कहानी- दो टके की लड़की (Short Story- Do take ki ladaki)

 

कहानी
“ऐसी मंशा नहीं थी मेरी… तुम्हारा पुरुषार्थ कुंठित हो ऐसा तो मैं कदापि नहीं चाहती थी, परंतु पुरुषार्थ की बागडोर संयम के हाथों रहे, यह भी आवश्यक था. अपनी ग़लती सुधारने का और प्रायश्‍चित करने का एक मौक़ा दिया था मैंने तुम्हें, परंतु…”

कहीं फिर से कपिल को बुखार न चढ़ आया हो… पता नहीं समय पर खाना खाया होगा या नहीं… दवा ली भी होगी या नहीं उन्होंने… बिन्नी ने समय से आकर झाडू-पोंछा, बर्तन किया होगा अथवा नहीं… जैसी तमाम चिंताओं से घिरी कांता कचहरी के कामों को अपने असिस्टेंट को सौंपकर समय से दो घंटे पूर्व ही कोर्ट से भागते-दौड़ते घर पहुंची. कॉलबेल का बटन दबाते ही बिन्नी ने दरवाज़ा खोला.
बिन्नी की लाल-लाल सूजी आंखें, बिखरे-से अस्त-व्यस्त बाल देखकर कांता क्षणभर को चौंकी. इसकी हालत को क्या हुआ…? चेहरा क्यों उतरा हुआ है? मन की बात प्रश्‍न बनकर आंखों में आ जमी, “क्या बात है बिन्नी? क्या हो गया तुम्हें?”
पर बिन्नी निरुत्तरित-सी खड़ी रही. फिर कंपकंपाते हाथों से अपनी चुन्नी से आंसू पोंछती हुई एकाएक सुबकती हुई फुर्ती से बाहर निकल गई.
“बिन्नी… ऐ बिन्नी… सुन तो…” कांता ने आवाज़ दी, पर कांता की निरंतर पुकार पर भी नहीं रुकी वह. “इसे क्या हुआ अचानक? इस तरह का व्यवहार तो कभी नहीं करती.” बड़बड़ाती हुई कांता बेडरूम में पहुंची. बेडरूम से अटैच्ड बाथरूम से तेज़ शावर की आवाज़ के साथ-साथ कपिल की गुनगुनाहट से वह समझ गई कि कपिल नहा रहे हैं, पर एकाएक बिस्तर पर नज़र पड़ते ही जैसे वह जड़ हो गई…
बिस्तर पर फैले कपिल के कपड़े और अस्त-व्यस्त चादर की सिलवटें स्पष्ट इंगित कर रही थीं कि यहां क्या घटित हुआ है. क्षणभर को कांता का शरीर इस अनपेक्षित दृश्य से मूर्त हो गया… हृदय मानो धड़कना भूल रहा हो…
वर्षों से धीरे-धीरे जिस विश्‍वास की नींव पर उसने कपिल के साथ मिलकर वैवाहिक जीवन की इमारत खड़ी की थी, वह अचानक क्षणभर में इस तरह डगमगा जाएगी, ऐसा तो उसने कल्पना में भी नहीं सोचा था.
“तो क्या कपिल ने बिन्नी के साथ… नहीं नहीं, मुझे बिना जाने-समझे किसी नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिए. कभी-कभी आंखों देखी और कानों सुनी बात से भी सत्य परे होता है…” मन को समझाती हुई वह बैठक में आ गई व सो़फे पर निढाल-सी बैठ गई.
सुबह अचानक सिरदर्द और बदन में हरारत की वजह से कपिल बुखार-सा महसूस कर रहे थे. “दिनभर दवा खाकर आराम करूंगा आज तो…” कपिल ने अलसाते हुए कहा, तो कांता ने उनके लिये खिचड़ी बनाकर रख दी व अकेले ही कचहरी जाने के लिये तैयार हो गई. हालांकि कपिल की अस्वस्थता के कारण वह भी घर में ही रुकना चाहती थी, पर आज एक महत्वपूर्ण मुवक्किल की पेशी थी, इसलिये कपिल ने ही कांता को केस समझाकर जाने के लिये मजबूर कर दिया था.
“अरे, आज तुम जल्दी कैसे आ गई?” बाथरब लपेटे, तौलिये से बाल सुखाते हुए कपिल ने बैठक में दाखिल होते हुए पूछा तो कांता की तंद्रा टूटी.
