कहानी- गति ही जीवन है (Short Story- Gati Hi Jeevan Hai)

यह भागदौड़ उस सन्नाटे से अच्छी है, जो कई बार डरा देता है. पर जीवन की गति अनवरत चलती रहे, तो ही सब सहज व सुगमता से चल पाता है. विराम कुछ पल के लिए तो ठीक है, पर उसके बाद वह खालीपन और निरर्थकता का बोध कराने लगता है. बिज़ी लाइफ तो जीवन का ही एक हिस्सा है, जिससे एक चहल-पहल बनी रहती है. गति ही जीवन है डियर. व्यस्तता में ही ख़ुशी है.

Kahani

उ़फ् कैसा समा था… धूप की किरणें या कहें रोशनी के छोटे-छोटे क़तरे बादलों की कोख से धीरे-धीरे झांक रहे थे. आसमान के विस्तृत फलक पर छितरी स़फेद बादलों की लंबी कतारें, दूर-दूर तक छिटकी हुईं. कहीं-कहीं बादलों की दरारों से झांकता नीला आसमान नज़र आ जाता. कहीं बादलों का एक आसमान-सा झुंड लगता सामने आ जाता, मानो वह आसमान की सैर करने निकला हो.

दूर पहाड़ों की चोटियों पर पड़ती सूरज की रोशनी… पहाड़ों  की परतों की तरह लग रही थी और एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रही थी. एक पहाड़ को पार करता दूसरा पहाड़, एक चोटी दूसरी चोटी को लांघती… सर्पीली चोटियां… ऊबड़-खाबड़… फिर भी ग़ज़ब का समन्वय और संतुलन. पहाड़ों पर लगे पेड़ों की लंबी-लंबी कतारें… रिसॉर्ट की बालकनी पर खड़ी अमला जब इस नज़ारे को निहार रही थी, तो उसे लगा कि जैसे बैगपाइपर बांसुरी बजाता चल रहा है और उसके पीछे-पीछे असंख्य बच्चे या फिर संगीत की कोई धुन… आरोह-अवरोह… उठती-गिरती लय… प्रकृति कितनी दक्ष है, संतुलन बनाना जानती है… लेकिन तभी तक, जब तक इंसान के क्रूर हाथ उस तक न पहुंचें. फिर तो उसकी सुंदरता नैसर्गिक न रहकर, कृत्रिम बन जाती है.

बड़े शहरों में हम पत्थरों को पैरों की ठोकरें मारते रहते हैं और पहाड़ों पर यही पत्थर, बड़ी-बड़ी चट्टानें किसी तिलिस्म से कम नहीं लगती हैं. न कोई आकार, न कोई स्थल का चुनाव, फिर भी यही बड़े-छोटे पत्थर आकर्षित करते हैं. इन्हें छूने, इनके पास बैठने का मन होता है. पहाड़ों से उतरते कटावदार, सीढ़ीनुमा आकार और उनके बीच-बीच में बने घर, झोपड़ीनुमा… कहीं कोई बस्ती नहीं, घर भी यहां बहुत दूर-दूर बने होते हैं. जैसे-जैसे सूरज की किरणें बादलों की कोख से बाहर निकल रही थीं, उजाला बढ़ता जा रहा था और उसके मन की प्रफुल्लता भी. एक उजास-सा मन-प्राण को घेर रहा था.

बालकनी से उठ वह अंदर आ गई. बेड पर यूं ही लेट गई. तीन दिन हो गए थे उसे नारकंडा आए. हिमाचल में स्थित यह स्थान एकदम शांत था. कभी-कभी तो लगता कि हर तरफ़ सन्नाटा ही सन्नाटा पसरा हुआ है. असल में वह ख़ुद ऐसी ही जगह आना चाहती थी, जहां न तो शोर-शराबा हो और न ही कोई डिस्टर्ब करनेवाला. थक गई थी, अपनी रूटीन लाइफ से. ऑफिस में काम करने की तो कोई सीमा ही नहीं थी. एक प्रोजेक्ट ख़त्म होता, तो दूसरा शुरू हो जाता. इतनी बिज़ी लाइफ कि कभी-कभी तो लगता था कि घर केवल सराय मात्र है. जाओ सो जाओ, उठो ऑफिस पहुंच जाओ, न खाने का ठिकाना, न रिलैक्स करने का अवसर. बस, काम ही करते रहो.

बहुत दिनों से उसे लग रहा था कि उसे कहीं बाहर जाना चाहिए. एक लंबी छुट्टी पर… कितनी बार वह अपनी कलीग सौम्या से कह चुकी थी कि चलो कहीं चलते हैं, पर निकलना ही नहीं हो पाता था. वैसे भी छुट्टी मांगना भी किसी जोखिम से कम न था. बड़ी मुश्किल से एक दिन बॉस से लड़-झगड़कर उसने दस दिनों की छुट्टी ली और ख़ुद ही निकल पड़ी सुकून पाने के लिए.

