कहानी- कमबैक

 

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              सुमन बाजपेयी

 

घर आता तो एक सन्नाटा उसका स्वागत करता. पहले नीमा की खिलखिलाती हंसी और बांहें उसका स्वागत करती थीं. लंदन की ज़िंदगी उसे नीरस लगने लगी थी. आख़िर किससे शेयर करता अपने मन की बात? चैटिंग में भी उसका मन नहीं लगता था. नीमा से उसने ऑनलाइन बात करने की कोशिश की, पर वह हर बार ऑफ़लाइन ही मिली. आख़िर ग़लती तो उसी की थी. “आई कांट लिव विदाउट यू नीमा, यू हैव टू कमबैक…” वह बुदबुदाया.
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लाइट ऑन कर मनन ने चाबियां की-होल्डर पर लटकाईं और सीधे बेड पर जाकर लेट गया. वैसे रोज़ वह सबसे पहले घर आने के बाद फ्रेश होने के लिए बाथरूम में घुसता था और उसके बाद ड्रिंक लेता था, पर आज वह बहुत थकान महसूस कर रहा था. केवल शरीर से ही नहीं, मन से भी. ड्रिंक लेने का भी मन नहीं हुआ उसका. उसे ख़ुद पर भी हैरानी हो रही थी, क्योंकि इससे पहले उसने कभी ऐसा महसूस किया ही नहीं था. हमेशा मस्त और अपने में मग्न रहनेवाला मनन अपने दोस्तों के बीच ज़िंदादिली के लिए जाना जाता था. भारत से जब वह नौ साल पहले लंदन आया था, तो उसने कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन वह यहां अपना एक घर भी ख़रीद पाएगा और शान-ए-शौक़त की ज़िंदगी बिता पाएगा.
एक मिडिल क्लास फैमिली से होने के कारण कुछ भी पाने की चाह कहीं मन में यह डर भी पैदा करती थी कि जो हाथ में है, वह भी कहीं छूट न जाए. इसलिए वह मेहनत करने से नहीं घबराया और आज स्पाइस मीडिया नामक कंपनी में इंजीनियर के पद पर काम कर रहा है, लेकिन तरक़्क़ी के रास्ते खुलने के साथ ही मनन के व्यवहार में एकदम बदलाव आ गया. लंदन की जीवनशैली में उसने अपने को पूरी तरह से ढाल लिया. पैसा, ताक़त और सम्मान का वह पूरा मज़ा लेने लगा. पूरा दिन ऑफ़िस में बिताकर जब वह घर लौटता, तो वक़्त काटने के लिए इंटरनेट पर स़िर्फंग करने लगता.
धीरे-धीरे नेट उसकी ज़िंदगी पर इस कदर हावी होने लगा कि वक़्त काटने का ज़रिया बन गया. आधी-आधी रात तक वह चैटिंग करता रहता. घरवाले लगातार उस पर शादी करने का दबाव डाल रहे थे और कह रहे थे कि एनआरआई लड़के के लिए लड़की वाले रिश्ते लेकर रोज़ उनके घर आते हैं, लेकिन वह अपना करियर बनाने में इतना बिज़ी था कि 35 वर्ष का हो जाने के बावजूद शादी करने का ख़्याल उसके मन में कभी आया ही नहीं था. उसकी सारी बोरियत और अकेलापन अब नेट भरने लगा था. चैटिंग करने से उसके दोस्तों की तादाद बढ़ती जा रही थी और उसका खालीपन भी. एक नशा-सा हो गया था उसे चैटिंग करने का.
फेसबुक पर चैटिंग के दौरान ही भारत में रहनेवाली नीमा से उसकी दोस्ती हुई. शायद उनकी आदतें एक जैसी थीं या सोच या फिर मनन का खुलापन कि उनकी दोस्ती धीरे-धीरे आत्मीयता में बदलने लगी. नीमा भारत में एक कॉलेज में पढ़ाती थी और अभी तक शादी नहीं की थी. लगातार चार महीने की चैटिंग के बाद उनके संवादों में इतना खुलापन आ गया था कि कोई भी बात कहने में उन्हें असहजता महसूस नहीं होती थी.
“लंदन बहुत ख़ूबसूरत शहर है न?” एक दिन नीमा ने चैटिंग के दौरान पूछा, तो जवाब में मनन ने लिखा, “तुम यहां आ जाओ, तो इसकी ख़ूबसूरती और बढ़ जाएगी.”
“मैं वहां कैसे आ सकती हूं? क्या मुझे वहां काम मिल सकता है?” नीमा ने भी झट सवाल किया.
“केवल काम हो तभी आ सकती हो क्या? तुम घूमने भी तो आ सकती हो, टिकट का इंतज़ाम मैं कर दूंगा.”
वेबकैम पर नीमा के शर्म से लाल होते चेहरे को देख मनन मुस्कुरा उठा था. उसने लिखा, “शर्माती हुई तुम और ख़ूबसूरत लगती हो.”
“तुम भी कम स्मार्ट और हैंडसम नहीं हो.” इस तरह उन दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता कायम हो गया था. मनन के माता-पिता उसे कई लड़कियों की फ़ोटो ईमेल कर चुके थे, पर वह सबको रिजेक्ट कर देता था. उसे लगने लगा था कि नीमा उसके लिए सही लाइफ़ पार्टनर साबित हो सकती है.