“बिन्नी को क्या हुआ… रोती हुई क्यों भागी? मेरे आवाज़ देने पर भी नहीं रुकी?” कपिल के प्रश्‍न को अनसुना कर कांता ने प्रश्‍न किया.
“मैंने डांट दिया था उसे… ठीक से झाडू नहीं लगा रही थी इसलिए… क्यों? क्या हुआ? तुम ज़्यादा सिर मत चढ़ाया करो उसे… नौकरानी को नौकरानी की तरह ही रखना चाहिये.” कपिल अति सामान्य ढंग से बोल रहे थे.
कांता ने कपिल के चेहरे पर नज़रें गड़ा दीं. मन ही मन वह कपिल के चेहरे पर विकसित भावों को बारीक़ी के साथ परखने लगी. “निश्छलता के अलावा कुछ भी तो नज़र नहीं आ रहा है यहां… मैंने नाहक ही न जाने क्या-क्या सोच डाला!” मन ही मन ग्लानि-सी हो आई उसे.
“बुखार कैसा है तुम्हारा? कुछ खाया?” क्षणभर की चुप्पी के बाद मन कुछ संयत हुआ तो कांता ने पूछा.
“हां ठीक हूं. बुखार उतरा तो पसीने से नहा गया था, इसलिए सोचा थोड़ा फ्रेश हो लूं…….नहा लिया तो अब कुछ हल्का महसूस हो रहा है.” कपिल अब भी सामान्य रूप से बतिया रहे थे.
कांता सो़फे से उठकर बेडरूम में जाने को मुड़ी ही थी कि कपिल ने पीछे से आकर कांता को बांहों के घेरे में लेते हुये कहा, “मैडम, किचन से पहले दो कप बढ़िया गरमागरम चाय तो बना लाओ…..एक साथ पियेंगे……” कपिल की मनुहार पर कांता मुस्करा दी, सारा क्षोभ हंसी में घुलने लगा.
ट्रे में दो कप चाय लेकर कांता बेडरूम में पहुंची, तो देखा बिस्तर पर नई स्वच्छ इस्त्री की हुई चादर फैली हुई है, सलीके से तकिये जमे हुये हैं. पुराना चादर शायद कपिल ने निकालकर बाथरूम के टब में धोने के लिये डाल दिया था.
“पर क्यों? बिस्तर की चादर बदलना तो कपिल की आदतों में शुमार नहीं है. शायद वो नहीं जानते कि जब वो नहा रहे थे तब मैं बेडरूम का बेतरतीब नज़ारा पहले ही देख चुकी हूं. आख़िर कोई बात तो अवश्य है जो कपिल मुझसे छिपाना चाहते हैं…” न जाने क्यों मन के भीतर यह बात समा गई.
“क्या बात है? कहां खो गई हो तुम? तबियत तो ठीक है न?” चाय की चुस्की लेते हुये कपिल ने पूछा.
“ठीक हूं. बस यूं ही थोड़ी-सी थकान महसूस हो रही थी.” चाय का कप मेज़ पर सरकाकर कांता आंखें मूंदे निढाल-सी बिस्तर पर ढह गई. मन में उथल-पुथल मची हुई थी. “कपिल पर सीधा आक्षेप लगाना ठीक नहीं होगा… संभव है, मैं ही ग़लत होऊं, तो अब क्या करूं?”
अगले तीन दिन तक बिन्नी नहीं आई. नाराज़ होगी या कपिल की डांट से ही डर गई होगी. बिन्नी की अनुपस्थिति के कारण सारा काम कांता के सिर पर आ पड़ा. सुबह घर के सारे काम, ऊपर से कोर्ट-कचहरी करते-करते कांता थक कर चूर हो जाती. तीन दिनों से कपड़े तक नहीं धो पाई थी वह… कपड़ों का ढेर लग गया था. इतवार को उसने सुबह से वॉशिंग मशीन लगा दी. कपड़े धोते-धोते जब कांता ने वह चादर उठाई, जो चार दिन पूर्व कपिल ने धोने डाली थी, तो अकस्मात कांता का ध्यान उसमें फंसी कान की बाली पर अटक गया… सन्न रह गई वह. अब तो शक की कोई गुंजाइश ही शेष नहीं रही. यह तो वही बाली थी, जो पिछली दीपावली पर कांता ने स्वयं बिन्नी को लाकर दी थी. मतलब बिल्कुल साफ़ था. बिन्नी यूं बिना कारण नहीं सुबक रही थी. देर तक कांता यूं ही खड़ी-खड़ी क्षोभ, अपमान और क्रोध से थरथराती रही. अनायास ही उसके पांव की पेशियां कांपने लगीं, मानो अचानक किसी ने उसको यथार्थ के कठोर धरातल पर बेरहमी से पटक दिया हो.