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“कुछ काम होगा, तो कॉन्टैक्ट करूंगी, तू वहीं से मुझे प्रोजेक्ट में हेल्प कर देना अमला.” सौम्या ने जब उससे कहा, तो उसने तुरंत मना कर दिया. “देख, मैं वहां रिलैक्स करने जा रही हूं, इसलिए कोई काम मत पूछना प्लीज़. मैं ऑफिस का कोई फोन नहीं उठाऊंगी. अरे बाबा, वहां तो चैन से रहने देना मुझे. सारा दिन सोनेवाली हूं मैं. इसलिए रिसॉर्ट बुक किया है. अच्छी बात तो यह है कि इस समय वहां भीड़ भी नहीं होती. इस समय रिसॉर्ट एकदम खाली है. वैसे तुझे बता दूं कि मैं अपने साथ लैपटॉप भी लेकर नहीं जा रही हूं और प्लीज़ यह बात बॉस को मत बताना, वरना वह मेरी छुट्टी कैंसल कर देंगी.”

बस दो दिन से वह आराम ही कर रही थी. कहीं बाहर निकली भी नहीं थी. दरवाज़े पर खटखट हुई, तो वह उठी.

“मैडम, लंच लाया हूं.” वेटर था. खाना खाते-खाते वह टीवी खोलकर बैठ गई. चैनल ही पलटने में व़क्त निकल गया. सब जगह बकवास ही आ रहा था. वैसे भी उसे टीवी देखने की आदत नहीं थी. असल में टाइम ही नहीं मिलता था. कुछ देर नॉवेल पढ़ा, तो नींद आ गई. मोबाइल की घंटी से नींद टूटी. सौम्या थी.                                                                                                                      “तेरा चिलिंग पीरियड ख़त्म हो गया हो, तो वापस आ जा यार, नहीं हैंडल कर पा रही हूं अकेले. बॉस भी बड़बड़ कर रही है.” सौम्या अपनी आदत के अनुसार बिना किसी औपचारिकता के बोली. “इडियट, यह तो पूछ मैं कैसी हूं, क्या कर रही हूं. बस, शुरू हो गई.”

“ठीक ही होगी, बता कब वापस आ रही है. तीन दिन बहुत होते हैं. अब आ जा. तत्काल में टिकट बुक करा देती हूं.”

“चुप रह, मैं नहीं आ रही. फोन रख और मुझे आराम करने दे.”

सौम्या की याद तो उसे भी बहुत आ रही थी, लेकिन अभी भी वह कुछ करने के मूड में नहीं थी. फिर क्यों उसका मन कर रहा है कि कुछ तो होना चाहिए… कुछ तो करने को होता. फोन पर भी किससे, कितनी बातें करें. क्या मुसीबत है, अख़बार भी नहीं आता यहां. उसे थोड़ी कुढ़न हुई. रिसॉर्ट भी खाली है, कोई टूरिस्ट होता, तो उनसे ही गप्पे मार लेती. पांच बजे से ही इतना अंधेरा हो जाता है यहां कि अब कहीं बाहर भी घूमने नहीं जाया जा सकता है. कितना बोरिंग है… उसे अपने आप पर ही खीझ हुई. दस दिन वह कैसे काटेगी. अचानक उसे लगा कि इतने रिलैक्सेशन के बावजूद कहीं कुछ मिसिंग है. आख़िर सोए भी तो कितना… वैसे भी थकान उतर

चुकी थी और चूंकि कभी इतने खाली रहने की आदत नहीं थी, इसलिए नींद भी आंख-मिचौली करने लगी थी. लैपटॉप ही ले आती, प्रोजेक्ट का कुछ काम ही कर लेती… अब बस भी करो अमला, काम के बारे में नहीं सोचो… तुम यहां रिलैक्स करने आई हो, उसने ख़ुद को समझाया.

एक अकुलाहट-सी होने लगी… ऐसी बैचेनी उसने पहले कभी महसूस न की थी. न कंप्यूटर, न इंटरनेट, न अख़बार, उ़फ् कैसी तो अजीब-सी फीलिंग हो रही है. भागदौड़, चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट, डेडलाइन पर काम पूरा करने की हड़बड़ी, सब उसे अपनी ओर खींचने लगे. सौम्या के साथ काम को लेकर होनेवाली लड़ाई, बॉस के साथ बहस और ऑफिस गॉसिप वह मिस करने लगी. यहां तक कि काम को लेकर हर समय होनेवाली चिड़चिड़ाहट भी उसे याद आने लगी.                                                                                               अगले दिन वह सुबह-सुबह ही आसपास की जगह देखने चली गई. फिर वहां के एक निवासी ने बताया कि वह ‘हातू पीक’ देखने अवश्य जाए, जो नारकंडा में सबसे ऊंचाई पर स्थित एक जगह है और जहां ‘हातू माता’ का मंदिर है. टैक्सी लेकर वह वहां चल दी.

