कहानी – चिट्ठी

 

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               रुपाली भट्टाचार्या

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मां, मेघा को इस समय अतिरिक्त प्यार की ज़रूरत है, पर संजू को मेघा से सुरक्षित रखना ही शायद रेखा का पहला दायित्व है. संजू को सुरक्षित रखने के चक्कर में रेखा असुरक्षा की भावना से घिरती जा रही है. और मेघा, उसे तो इस प्यारे-से रिश्ते का ज़रा भी आभास नहीं है. वो संजू से, अपने मम्मी-पापा से बहुत दूर होती जा रही है.

 

लिफ़ा़फे पर अंकित का नाम देख, शोभाजी चौंक गईं. अंकित को चिट्ठी लिखने की क्या ज़रूरत पड़ गई? सोफे पर बैठकर वो इस बारे में ही सोच रही थीं. दरअसल, शोभाजी एक अति व्यस्त समाज-सेविका थीं. पति के देहांत के बाद उन्होंने स्वयं को समाज-सेवा में और भी व्यस्त कर लिया था. उनका बड़ा बेटा अंकित बंगलुरू में और छोटा बेटा अनिल दिल्ली में रहता है. आज अचानक यूं अंकित की चिट्ठी देखकर वो थोड़ा चौंक गई हैं. उन्होंने चिट्ठी खोली और पढ़नी शुरू की.
मां,
कोई आदर सूचक शब्द से शुरू नहीं कर रहा हूं, क्योंकि ये एक शब्द अपने में परिपूर्ण है. मां, आज पहली बार चिट्ठी लिख रहा हूं, आप भी सोच रही होंगी, चैटिंग और मोबाइल के इस युग में मुझे चिट्ठी लिखने की क्या ज़रूरत पड़ गई. हफ़्ते में दो बार मोबाइल पर बातें तो होती ही हैं, फिर ऐसा क्या ‘अनकहा’ रह गया, जो मुझे लिखना पड़ गया.
मां कहां से शुरू करूं समझ में नहीं आ रहा, इसलिए अपने बचपन से ही शुरू करता हूं. मां आपको याद है, जब मैं, आप और दादी अपने पुराने घर में रहते थे, कितने अच्छे दिन थे वो. आप और दादी दोनों का मैं ‘राजदुलारा’ था. मां आपकी सारी दिनचर्या बस मेरे आसपास ही घूमती थी. मेरे जागने से लेकर सोने तक आप मेरे साथ रहती थीं और दादी वो तो मुझे एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ती थीं.
पापा ऑफिस के काम के सिलसिले में बाहर ही रहते थे. दो-तीन महीने में तीन-चार दिनों के लिए ही आते थे. दादी मुझसे हमेशा यही
कहती थीं कि इस घर में तुम्हीं एक पुरुष हो, जो दो महिलाओं का ख़्याल रखता है. धीरे-धीरे यही बात मेरे ‘बालमन’ में घर कर गई और मैं स्वयं को आप दोनों का ‘रक्षक’ मानने लगा.
और एक दिन अचानक पापा आ गए, हमेशा के लिए. उन्होंने अपना तबादला करवा लिया था. अब वो हमारे साथ रहनेवाले थे. आप और दादी बहुत ख़ुश थे, पर मैं बिल्कुल ख़ुश नहीं था. पापा बहुत अनुशासन प्रिय थे और सच कहूं, तो मैं उनसे बहुत चिढ़ता भी था. और सबसे बड़ी बात कि एक घर में दो ‘पुरुष’ कैसे रहते? मुझे ऐसा लगा, जैसे किसी राजा से उसका राजपाट, उसकी रानी सब छीन लिए गए हों. पापा के आने से आप और दादी बहुत व्यस्त हो गईं और मैं बहुत अकेला. मेरी तो सारी दिनचर्या ही बदल गई. आप सारा दिन किसी न किसी काम में व्यस्त रहतीं. आपके साथ शाम को पार्क जाना, एक साथ खेलना, मस्ती करना सब लगभग बंद हो गया.