क्या पुरुष के लिये स्त्री का शरीर इतना महत्व रखता है कि उसे भोगने के लिये वह अपनी उम्र, ओहदा, रिश्तों का लिहाज, मान-सम्मान जैसी नैतिकता की सारी हदें पार कर जाता है. बाहरी दुनिया में एक सभ्य-सुसंस्कृत, सभ्रांत नज़र आने वाले हर पुरुष के भीतर क्या इसी तरह एक कुरूप, कलूष, घृणित मानसिकता वाला चेहरा भी छिपा होता है? अवसर पाते ही जिसके आदिम पशु संस्कार जागृत हो जाते हैं!
ह़फ़्तेभर बाद आख़िर बिन्नी काम पर आ गई, तब तक कांता भी चुप्पी साधे रही. कपिल के समक्ष उसने इस विषय को अब तक नहीं उठाया था. पहले वह बिन्नी से सच जानना चाहती थी. वह भी आख़िर वकील थी और समझती थी कि कभी-भी एकपक्षीय निर्णय नहीं करना चाहिए. दोनों पक्षों की सुनवाई के आधार पर ही तो न्यायाधीश न्याय करते हैं.
बिन्नी आते ही चुपचाप रसोई में अपने काम में लग गई.
कांता ने सहज भाव से पूछा, “छुट्टी क्यों की? तबीयत ठीक नहीं थी क्या?”
“हां.” एक संक्षिप्त उत्तर के साथ वह पुन: काम में जुट गई.
जब काम निबटाकर बिन्नी जाने को हुई तो कांता ने उसे आवाज़ दी व कान की बाली आगे बढ़ाते हुए बोली, “लो तुम्हारी है न? बिस्तर में मिली थी मुझे.” कांता ने बिन्नी के चेहरे पर आंखें गड़ाकर देखा.
बिन्नी का थरथराता शरीर, बंद होंठ और डबडबाई आंखों ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया था. कांता ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुये कहा, “बिन्नी, तुम मेरी बेटी जैसी हो. कोई बात है जो तुम मुझसे छिपा रही हो. शायद मेरे डर से या अंकलजी के डर से… पर यक़ीन मानो, यदि सच कहोगी, तो न मैं तुम्हें डाटूंगी और न ही काम पर से हटाऊंगी, बल्कि हर संभव तुम्हारे हित में सही-सही सोच सकूंगी निर्णय कर सकूंगी.”
कांता की आत्मीयता की गरमाहट से बिन्नी पलभर में पिघल गई. कांता के क़दमों में बैठ अपने घुटनों में सिर छिपाए वह सुबकने लगी. मन का गुबार हिचकियों में परिवर्तित हो गया. कांता ने उसे एक गिलास पानी देते हुए कहा, “शांत हो जा बिन्नी. बता, बात क्या है?”
बिन्नी ने रोते-रोते सब कुछ बयां कर डाला. वही अनपेक्षित सत्य जिसे पिछले आठ दिनों से कांता सच-झूठ की तुला पर मन-ही-मन तौल रही थी, आज वही सत्य उसके समक्ष नंगा नाच रहा था. सर से पैर तक रोम-रोम दहक उठा. ऐसा दुष्कृत्य करते हुये क्या कपिल को क्षण मात्र को भी मेरा ख़याल नहीं आया होगा? नेहा का ख़याल नहीं आया होगा?
“आंटीजी, अंकलजी को न बताइएगा. उन्होंने मुझसे मना किया था किसी को बताने के लिये. कह रहे थे, “यदि ज़ुबान खोली, तो तेरा और तेरी मां का जीना मुश्किल कर दूंगा. वैसे भी तेरी बात पर यक़ीन कौन करेगा. बदनामी तेरी ही होगी.” रोना कुछ शांत हुआ, तो बिन्नी बोली.