“अगर तुम सचमुच लंदन आना चाहती हो, तो मेरे पास एक अच्छा प्रपोज़ल है. क्या तुम मुझसे शादी करना पसंद करोगी?” मनन की इस बात का जवाब नीमा ने काफ़ी दिनों तक नहीं दिया. 2-3 दिनों तक वह ऑनलाइन भी नहीं आई. मनन ने उसे कई बार फ़ोन किया, लेकिन उसने नहीं उठाया.
मनन बेसब्री से उसके जवाब का इंतज़ार कर रहा था. वह देर रात तक लैपटॉप खोले बैठा रहता कि शायद नीमा ऑनलाइन आ जाए. कुछ दिनों बाद नीमा के चेहरे को वेबकैम पर देखकर वह गुनगुना उठा, “क्या मेरा प्रपोज़ल बुरा लगा या यू नीड टाइम टू थिंक?”
“एनआरआई लड़के से शादी करते डर लगता है, वैसे तुम मुझे पसंद हो.”
“डोंट वरी, मैं जल्दी ही इंडिया आ रहा हूं. तुम्हारे सारे डर मुझे देख भाग जाएंगे.”
दोनों के परिवार मिले और बातचीत के बाद मनन के इंडिया आने के एक महीने के अंदर ही उन दोनों का विवाह हो गया और नीमा ख़ुशहाल ज़िंदगी के सपने लेकर मनन के साथ लंदन चली आई. मनन से मिलने के बाद उसके सारे डर दूर हो गए थे और वह उसके प्यार में आकंठ डूब चुकी थी. सचमुच नीमा के लिए किसी सपने की तरह ही था लंदन और मनन का साथ. दोनों एक-दूसरे का साथ पाकर ख़ुुश थे. 2-3 महीने तो नए प्यार की खुमारी और घूमने-फिरने में निकल गए. अक्सर रात को वे घूमने निकल जाते या लेट नाइट पार्टियां एंजॉय करते. मनन अक्सर कहता, “वी आर मेड फॉर ईच अदर.” तब नीमा के गाल आरक्त हो जाते.
“थैंक्स टू इंटरनेट, जिसकी वजह से तुम मेरी ज़िंदगी में आई, वरना हम तो यूं ही जिए जा रहे थे.” यह सुनकर नीमा को लगता कि वह सचमुच बहुत ख़ुशक़िस्मत है. धीरे-धीरे ज़िंदगी रूटीन पर आने लगी, तो लेट नाइट पार्टियां भी कम हो गईं और सैर-सपाटा भी. कुछ दिनों तक घर लौटने के बाद मनन सारा समय नीमा के साथ ही बिताता रहा, लेकिन धीरे-धीरे चैटिंग करने और घंटों नेट पर बैठे रहने की आदत उस पर फिर से हावी होने लगी. वह घर आकर ड्रिंक लेता और इंटरनेट पर व्यस्त हो जाता. नीमा उसे डिनर की याद दिलाती, तो वो कभी-कभी उसके साथ बैठकर खाता, वरना अक्सर स़िर्फंग करते-करते ही खाना खाता. पहले तो नीमा को लगा कि अब वह उसके साथ है, तो उसकी यह आदत जल्दी ही छूट जाएगी, पर वक़्त बीतने के साथ उसे लगा कि मनन के लिए इंटरनेट-चैटिंग किसी नशे से कम नहीं है. वह उससे बात करना चाहती, तो वह ‘हां-हूं’ में जवाब देता, वह उसके पास खड़ी रहती, पर मनन उसे महसूस ही नहीं कर पाता.
लंदन में नीमा स़िर्फ मनन के ही भरोसे थी, इसलिए अकेलापन उसे खलने लगा. वह अकेले कितना घूमे या कितनी शॉपिंग करे, यह बात वह बहुत बार मनन से कह चुकी थी.
“देखो नीमा, तुम्हें लंदन के लाइफ़स्टाइल को अपनाना होगा. फ्रेंड्स बनाओ, गो फॉर पार्टीज़ या कोई जॉब देखो.” मनन के सपाट से उत्तर से वह कट कर रह जाती.
“मुझे तुम्हारे साथ की ज़रूरत है.” उसने कई बार उससे कहा, पर मनन तो जैसे अपनी अनमैरिड लाइफ़ को फिर से जीने लगा था. डेढ़ साल तक यह सिलसिला चलता रहा. नीमा को लगता कि मनन साथ होते हुए भी उससे कितना दूर है. अकेलापन उसे आहत कर जाता और वह भीतर ही भीतर घुटने लगी. इंडिया तो था नहीं, जो रिश्तेदारों या पास-पड़ोसियों के पास जाकर अपना दुख-दर्द बांट लेती. यहां तो सब अपनी-अपनी ज़िंदगी बिना किसी हस्तक्षेप के जीना पसंद करते थे. पति का साथ न मिलना उसे कचोट जाता. “आख़िर हद होती है किसी बात की, यह भी कोई बात हुई कि तुम ऑफ़िस से आकर नेट पर बैठे रहते हो.” एक दिन उसके सब्र का बांध टूट ही गया. “व्हाट डू यू वांट? तुम क्या चाहती हो कि मैं सारे दिन तुम्हारे पल्लू से बंधा बैठा रहूं?”
“नहीं, तुम इसी निर्जीव कंप्यूटर से चिपके रहो, पर मैं जीना चाहती हूं. मैं इंडिया जा रही हूं और डायवोर्स के पेपर तुम्हें भिजवा दूंगी.”
अचानक मोबाइल बजने से मनन चौंका. न जाने कितनी देर से वह यूं ही लेटा हुआ था. इस वक़्त उसका किसी से भी बात करने का मन नहीं कर रहा था, इसलिए उसने फ़ोन काट दिया. एक महीना बीत गया है नीमा को गए.

