कहानी- कार्ड (Short Story- Card)

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“कैसे त्याग दूं मोह-माया?” सरोजिनी बुदबुदायी. इसी मोह-माया ने तो ज़िन्दगी के सत्तर वर्षों को सुंदर बनाया और पल-पल ख़ुशियों में गुज़रा. हर दिन एक नई आशा, नई ख़ुशी लेकर आता था. पल-पल बढ़ती बच्चों की शरारतों, लड़ाई-झगड़ों, प्यार-ग़ुस्से, मनुहार आदि को संजोया है मैंने, भविष्य के सुंदर सपने बुने हैं.

वृद्धावस्था और मोतियाबिन्द से धुंधलाई आंखों में जब निराशा उतर आई, तो झिलमिलाते आंसुओं ने दृष्टि को और भी धुंधला बना दिया. जब दृष्टि धुंधला गई, तो मस्तिष्क सक्रिय हो गया, क्योंकि हृदय का पलड़ा हल्का हो गया. क्यों करती हो इंतज़ार? कब तक करती रहोगी? क्या मिल जाएगा तुम्हें एक कार्ड आने से? व्यर्थ ही परेशान होती हो. इस बढ़ापे में भी मोह-माया त्यागने को तैयार नहीं… क्यों? आख़िर क्यों?
“कैसे त्याग दूं मोह-माया?” सरोजिनी बुदबुदायी. इसी मोह-माया ने तो ज़िन्दगी के सत्तर वर्षों को सुंदर बनाया और पल-पल ख़ुशियों में गुज़रा. हर दिन एक नई आशा, नई ख़ुशी लेकर आता था. पल-पल बढ़ती बच्चों की शरारतों, लड़ाई-झगड़ों, प्यार-ग़ुस्से, मनुहार आदि को संजोया है मैंने, भविष्य के सुंदर सपने बुने हैं. जब इतनी उम्र हंसी-ख़ुशी से बिताई है, तो क्या कुछ वर्ष और नहीं बिता सकती.
नहीं बिता सकती… बच्चों के बिना मेरा मन नहीं लगता. उनकी एक-एक किलकारी, उनकी एक-एक आवाज़ मेरा पीछा करती रहती है… और मैं थक-हार कर उन आवाज़ों से मोहित हो इन्तज़ार करने लगती हूं… उनके कार्ड का- कभी बर्थडे कार्ड का, कभी एनिवर्सरी कार्ड का, कभी थैंक्स कार्ड का, कभी न्यू ईयर का, तो कभी दीपावली का.
एक ज़माना था जब दिल के गुबार को काले अक्षरों में अभिव्यक्त कर चाहनेवालों को भेजा जाता था. हर शब्द जैसे साकार हो उठता था. भेजने वालों का व्यक्तित्व प्रत्यक्ष खड़ा हो जाता और पानेवाला धन्य हो जाता. वह जब चाहता, जितनी बार चाहता, उतनी बार उसे सामने पाता और स्वयं उस चिट्ठी को बार-बार चूम कर स्पर्श के आनंद से भर उठता. कितना सुखद लगता था पत्रों का मिलना और पत्रों का भेजना भी. प्रत्येक पंक्ति भावनाओं से ओत-प्रोत मन को छू जाती. बिना खोले ही समझ जाते कि किसका है, कहां से आया है और वह निर्जीव ख़त साकार हो उठता.
जीवन की आधुनिक शैली ने छीन लिए ये एहसास. इस मशीनी युग में भावों की अभिव्यक्ति भी मशीनी हो गयी है. हो भी क्यों न? क्या संवेदनाओं के अभाव में भावनाएं उथल-पुथल मचा सकती हैं? जब भावनाएं नहीं तो अभिव्यक्ति किसकी हो? बस इसलिए बचा लिया इस नए विकल्प ने यानी ‘कार्ड’ ने. यहां हर कुछ मिलता है, हर कुछ बिकता है. सुंदर शब्दों की सुंदर अभिव्यक्ति भी, प्रस्तुतिकरण भी. बस आवश्यकता है पैसों की यानी ‘मनी’ की. इस मनी ने सबको ‘मिनी’ बना दिया है. रिश्तों को, एहसासों को, कर्त्तव्यों को, नज़दीकियों, अपनेपन को. अब हर संबंध, हर रिश्ता उतना ही है, जितना उसमें मनी है.
कहावत है- ‘कुछ नहीं से कुछ भला’- और इसी तर्ज पर पत्रों की जगह कार्डों ने ले ली. प्रारंभ में सरोजिनी को बड़ी चिढ़ होती थी इन कार्डों से, “अरे भाई, ख़ुद क्यों नहीं कहते ‘जन्म दिन मुबारक़ हो.’ मंगलकामनाएं देनी है या धन्यवाद देना है या क्षमा मांगनी है तो ख़ुद कहो, ताकि उस एहसास के साथ सामनेवाला भी रोमांचित हो उठे, उसका रोयां-रोयां कम्पित हो उठे. ये क्या कि कार्ड पकड़ाया और उसी मशीनी तरीके से मुबारक़ दे दी.”