“मैं करूंगी यक़ीन. अब स्वयं को और अंधेरे में नहीं ढकेलूंगी मैं…” मन ही मन कुछ तय करते हुए कांता बुदबुदाई, “तू चिंता मत कर बिन्नी. मैं सब संभाल लूंगी.” बिन्नी को तो आश्‍वासन देकर कांता ने भेज दिया, पर स्वयं उसके मन में एक भयंकर चक्रवात आ चुका था. जो न जाने उसके व्यक्तित्व को किस दिशा में बहा ले जाने पर आमादा था.
मन में एक अंतर्द्वन्द्व फन उठाये खड़ा था. दोषी को सज़ा दिलवाती हूं तो सामाजिक प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है. कल को नेहा का ब्याह करना है. यदि कपिल की प्रतिष्ठा पर आंच आती है, तो बेटी के विवाह में कठिनाई होगी. पर ज़ुर्म होते देख चुप्पी साध लेना तो जुर्म करने से भी बदतर होता है. और फिर बिन्नी? बिन्नी के प्रति न्याय कर सकेगी वह? कपिल के साथ-साथ उसकी भी बदनामी नहीं होगी? यूं ही पड़े-पड़े घंटों सोचती रही वह. कमरे में अंधेरा गहराया तो तंद्रा भंग हुई. मुंह धोकर पूजाघर में धूप-अगरबत्ती जला आई. एक कप चाय बनाकर बैठक में आ गई.
कपिल किसी कार्य से शहर के बाहर गये थे. उनके आने पर क्या कहेगी वह? कैसे कहेगी? आज तक कभी ऐसी स्थिति नहीं आई थी उनके बीच. पूरी रात कांता के मन में अंतर्द्वन्द्व चलता रहा. सुबह उठी तो सिर कुछ भारी था, पर मन हल्का हो चुका था. ‘कपिल के आते ही उनसे उनका गुनाह कबूल करवाऊंगी. आंखों के सामने बिन्नी से क्षमा मांगने को कहूंगी. सामाजिक प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आएगी और क्षमा से गुनाह का भार भी कम हो जाएगा…’ कांता मन ही मन तय कर चुकी थी.
“तुम्हारा दिमाग़ तो ख़राब नहीं हो गया?” कांता की बात सुनकर ही कपिल उत्तेजित हो गये. कांता का आक्षेप सही था… कलेजे पर वार कर गया था, परंतु दंभ उभर आया, “दो टके की लड़की के सामने माफ़ी मांगूं? अरे, मैं जानता हूं ऐसी लड़कियों को. जाने किस-किस के साथ ऐश कर चुकी होगी. इतनी भोली नहीं है वो, जितना तुम समझती रही हो.” कपिल बौखलाकर बोले.
“हां कपिल, दोष तो मेरी समझ का ही है. तुम्हें भी मैं अब तक कहां समझ पाई थी.” स्वर भर्रा गया कांता का. थोड़ी देर चुपचाप थरथराती रही वह, फिर किसी तरह पूरा मनोबल जुटाकर बोली, “माना वह भोली नहीं है, पर इसका अर्थ यह तो नहीं है कि तुम्हें उसका फ़ायदा उठाने का अधिकार मिल गया. अपराध तो तुमसे हुआ है, फिर माफ़ी मांगने में हर्ज़ ही क्या है? आख़िर अपनी नेहा जैसी है वह. कम से कम जीवनभर की आत्मग्लानि से मुक्ति तो पा लेंगे हम और बात यहीं खत्म हो जाएगी, वरना…
“ओफ़ कांता! वरना क्या? और कैसी आत्मग्लानि? क्या बेकार की बातें करती हो….” कपिल झल्लाकर बोले, “…मैंने कोई जान-बूझकर या सोच-समझकर नहीं किया ये सब… भावावेश में अपने आप पर काबू नहीं रख सका बस… बेवजह तूल देने की बजाय बेहतर होगा कि तुम भी इस बात को यहीं ख़त्म कर दो… कल से बिन्नी की जगह कोई और लड़की रख लेना काम पर.” वह रूखाई-सी झाड़ते हुए अपने कमरे में चले गए.
