीचड़ से भला उसे क्या लेना-देना? हर अपमान और व्यंग्य को उसने बालों के पानी की तरह झटक दिया और चुपचाप आगे बढ़ती रही.
पढ़ी-लिखी तो वह थी ही, साथ ही सौंदर्य प्रसाधन सामग्री के निर्माण का डिप्लोमा भी उसने किया हुआ था, इसकी बदौलत उसे एक प्राइवेट फर्म में अच्छी तनख्वाह पर नौकरी मिल गई. थोड़े दिनों तक उसने वहीं रहकर अनुभव प्राप्त किया और फिर बैंक से कर्ज़ लेकर ख़ुद की एक छोटी सी फैक्ट्री खोल ली.
मेहनत, ईमानदारी और कुशल व्यवहार के कारण चन्द ही महीनों में उसकी फैक्ट्री चल निकली, जिसे बढ़ाकर उसने धीरे-धीरे 'अंकना (इंडिया) प्रा. लि.' का स्वरूप दे दिया. और आज उसके पास वह सब कुछ है, जो एक बड़े घर के लिए आवश्यक माना जाता है. विनीता को छोड़ने के बाद उसका पति संपत कभी यह भी देखने नहीं आया कि वह जीती भी है या मर गई? हां, लगभग दो माह के बाद उसका वकील ज़रूर आया था, वो भी तलाक़ के काग़ज़ात लेकर, जिस पर उसने सहर्ष साइन कर दिए. इस प्रकार वे दोनों अब पति-पत्नी के बंधन से मुक्त हो चुके थे. एकदम स्वतंत्र.
तलाक़ के लगभग एक माह बाद ही संपत के माता-पिता ने रश्मि नाम की लड़की से उसकी शादी कर दी. वह लड़की उनकी मनपसंद तो थी ही, साथ में लाई थी मोटा दहेज, जिससे उनका सूना सूना घर ठसाठस भर गया था. विनीता के पास भी शादी का कार्ड आया था. उसे देखकर वह अपने पर नियंत्रण न रख सकी और रो पड़ी. शायद उसे भेजने का उद्देश्य भी यही रहा हो?
पर दूसरों को रुलाने वाला ज्यादा दिनों तक हंस नहीं पाता, दूसरों की आहें उसे ऐसी परिस्थितियों में ला खड़ी करती हैं कि उसे रोने से रुलाई भी नहीं छूटती और वह मन-ही-मन ऐसा तड़पता रहता है जैसे गर्म पानी में पड़ी हुई बेबस मछली.
संपत के मां-पिता ने शादी तो लड़की देखकर ही की थी, पर रश्मि शादी के अगले ही दिन से उन्हें अपने रंग दिखाने लगी थी. वह एक मॉडर्न लड़की थी. फिर भला घर में उसका क्या काम? सारा दिन उसे पार्टी, पिक्चर और दोस्तों से फ़ुर्सत न मिलती. घर पर भी अक्सर वह अपने दोस्तों का जमावड़ा लगाए रहती, जिसे देखकर उसके सास-ससुर जला-भुना करते और अपनी क्रिस्मत को कोसते रहते.
रसोई की तो रश्मि ने कभी शक्ल तक न देखी. घर का सारा काम संपत की मां को ही करना पड़ता. सास-ससुर को तो वह कुछ समझती ही नहीं थी. कभी-कभी तो वह उन्हें ऐसे डांटती, जैसे नौकर हों. संपत मां और पत्नी में किसकी सुने? सो घर में रोज़ महाभारत मचने की नौबत आ जाती, पर उसकी मां अपनी ग़लती मानकर बात को ख़त्म कर देतीं. बहू के सहारे जो सुविधाएं उन्हें मिल रही थीं, उन्हें वह खोना नहीं चाहती थीं. ऐसे में कभी-कभी जब वह बहुत दुखी हो जातीं, तो सोचने लगती कि विनीता तो इससे बेहतर ही थी, पर मैंने उसे कभी समझने की कोशिश ही नहीं की. काश! मैंने उसे अपना लिया होता? पर अब क्या हो सकता था? सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटने से भला क्या होता है.
