"... ऐसा नहीं है कि उसके फ़ैसले से मैं संतुष्ट नहीं हूं, पर मैं बचपन से मुम्बई में रही और यही सोचती रही कि गांव में रह पाऊंगी या नहीं. गांव का माहौल मुझे रास आएगा या नहीं? मैं जानती थी कि इस दुविधा का जवाब आपके पास है और मुझे मेरा जवाब मिल गया है..."
दीपा पौधों को पानी देते हुए कुछ गुनगुना रही थी. दिसंबर का महीना था, चारों ओर गुलाब खिले थे. शरद को गुलाब बहुत पसंद थे, वह उनका विशेष ध्यान रखती थी. खिले गुलाब के फूल देखकर शरद को प्रसन्नता होती है और उसे शरद के वह लफ़्ज़ याद आ रहे थे, जब उसे शादी के बाद पहली बार ग़ुस्सा आया तो शरद ने उसे समझाकर कहा, "जब भी आदमी को ग़ुस्सा आए, तो उसे फूलों के बीच जाना चाहिए. फूलों को देखकर उसका ग़ुस्सा ठंडा हो जाता है और मन एकदम निर्मल और कोमल हो जाता है." कितनी सही बात कही थी शरद ने. कितनी गहराई है उनकी सोच में. दरवाज़े की बेल की आवाज़ सुनकर दीपा का ध्यान भंग हुआ. उसने जैसे ही दरवाज़ा खोला तो सामने प्रीती को पाया, उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि प्रीती उसकी बुआजी की लड़की इस तरह उसके सामने आ खड़ी होगी.
"क्यों दीदी, डाल दिया न चक्कर में." खिलखिलाकर हंसते हुए प्रीती ने कहा.
"कितने दिनों बाद तुम्हें देख रही हूं, बहुत बदल गई हो." प्रीती को गले लगाते हुए दीपा ने कहा.
"तुम भी तो बहुत बदल गई हो दीदी, साड़ी में और भी ज़्यादा सुंदर लग रही हो. अरे हां, जीजाजी कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं, तुम्हारी शादी में ही उन्हें देखा है. बाद में तो मुलाक़ात हो ही नहीं सकी." इधर-उधर देखते हुए प्रीती ने कहा.
"मां और बाबूजी रामेश्वर जा रहे हैं, वे उन्हें शहर तक छोड़ने गए हैं. आज रात की ट्रेन है. कल शहर के कुछ काम निपटाकर शाम तक लौट आएंगे."
"दीदी रितेश भी नज़र नहीं आ रहा."
"उसे रामू काका बाहर घुमाने ले गए हैं. प्रीती, तुम फ्रेश हो जाओ, तब तक मैं तुम्हारे लिए नाश्ता और चाय लगवाती हूं."
रात खाना खाने के पश्चात् दोनों फिर बातों में खो गई.
"प्रीती, तुमने मुझे यह नहीं बताया कि तुम्हारी डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी हुई या नहीं और अभी कहां प्रैक्टिस कर रही हो?"
"डॉक्टर बने तो मुझे दो साल हो गए है, फ़िलहाल पूना में जॉब कर रही हूं. दीदी, तुमने तो क़ानून की पढ़ाई की है, कम्प्यूटर का कोर्स किया है, आधुनिक वातावरण और फैशन में पली हो, तुम्हें इस अंदाज़ में देखकर कोई भी यह नहीं कह सकता कि तुम पहली वाली दीपा हो. ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ आया है दीदी आप में."
एक गहरी सांस लेते हुए दीपा कहने लगी, "यह एक लंबी कहानी है. सुनना चाहोगी?"
"हां दीदी." यह कहते हुए तकिया गोद में रखकर उस पर दोनों हाच टिकाकर प्रीती उत्सुकता से दीदी की ओर देखने लगी.