चलिए शिष्टाचार के नाते ही सही ये परम्पराएं चल तो रही हैं. यही क्या कम है इस आपा-धापी की ज़िंदगी में. याद आता है वह दिन जब बच्चों ने जन्मदिन पर अलग-अलग कार्ड दिए और मां को मुबारक़वाद दी तो न चाहते हुए भी सरोजिनी ने बच्चों से कह ही दिया, “इस कार्ड पर फ़िज़ूल ख़र्च करने की क्या ज़रूरत थी? तुम्हारा प्यार ही बहुत है.” बच्चे कुछ उदास से हो गए. एक दिन तो हद ही हो गयी. किसी बात पर दोनों बच्चों में झगड़ा हो रहा था. सरोजिनी ने बीच-बचाव किया. दोनों को डांटा तो लड़ाई का रुख़ ऐसा बदला कि वह लड़ाई आपस की न होकर मां-बेटों की हो गयी. अन्त में मां नाराज़ और बच्चे परेशान. बच्चों ने माफ़ी मांगने का कार्ड लाकर मां को दिया और चुपचाप खड़े हो गए.
मां का पारा चढ़ गया, “नालायको, मुंह से नहीं बोल सकते? ऐसे मांगी जाती है माफ़ी… फिर कर आए पैसे ख़र्च.”
इतना कहना था कि हंसी छूट गयी बच्चों की, “मां ये तो दुकानदार ने मु़फ़्त दिया है.”
“क्यों?” सरोजिनी ने आश्‍चर्य से पूछा.
“माफ़ी का है न. ये मु़फ़्त ही मिलता है.”
“अच्छा! कितना अच्छा है दुकानदार.” बच्चे मुस्कुरा रहे थे कि मां को बना दिया और मां बन कर ख़ुश थी कि बच्चे उसका कितना ख़याल रखते हैं. आज भी वह कार्ड अमानत की तरह संभाल कर रखा हुआ है.
अंधेरा बढ़ने लगा तो सरोजिनी के पति ने उनसे कहा, “कब तक करोगी इंतज़ार? अब पोस्टमैन नहीं आएगा.”
“किसने कहा कि मैं इंतज़ार कर रही हूं…? मैं तो ऐसे ही बाहर बैठी हूं.”
“झूठ मत बोला करो इस उम्र में. मैं सब समझता हूं. मुझसे कुछ मत छिपाया करो. हम एक-दूसरे को इतना समझ गए हैं कि तुम कब क्या चाहती हो, क्या छुपा रही हो, कब सच बोलती हो, कब झूठ. कब दिल से ख़ुश होती हो, कब बाहर से. कितना बता रही हो कितना छुपा रही हो, तुम्हारी हर बात से, हर चाहत से वाकिफ़ हूं.”
“फिर पूछते क्या हो?” रुआंसी होकर सरोजिनी ने कहा.
“अच्छा… अब आगे से नहीं पूछूंगा. अब तो चलो.” सहारा देते हुए उन्होंने कहा.
“तुम भी हद करती हो. अभी कल ही तो तुमने टेलीफ़ोन पर बात की थी. कनाडा क्या इतने पास है कि आज ख़त लिखो और कल मिल जाए. तुम्हारा तो कभी दिल ही नहीं भरता.”
“अरे… बच्चों से बात करके… कभी किसी का दिल भरता है भला.”
“तुम्हारे दिल की ख़ातिर अपनी जेब खाली कर देता हूं, इतना बिल बनवा देती हो टेलीफ़ोन का.”
“मैं क्या अकेली बात करती हूं? ख़ुद ही तो फ़ोन लगाते हो और नाम मेरा धरते हो.”
“अच्छा… अब तुम्हारा नाम भी न लूंगा… अब चलो भी.” उदास, थकी-हारी-सी सरोजिनी उठी. अन्दर जाने के लिए क़दम बढ़ाए, पर मुड़कर एक बार फिर बाहर नज़र दौड़ाई.
“देखो तो… कोई आ रहा है?”
“कोई होगा?”
“हरीराम ही लगता है.”
“तुम क्या इतनी दूर से पहचान सकती हो?”
“हां… वह ऐसे ही साइकिल चलाता है.”
“अब तो तुम्हें साइकिल चलाने का ढंग भी दिखाई देने लगा है. अब डॉक्टर के पास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.”
“मज़ाक मत किया करो.”
“तुम्हीं ने तो कहा था, मोतियाबिन्द की वजह से दिखाई नहीं देता.”
“दिखाई तो देता है, लेकिन साफ़ नहीं.”
“ओह!”
गेट खुलने की आवाज़ आई तो दोनों ने मुड़कर देखा, “मांजी…” हरीराम ने पुकारा.
“हरीराम… देखो, मैं न कहती थी हरीराम होगा.”
“मैं ही हूं… मैंने सोचा आप इंतज़ार कर रही होंगी, इसलिए इस समय ही चला आया.”
आता भी क्यों न. उसे हर कार्ड के साथ बख़्शीस जो मिलती थी और मुंह भी मीठा होता था.
“क्या लाया है?” उतावली-सी सरोजिनी आगे बढ़ी.
“कार्ड.”
कार्ड को सरोजिनी ने छाती से लगा लिया जैसे वह कार्ड नहीं, उनका बेटा ही हो.

– कल्पना दुबे
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