अपना वंश चलाते रहने और बुढ़ापे का सहारा पाने के लिए पुत्र-प्राप्ति की इच्छा, जो विनीता के निष्कासन का कारण थी, जब तीन साल व्यतीत हो जाने के बाद भी पूरी होती न दिखी, तो संपत की चिंता बढ़ गई और उसने सेक्स स्पेशलिस्ट का दामन पकड़ा. हज़ारों रुपए फूंक दिए. ख़ैर किसी तरह काम बना और रश्मि गर्भवती हो गई,
पैदा होने वाली संतान लड़का था, इसलिए बड़े उत्सव मनाए गए. सभी दोस्तों-रिश्तेदारों और परिचितों को दावत दी गई. हज़ारों रुपए ख़र्च कर दिए गए, पर हां, इस बार भी विनीता को जलाने के लिए उसके पास निमंत्रण पत्र भेजना नहीं भूली उसकी सासू मां.

समय का चक्र चलता रहा, दिन बीतते गए. संपत का लड़का धीरे-धीरे बड़ा होता रहा और साथ ही मां-पिता के नियंत्रण के अभाव में बिगड़ता भी रहा. सारा दिन इधर-उधर मटरगश्ती किया करता. किसी को कोई फ़िक्र नहीं. मां अपने दोस्तों के साथ मस्त, पिता अपनी नौकरी में जूझता रहता, दादा-दादी को तो उसने अपनी मां की तरह कुछ समझा ही नहीं. स्कूल में घन्टागोल, बीड़ी-सिगरेट का चस्का, गाली-गलौज और मारा-मारी जैसी सभी ख़ूबियां धीरे-धीरे उसमें घर करती गईं. लेकिन मां-पिता के कानों में जूं तक न रेंगी. उल्टे कभी-कभी उसकी हरकतों को देखकर तारीफ़ करते हुए मां तो कह देती, "शाबाश बेटे, तुमने मेरा मन ख़ुश कर दिया. तुम एक दिन ज़रूर हीरो बनोगे."
संपत, उम्र अधिक हो जाने और नौकरी में अत्यधिक उलझ जाने के कारण रश्मि से दूर ही दूर रहने लगा. जिससे न तो वह दुबारा मां बन सकी और न ही उसे यौन तुष्टि ही मिल सकी. अपनी इच्छाओं को दबाने में जब वह सफल न हो सकी, तो दूसरे पुरुषों की तरफ़ आकर्षित होने लगी. और फिर एक दिन वह अपने दोस्त प्रियांक के साथ किसी दूसरे शहर में जाकर बस गई.
रश्मि के सास-ससुर यह सदमा बर्दाश्त न कर पाए और उन लोगों ने एक साथ फांसी लगाकर खुदकशी कर ली. लड़के ने अपमान के कारण घर आना ही छोड़ दिया और इधर-उधर मारा-मारा फिरने लगा. संपत का तो पूरा परिवार ही समाप्त हो गया. मां-पिता, पत्नी और बुढ़ापे का सहारा बेटा सभी उसे बेसहारा कर गए. तब अनायास ही उसे विनीता की याद हो आई और वह उससे मिलने के लिए विनीता के बंगले पर जा पहुंचा. इस उम्मीद में कि शायद वह उसकी ग़लतियों को माफ़ कर दे और उसे फिर से एक बार अपना ले.
विनीता ने जब ड्रॉइंगरूम में प्रवेश किया तो संपत सिर झुकाए बैठा हुआ था. उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और दाढ़ी बढ़ी हुई थी. कदमों की आहट पाते ही उसने दरवाज़े की तरफ़ नज़र दौड़ाई और विनीता को देखकर सहमता हुआ खड़ा हो गया. इससे पहले कि वह कुछ बोलता, विनीता गरज पड़ी, "अब क्या चाहते हो तुम, जो हमारी शांत दुनिया में तूफ़ान खड़ा करने आ गए? क्या मेरी इतनी भी ख़ुशी तुमसे देखी नहीं गई?"