अतीत के क्षण उसकी आंखों में साकार होने लगे, "शरद से मेरी शादी तय हुई थी, उस दिन मैं बहुत ख़ुश थी. शरद मां-पिता का इकलौता बेटा था. पढ़ने में बहुत तेज था. इंजीनियरिंग की पढ़ाई में गोल्ड मेडल हासिल किया था. गांव में उनकी बहुत ज़मीन-जायदाद थी. मैं ख़ुश इसलिए थी कि मेरा सपना पूरा होने वाला था. विजय भैया ने मुझे बताया था कि मैं और शरद अकेले मुम्बई में रहने वाले हैं. सास-ससुर का कोई टेंशन नहीं था. मैं ख़ुद भी सास-ससुर के झमेले से दूर रहना चाहती थी. सब कुछ मेरे मन के मुताबिक़ हो रहा था. उन दिनों तो मेरे पैर ज़मीन पर नहीं टिक रहे थे. और एक दिन मैं शरद की दुल्हन बनकर इस गांव आई. जानती हो प्रीती, मुझे देखने सारा गांव उमड़ पड़ा था. मेरी सास ने मेरी आरती उतारकर मुझे अंदर लिया था. इतना प्यार मिला था मुझे मां, बाबूजी और शरद का कि पूछो मत. उन्हें बहू के अलावा कुछ सूझता ही नहीं था.
शरद के प्यार में मैं खोई जा रही थी. इस तरह से ख़्याल रखते थे मेरा. देखते देखते शादी को एक महीना गुज़र गया. हर वक़्त मौज-मस्ती और खाने-पीने में ही दिन गुज़र रहे थे. अपनी ज़िम्मेदारी से मैं कोसों दूर थी.
अचानक एक दिन शरद ने मुझसे कहा, "देखो दीपा, मां दिनभर अकेली काम करती है. मैं चाहता हूं कि तुम भी मां के काम में हाथ बंटाओ, ताकि मां को कुछ आराम मिले और आगे तुम्हें ही तो यह सब करना है, क्यों न अभी से शुरू कर दो."
मैंने आश्चर्य से शरद की ओर देखकर पूछा, "आगे यह सब करना है, इसका मतलब क्या है? हम यहां तो रहने वाले हैं नहीं, हम तो मुम्बई रहेंगे, और मैं घर में चौके चूल्हे में अपनी ज़िंदगी बर्बाद नहीं करना चाहती हूं."
शरद की आंखों में आश्चर्य के भाव उमड़ रहे थे. उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर समझाने के अंदाज़ में कहा, "देखो दीपा, मैं अपने माता-पिता का इकलौता बेटा हूं, उनसे अलग रहने की बात मैं कभी सोच ही नहीं सकता. मुम्बई जाकर रहने की मैं सपने में भी नहीं सोच सकता हूं. यहीं रहूंगा, खेती में तरक़्क़ी करूंगा और फैक्टरी लगाऊंगा, ताकि यहां के लोग भी अपना जीवन स्तर सुधार सकें."
शरद की बातों ने मुझे हैरानी में डाल दिया था. उनके हाथों से मैने अपना हाथ खींचते हुए पूछा, "पर विजय भैया ने तो कहा था कि आप मुम्बई में रहेंगे और मैंने तो शादी इसी शर्त पर की थी. देखो शरद, मैं यहां रहकर अपनी ज़िंदगी यूं ही गवां नहीं सकती. मुझे अपनी ज़िंदगी में कुछ करना है. यहां इस गांव में मैं अपना भविष्य नष्ट नहीं कर सकती. कुछ तो सोचो शरद यहां रहकर तुम क्या तरक़्क़ी कर सकते हो. यहां गांव में रहना था, तो किसी गंवार लड़की से शादी करनी थी. तुम अपने साथ मेरा भी फ्यूचर ख़त्म कर रहे हो. मुम्बई में तुम और मैं दोनों कुछ भी कर सकते हैं और शानदार ज़िंदगी जी सकते हैं."