वर्षों बाद कपिल के इस रूप से भी परिचित होना पड़ेगा, ऐसा तो सोचा नहीं था कांता ने. क्षोभ और अपमान से आंखें आंसुओं से भर गईं. पर जीवन कहां रुकता है किसी के लिये! बिन्नी गई तो कोई और आ गई काम पर. दिन-रात उसी ढर्रे पर गुज़रने लगे. बस फ़र्क़ था तो इतना कि कपिल व कांता के रिश्तों में अब वो बात नहीं रही थी जो पहले थी.
“व्हॉट? उस दो टके की लड़की की इतनी हिम्मत कि थाने पहुंच जाए-रिपोर्ट दर्ज कराने! हां..हां, थानेदार कौन है वहां, पता करो. ठीक है. तुम फ़ोन कर देना थाने में…” कपिल फ़ोन पर किसी से कह रह थे.
कांता समझ रही थी कि किस दो टके की लड़की की बात हो रही है फ़ोन पर, पर चुप रही वह. इस विषय पर उसने कपिल से बहस न करने की कसम खा ली थी.
अगले दिन थाने से फ़ोन आया. कांता ने ही रिसीव किया था- “मि. कपिल अग्रवालजी से बात कर सकता हूं? मैं इंस्पेक्टर सिन्हा बोल रहा हूं.”
कांता ने कपिल को बुला दिया व पुन: अपने कामों में लग गई, पर कान कपिल की बातों पर ही लगे हुए थे.
“या इंस्पेक्टर, बोलिये, मैं कपिल बोल रहा हूं…. हां हां, जानता हूं….. इनका अपना तो कोई स्टेटस होता नहीं है……नामी-गिरामी लोगों पर कीचड़ उछालकर पैसे ऐंठना तो इनके ख़ून में ही होता है… ओह नो… आम एम नॉट वरीड… जब तक आप हैं, हमें चिंता करने की क्या आवश्यकता? ओ.के. इंस्पेक्टर… थैंक्स अगेन फॉर कॉऑपरेशन… किसी दिन तशरीफ़ लाइये… हमें भी सेवा का मौक़ा मिल जायेगा.” हंसते हुये कपिल ने रिसीवर रखा तो अनायास ही उसकी नज़रें कांता से जा मिलीं, जो गहरी नज़रों से उन्हीं को देख रही थी. एक विद्रुप-सी हंसी कपिल के चेहरे पर फैल गई… गर्दन झटक कर वह अपने कमरे में चले गए.
वर्षों से कपिल के व्यक्तित्व के इन्द्रधनुषी रंग ही तो देख पाई थी अब तक, पर यह काला रंग भी उन्हीं के व्यक्तित्व का हिस्सा है, जानकर मन घृणा से भर गया.
दो दिन बाद पता चला कि नारी मुक्ति संगठन की महिलाओं ने थाने पर धरना दिया है. बिन्नी की रिपोर्ट दर्ज न करने के मामले ने तूल पकड़ लिया था. विरोध में थाने का घेराव व थानेदार के निलंबन की मांग ज़ोर पकड़ने लगी.
थानेदार का फ़ोन आया- “आय एम सॉरी मि. कपिल… एफ.आई.आर. दर्ज करनी ही पड़ी… ऊपर से आदेश था… लड़की की बैकिंग में नारी मुक्ति वाले खड़े हो गये थे… रिपोर्ट दर्ज न करते तो सस्पेंशन हो जाता हमारा…”
कपिल ने रिसीवर रखा तो होश उड़े हुए थे. दिमाग़ में सन्नाटा छा गया था. वह पगली-सी लड़की उसके लिये इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर देगी… सोचकर मन में उथल-पुथल मच गई. मुश्किल यह थी कि अपनी मानसिक दशा की बात वह किसी से भी नहीं कह सकते थे…… कांता से भी नहीं.
आगे क्या-क्या होगा… सारी संभावनाएं किसी चलचित्र-सी मस्तिष्क में घूम गईं… “गिऱफ़्तारी… ज़मानत, फिर मुक़दमा… लेकिन इस दौरान मान-प्रतिष्ठा की जो छिछालेदर होगी, उसका क्या? देखा जाएगा.” कपिल ने स्वयं को आश्‍वस्त किया, पर मन-ही-मन शंका-समाधानों के ज्वार-भाटे उठते-गिरते रहे.