सिंहनी को देखकर जो हालत मेमने की होती है, वहीं स्थिति इस समय संपत की हो रही थी. वह धीरे से गिड़गिड़ाया, "प्लीज़, मुझे माफ़ कर दो 'विनी'..."
विनीता को 'विनी' शब्द का संबोधन संपत ने ही दिया था और वह हमेशा उसे इसी नाम से बुलाता था. पर विनीता इस शब्द को तो संपत के साथ ही भूला बैठी थी. आज जब उसने संपत के मुंह से यह शब्द सुना तो उसे लगा, जैसे किसी ने जलती हुई कटारी उसके कलेजे में उतार दी हो, वह तड़प उठी, "ख़बरदार, जो ये 'विनी' शब्द अपनी ज़ुबान पर लाए. एक शक़ की बिना पर अपनी पत्नी और दुधमुंही बच्ची को छोड़कर जाने के बीस साल बाद आज उसकी माफ़ी मांगने आए हो? क्या सोचा था तुमने कि विनी तुम्हें माफ़ कर देगी और फिर तुम्हें उसके साथ खेलने का जी भर मौक़ा मिल जाएगा?"
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"प्लीज़ विनी..."
"चुप रहो, उस दिन मैं चुप थी तुम बोल रहे थे, आज मुझे बोलने का मौक़ा मिला है, तुम चुपचाप सुनते रहो."
"मैं अपनी ग़लती पर शर्मिदा..."
"शर्मिंदा तो मैं हूं तुम्हारी नीचता देखकर संपत. क्या समझा है तुमने नारी को? पैरों की जूती? जब चाहा पहना, जब चाहा उतार कर फेंक दिया. तुम्हें वंश चलाने की चिंता थी. मैं तुम्हारे लिए लड़का नहीं पैदा कर सकी थी. लाए तो थे सच्चरित्र और लड़का पैदा करने वाली पत्नी, क्या हुआ उसका? क्या हुआ तुम्हारे बुढ़ापे के सहारे, तुम्हारे उस लख़्ते जिगर का? जिसके जन्मदिन पर तुमने हज़ारों रुपए लुटा दिए थे. कहां गए वे सब? चले गए न? तभी विनीता की याद आई और चले आए खालाजी का घर समझकर उसकी ख़ुशियों पर डाका डालने. चले जाओ, मैं कहती हूं चले जाओ यहां से."
"विनी, मेरी बात को समझने का प्रयत्न करो."
"समझती हूं, ख़ूब समझती हूं. मेरी सांसों की डोर, मेरे जीवन का सहारा, मेरी अंकना को मुझसे अलग कर देना चाहते हो, ताकि एक बार फिर मैं बेबस और बेसहारा हो जाऊं?"
कहते हुए विनीता ने संपत को धक्का देकर दरवाज़े के बाहर निकाल दिया और स्वयं दरवाज़ा बंद करके रोने लगी. तभी दूसरे दरवाज़े से अंकना आ गई. उसे देखते ही विनीता ज़ोर से उससे लिपट गई और रोते हुए बोली, "बेटी, तू मुझे मत छोड़ना, कभी मुझे छोड़कर मत जाना."
"नहीं मां, मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ सकती." कहते हुए अंकना ने मां के आंसू पोंछे और उसे लेकर अंदर चली गई.
अपमान के कीचड़ में धंसा संपत एकदम जड़ हो गया. उसे पाद आ रहा था वह दिन, जब वह विनीता को नितांत असहाय, एकदम बेसहारा छोड़कर जा रहा था.
- जाकिर अली 'रजनीश'
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