मैं दिनभर यही सोचता कि ऐसा क्या करूं जो मेरी ‘मां’ मुझे वापस मिल जाए. मुझे पक्का भरोसा हो गया था कि ये सब पापा के आने के बाद से हो रहा है और मैं उनके जैसा बनने की कोशिश में लगा रहता. उनके जूते, कपड़े पहनता, ताकि उनके जैसा बन जाऊं. इसी चक्कर में एक दिन गरम चाय भी पी ली थी, कितनी डांट पड़ी थी मुझे, पर पापा ने आपको भी डांटा कि आपके ज़रूरत से ज़्यादा लाड-दुलार की वजह से ही मैं बिगड़ रहा हूं. अब मैं उन्हें इस घर में नहीं रहने देना चाहता था. मैं पापा का ज़रूरी सामान छिपाने लगा, ताकि वो परेशान होकर वापस चले जाएं. रोज़ ऑफिस जाने के पहले पापा और आपका झगड़ा हो जाता था. आप रोतीं, तो मुझे बहुत बुरा लगता, पर अगले ही पल मैं ख़ुद को समझा लेता कि बस, कुछ ही दिनों की बात है, जब पापा चले जाएंगे, तब मैं आपको इतना प्यार दूंगा कि आप सब भूल जाएंगी. लेकिन मां सब उल्टा हो गया, एक दिन आपने मुझे सामान छुपाते हुए देख लिया. मेरी बहुत पिटाई भी की, लेकिन एक बार भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि मैं ऐसा क्यों कर रहा हूं?
मां, उस दिन पहली बार मुझे आपसे डर लगा और मैं आपसे डरने लगा. अब आप मेरी ‘परी कथाओंवाली मां’ नहीं थीं. और फिर अनिल के जन्म के बाद तो आप एकदम ही बदल गईं. आप हर समय मेरी और अनिल की तुलना करतीं. तब मुझे लगता, घर में एक दुश्मन कम था, जो दूसरा भी आ गया. अनिल कितनी जल्दी खाना ख़त्म कर लेता है और अंकित तो बचपन से ही सुस्त है. अनिल जल्दी खा लेता, क्योंकि मैं उसके सामने जोकरों जैसी हरक़तें करता, वो ख़ुश होकर खा लेता, तब आप भी ख़ुश हो जातीं और मेरा खालीपन आपको दिखता ही नहीं. अनिल का बोलना, हंसना, खेलना सब आपको अच्छा लगता, लेकिन आप ये भूल गईं कि छोटे बच्चे दूसरे बच्चों को देखकर जल्दी सीखते हैं. मैं उसके जैसी हरक़तें करता, तो आप मुझे डांटकर कहतीं कि मैं अगर वैसी हरक़तें करूंगा, तो अनिल भी वही सीखेगा, इसलिए बड़े भाई की तरह व्यवहार करूं. मैं कुछ भी करता, आपको शायद पसंद नहीं आता था. उस समय आपके लिए तो अनिल ही बेस्ट था और मैं उद्दंड, ज़िद्दी, झूठा और बदतमीज़. मां, शायद मैं और बिगड़ जाता, पर दादी ने मेरे मन को समझ लिया था. उन्होंने मुझे भाई-भाई के इस प्यारे से रिश्ते का एहसास करवाया और मेरी अनिल के साथ पक्कीवाली दोस्ती भी करवा दी.
पर मां, इन सबके बीच मेरा और आपका जो एक प्यारा-सा रिश्ता था, वो कहीं खो गया था. अनिल के प्रति मेरी नफ़रत थोड़ी कम हुई थी और देर से ही सही, पापा का प्यार भी मेरी समझ में आ रहा था. वो मुझे और अनिल को एक जैसा प्यार करते थे. बस, उन्हें अनुशासन पसंद था, जो मुझमें बिल्कुल नहीं था. अभी मैं और अनिल दोस्त बन ही रहे थे कि आपने मुझे हॉस्टल भेज दिया. मुझे बहुत बुरा लगा, अनिल आपके पास था और मैं आपसे बहुत दूर. एक साल बाद जब आपने अनिल को भी भेज दिया, तब मुझे असीम शांति मिली. हम दोनों के बेहतर भविष्य के लिए आपने ये निर्णय लिया था, लेकिन अगर उस समय आपने मुझे इस बात से मानसिक रूप से अवगत कराया होता, तो शायद मुझे इतनी तकलीफ़ नहीं होती.
मां, आज मैं आरोप-प्रत्यारोप करने लिए चिट्ठी नहीं लिख रहा हूं. मैं जानता हूं कि आप एक अतिव्यस्त समाज-सेविका हैं, पर आपके परिवार को भी आपकी ज़रूरत है, क्योंकि एक अच्छे परिवार से ही एक सभ्य समाज का निर्माण होता है. मां, आपको तो याद ही होगा, पिछले महीने मैं अनिल के घर गया था. मैंने अनिल की बेटी मेघा की आंखों में अपने दो साल के भाई के प्रति जो हिंसा और नफ़रत देखी, एक पल के लिए मुझे अपना बचपन ही घूमता नज़र आया. मैं मानता हूं कि मैं अनिल को पसंद नहीं करता था, लेकिन मैं उसे कभी नुक़सान नहीं पहुंचाना चाहता था.