जहां-जहां सहयोग व सहायता की आस थी, कपिल फ़ोन पर फ़ोन लगाते रहे. ‘आख़िर दो टके की लड़की मेरा क्या बिगाड़ लेगी’ वाला भ्रम कुछ कमज़ोर पड़ने लगा, पर मन का दम्भ कुछ कम न हुआ. “कोई न कोई जुगाड़ मैं कर ही लूंगा… कहां तक जोर मारेगी लड़की……. अदालत में देख लूंगा. कुछ न बिगड़ पाने की उम्मीद पुन: मज़बूत हो उठी. अपने नाम व अपनी साख पर फिर गुमान हो आया कपिल को. आशा के लंबे-चौड़े पंख होते हैं… वही उन्हें ले उड़ी और तब तक उड़ाती रही जब तक मुक़दमे की तिथि नहीं आई.
नियत तिथि पर अदालत में कपिल के ठीक सामने थी बिन्नी. एक उपेक्षाभरी नज़र कपिल ने बिन्नी पर डाली तो उसने नज़रें झुका लीं.
परंतु अगले ही क्षण जब बिन्नी की ओर से केस फाइल लेकर कांता खड़ी हुई तो कपिल सन्न रह गए, मानो पूरा ख़ून शरीर में जहां का तहां जम गया हो. हॉल में कुछ क्षणों तक खुसुर-फुसुर मची रही, पर कांता के चेहरे पर अविचलित-सा आत्मविश्‍वास कायम रहा.
उसने नि:संकोच अपने मुवक्किल की पैरवी की…… दृढ़ता के साथ कपिल के समक्ष प्रश्‍नों की झड़ियां लगा दीं. कपिल की कुशाग्रता व वाकपटुता के बावजूद कांता ने अपनी बात ढीली नहीं की. आज हर तरह से जूझने के लिये वह तैयार थी. तर्क-वितर्कांे के बीच कुछ ही पलों में सत्य सामने उभर आया. कपिल का झूठा दर्प चूर-चूर हो चुका था.
न्यायाधीश महोदय ने कपिल को गुनहगार मानते हुये बलात्कार के आरोप में पांच वर्ष की कैद के साथ आर्थिक दण्ड भी दिया.
कोर्ट बहाली के पश्‍चात कपिल जब पुलिस हिरासत में बाहर निकले तो देखा बिन्नी कांता के चरणों में झुकी हुई है, “आप न होतीं आंटीजी तो मैं वह सब कुछ कभी न कर पाती जो मैंने किया…” कांता स्नेह से बिन्नी के सिर पर हाथ फेर रही थी.
कपिल पर नज़र पड़ते ही कांता चलकर उनके क़रीब आ गई, “मुझे माफ़ करना कपिल.” आंखों में नमी उभर आयी- “…..खुलकर तुम्हारा विरोध करूं, ऐसी मंशा नहीं थी मेरी…….तुम्हारा पुरुषार्थ कुंठित हो ऐसा तो मैं कदापि नहीं चाहती थी, परंतु पुरुषार्थ की बागडोर संयम के हाथों रहे, यह भी आवश्यक था. अपनी ग़लती सुधारने का और प्रायश्‍चित करने का एक मौक़ा दिया था मैंने तुम्हें, परंतु….बिन्नी से माफ़ी मांगने में तुम्हारा अहंकार आड़े आ गया, क्योंकि तुम्हारे लिये वह केवल दो टके की लड़की थी.
बिन्नी तुम्हारे लिये दो टके की लड़की है तो सोचो कल को हमारी नेहा किसी और के लिये दो टके की लड़की बन जाये तो……?”
कांता ने कपिल के दोनों हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा, “हमें अपने दुष्कर्मों की सज़ा इसी जनम में किसी न किसी रूप में भुगतनी पड़ती है……… तुम्हारे इस दुष्कृत्य की परछाईं अपने बच्चों पर पड़े और कोई अनिष्ट घटित हो, इसके पूर्व इसका प्रायश्‍चित हो जाना ज़रूरी था. बस, यही सोचकर मैंने…….” आगे कुछ बोलते न बना……गला अवरूद्ध हो गया कांता का…… पलकें अश्रुओं के भार से स्वत: बंद हो गईं और हमदर्दी की दो बूंदें कपिल के हाथों पर लुढ़क गईं.

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       स्निग्धा श्रीवास्तव

 

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