2

शुरू-शुरू में तो वापस अपने रूटीन में आना और कोई रोक-टोक न होना उसे अच्छा लगा, पर कुछ दिनों बाद ही उसे ऐसा लगने लगा, मानो उसके जीवन में रिक्तता आ गई हो. नीमा का प्यार, उसका साथ और उसका हमेशा उसकी केयर करना सब याद आने लगा. इतनी अच्छी लाइफ़ पाटर्नर को खोना… आख़िर इस अकेलेपन से उसे क्या मिल रहा है?… घर आता तो एक सन्नाटा उसका स्वागत करता. पहले नीमा की खिलखिलाती हंसी और बांहें उसका स्वागत करती थीं. लंदन की ज़िंदगी उसे नीरस लगने लगी थी. आख़िर किससे शेयर करता अपने मन की बात? चैटिंग में भी उसका मन नहीं लगता था. नीमा से उसने ऑनलाइन बात करने की कोशिश की, पर वह हर बार ऑफ़लाइन ही मिली. आख़िर ग़लती तो उसी की थी. “आई कांट लिव विदाउट यू नीमा, यू हैव टू कमबैक…” वह बुदबुदाया.
ज़रूरत से ज़्यादा जब कोई चीज़ हम पर हावी हो जाती है, तो ज़िंदगी की बाकी ख़ुशियों का नज़रअंदाज़ होना स्वाभाविक ही है. इसी उधेड़बुन में कब सुबह हो गई, उसे एहसास ही नहीं हुआ. लगभग अपने को घसीटता हुआ मनन बेड से उठा और ट्रैवल एजेंट को फ़ोन मिलाने लगा. “गेट मी वन टिकट फॉर इंडिया, ऐज़ सून ऐज़ पॉसिबल.”
‘कमबैक नीमा…’ उसने उसे ईमेल किया और लैपटॉप बंद कर दिया.
टैरेस पर आकर देखा, बहुत दिनों बाद मौसम साफ़ हुआ था. सर्द हवाएं उसे चुभी नहीं, बल्कि भीतर तक सुकून दे गईं.

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