मां, जिस दिन मैं उनके घर गया, मेघा स्कूल गई हुई थी. स्कूल से आते ही उसने संजू के साथ खेलना चाहा. रेखा किचन में थी और संजू गहरी नींद में सो रहा था. रेखा ने किचन से ही उसे डांटते हुए कहा, “ख़बरदार जो उसको उठाया, मुझे बहुत काम है. जल्दी से कपड़े बदलो और खाने बैठो.” मेघा चुपचाप कमरे में चली गई, पर जाने से पहले उसने संजू को पलंग से नीचे गिरा दिया. संजू को चोट भी लग गई. सज़ा के तौर पर रेखा ने उसे कमरे में बंद कर दिया. मां, मैं रेखा की परेशानी समझता हूं. संजू के प्रति मेघा का यह व्यवहार उसे बहुत परेशान कर रहा है. घर, परिवार, ऑफिस इनके संतुलन में वो ख़ुद भी पिस रही है. वो मेघा की दुश्मन नहीं है, पर उसकी भावनाओं को समझने का, उसकी बातों को सुनने का समय न अनिल के पास है और न ही रेखा के पास.
मां, मेघा को इस समय अतिरिक्त प्यार की ज़रूरत है, पर संजू को मेघा से सुरक्षित रखना ही शायद रेखा का पहला दायित्व है. संजू को सुरक्षित रखने के चक्कर में रेखा असुरक्षा की भावना से घिरती जा रही है. और मेघा, उसे तो इस प्यारे-से रिश्ते का ज़रा भी आभास नहीं है. वो संजू से, अपने मम्मी-पापा से बहुत दूर होती जा रही है.
मां, अनिल ने मेघा का कमरा खिलौनों से भर दिया है. हर ऐशो-आराम की चीज़ उसके पास है, लेकिन उनकी सबसे अनमोल चीज़ उनकी बेटी ही उनसे बहुत दूर हो गई है.
अनिल को इन सबका समाधान हॉस्टल लगता है, पर मां आपको नहीं लगता कि ऐसी मानसिकता के साथ अगर वो हॉस्टल जाएगी, तो क्या उसके और संजू के बीच सब कुछ ठीक हो जाएगा? नहीं मां, बल्कि सब कुछ ख़त्म हो जाएगा. मां, दादी ने जो भूमिका आपके और हम दोनों भाइयों के लिए निभाई थी, आज वही भूमिका आपको रेखा और मेघा के लिए निभानी पड़ेगी.
सॉरी मां, मैं आपको आदेश नहीं दे रहा हूं, विनती कर रहा हूं. मां, अगर मेरी कोई बात आपको बुरी लगी हो, तो मुझे माफ़ कर दीजिएगा. पापा के सख़्त अनुशासन और हम दोनों की बेहतर परवरिश में संतुलन करने में आप भी तो पिस रही थीं न. मां, मैं बस इतना चाहता हूं कि आप अनिल के पास जाइए और इन बिखरे रिश्तों को समेट लीजिए.
मां, मैं नहीं चाहता कि फिर कभी किसी बेटे या बेटी को अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए काग़ज़-क़लम का सहारा लेना पड़े. मां, आख़िर में एक बात कहूं, अगर हो सके, तो कुछ दिनों के लिए मेरे पास भी आना. मेरे बच्चों के लिए नहीं, उन्हें मैं और रेनू अच्छे-से संभालते हैं.
आप मेरे लिए आना! आओगी ना मां…
आपका बेटा,
अंकित

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पत्र पढ़ते हुए शोभाजी की आंखों से आंसू बह रहे थे, जिनमें अंकित का पूरा बचपन घूम रहा था, जो सब कुछ उनके लिए सामान्य था, वो अंकित के लिए कितना कष्टकारी था. अनजाने में ही कितनी बड़ी भूल हो गई उनसे, बच्चों की अच्छी परवरिश, पति के लिए परफेक्ट वाइफ, सास के लिए एक अच्छी बहू, ख़ुद को ये सब बनाने के चक्कर में अपनी ममता को ही भुला बैठीं.
अनजाने में ही सही, पर भूल तो उनसे हुई है. उसे सुधारने के लिए उन्होंने तुरंत अनिल को अपने आने की ख़बर दे दी और अंकित को फोन लगाने लगीं. इस समय वो स़िर्फ अंकित की मां थीं, समाज-सेविका शोभा देवी नहीं.

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