ठंड ने कोहरे की चादर बिछा रखी थी. मन खिल उठा अमला का वहां पहुंचकर. वहां से हिमालय की चोटियां नज़र आ रही थीं. थोड़ी दूर बने ‘भीम के चूल्हे’ को देख तो वह और ख़ुश हो गई. पांडव अज्ञातवास के दौरान वहां खाना बनाया करते थे. उसने तुरंत सौम्या को फोन किया, “जानती है तू क्या मिस कर रही है? यार, क्या प्राकृतिक नज़ारा है. क्या मौसम है यहां का. अभी भी आ जा तू यहां. दोनों एंजॉय करेंगे. इसके बाद मैं ‘महामाया मंदिर’ और ‘तनी जुब्बार लेक’ देखने जा रही हूं. ढेर सारी फोटो खींची हैं मैंने.”

“यार, वापस आ जा, यहीं एंजॉय कर लेंगे. कितने दिन हो गए पार्टी में गए.” सौम्या शायद आगे कुछ और कहना चाह रही थी, पर उसकी बात काटते हुए अमला ने अपनी बात पूरी कर दी, “रहने दे यार, अभी तो और घूमनेवाली हूं मैं यहां.” अमला बहुत ही एक्साइटेड थी. अगला दिन भी उसने आउटिंग में बिता दिया और अब देखने को कुछ नहीं बचा था, सिवाय नेचर वॉच के. धीरे-धीरे उस खालीपन और रिक्तता में उसे डिप्रेशन होने लगा. बिना कुछ काम के एक भारीपन उसे घेरने लगा, तमाम प्राकृतिक सुंदरता और स्वच्छ मौसम के बावजूद. आख़िर क्यों…? वह तो ख़ुद अपनी मर्ज़ी से आई थी.                                                                                                “यार सौम्या, तू मेरा तत्काल में टिकट बुक करा दे, मैं वापस आ रही हूं.” अमला की परेशानी महसूस करते हुए सौम्या ने पूछा, “सब ठीक तो है ना? क्या हुआ? तुझे कोई मदद चाहिए?”

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“आकर बताती हूं.” वापस पहुंचकर अमला सीधे ऑफिस गई और बाकी की छुट्टियां कैंसल करा लीं. कॉफी की चुस्कियां लेते हुए वह बोली, “पता है सौम्या, हम व्यस्त ज़िंदगी के इतने आदी हो जाते हैं कि सुकून के पल भी खलते हैं हमें. भागदौड़भरी ज़िंदगी से भागकर वहां गई थी कि कुछ दिन चैन से गुज़ारूंगी, पर दो-तीन दिन बाद ही लगने लगा कि करूं तो क्या करूं… कुछ भी तो नहीं यहां करने को, आख़िर बादलों को, पहाड़ों को, फूलों को और चारों ओर फैली हरियाली को कितना निहार सकते हैं. खाली बैठने की आदत या कहें यूं ही निरर्थक बैठे रहने की आदत कहां रही है अब.”

“तू कुछ ज़्यादा ही सेंटी नहीं हो रही है?” सौम्या ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा.

“थोड़ा सुकून तो सभी को चाहिए लाइफ में. अच्छा हुआ जो तू चली गई. थोड़ा बदलाव तो महसूस हुआ. अब और फुर्ती से काम करेगी. इस बार का प्रोजेक्ट है भी बहुत चैलेंजिंग.”

“तू ठीक कह रही है, पर सच तो यह है कि यह भागदौड़ उस सन्नाटे से अच्छी है, जो कई बार डरा देता है. पर जीवन की गति अनवरत चलती रहे, तो ही सब सहज व सुगमता से चल पाता है. विराम कुछ पल के लिए तो ठीक है, पर उसके बाद वह खालीपन और निरर्थकता का बोध कराने लगता है. बिज़ी लाइफ तो जीवन का ही एक हिस्सा है, जिससे एक चहल-पहल बनी रहती है. गति ही जीवन है डियर. व्यस्तता में ही ख़ुशी है.”

सौम्या के चेहरे पर एक मुस्कान छा गई थी. ऑफिस के चिर-परिचित माहौल में पहुंच अमला को लगा कि चाहे काम के दौरान वह कितनी ही टेंशन में क्यों न रहती हो, चाहे थकान कितनी ही क्यों न हो, लेकिन काम पूरा हो जाने के बाद जो संतुष्टि मिलती थी, उसके सामने तो बाकी सब बातें व्यर्थ ही लगती हैं.

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     सुमन बाजपेयी

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