शरद ने एक नज़र चारों ओर डाली और तेज स्वर में कहा, "देखो दीपा, शानदार ज़िंदगी में मां-बाबूजी के बगैर, अपने गांव के बिना नहीं जी सकता. मेरा भविष्य, मेरा वर्तमान सब कुछ यहीं है और एक बात समझ लो, फिर मुझे शहर चलने के लिए नहीं कहना. तुम्हें यहां मेरे साथ इसी गांव में रहना है."
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शरद के इस रूप ने मुझे आश्चर्य में डाल दिया. मेरा देखा हुआ ख़्वाब पल भर में चकनाचूर हो गया था. शरद ने मुझे प्यार से समझाने की बहुत कोशिश की, पर मेरी ज़िद के आगे उनकी एक न चली. मां-बाबूजी इस बात से बेख़बर थे कि मैं रूठकर मुम्बई जा रही हूं. और दूसरे दिन मैं ग़ुस्से में मुम्बई चली आई. मैंने कितना ग़लत कदम उठाया. यह मैं उस दिन नहीं जान पाई, पर धीरे-धीरे मुझे उसका एहसास होने लगा.
मेरे फ़ैसले से पिताजी कतई ख़ुश नहीं थे. भैया और भाभी अपने आपमें ख़ुश थे. भाभी का व्यवहार पहले जैसा नहीं था. बात-बात पर मुझे ताने सुनने पड़ते थे. समय काटने के लिए और अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए मैंने सर्विस ज्वाइन कर ली. पर कहते हैं ना पहले प्यार कि छुअन बहुत गहरी होती है. शरद को भूल पाना संभव नहीं हो रहा था, जितना उसे भूलने की कोशिश करती, वह उतना ही ज़्यादा याद आता था. शरद का बेपनाह प्यार याद आते ही मन विचलित हो जाता था. रात को नींद कोसों दूर रहती थी. शरद व मां-बाबूजी के चित्र आंखों के सामने घूमते रहते थे.
कहते हैं, वक़्त घावों को भर देता है, पर मेरे साथ उल्टा हो रहा था. मेरा घाव और गहरा हो रहा था. न कोई हमदर्द था, न कोई साथी, जिससे दो बातें करके मैं अपना ग़म हल्का कर सकूं. कई बार मन में आया कि शरद के पास लौट जाऊं, पर मेरा अहंकार, मेरा घमंड, अपने आप पर ज़रूरत से ज़्यादा आत्मविश्वास मेरे आड़े आ रहा था. हर वक़्त मैं ख़ामोश, अपने आप में खोई रहने लगी थी. मुझे मेरा ज़ल्दबाज़ी में किया हुआ फ़ैसला चुभने लगा था. कभी-कभी अपने आप से नफ़रत होने लगती थी.
और एक दिन जैसे ही ड्यूटी से घर लौटी तो सामने रामू काका को पाया. उन्हें देखकर मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा. हाथ का पर्स वहीं फेंक कर उनसे ढेरों सवाल पूछने लगी, "मां बाबूजी कैसे हैं? क्या वो मुझे याद करते हैं? शरद कैसे हैं? आपके साथ वो क्यों नहीं आए?"
रामू काका मुझे उदास और गहरी ख़ामोशी में डूबे हुए लग रहे थे. बस इतना ही कह पाए, "बेटी, तुम थकी होगी, पहले कुछ खा लो, फिर बात करेंगे."
मैं शरद का समाचार सुनने के लिए इतनी बेताब थी कि दस मिनट में फ्रेश होकर रामू काका का और अपना नाश्ता लेकर ड्रॉइंगरूम में आ गई, नाश्ता करने के पश्चात् रामू काका कहने लगे, "तुम शरद के साथ ज़्यादा ख़ुश थी या अब ज़्यादा ख़ुश हो."
मैं ख़ामोश रही, रामू काका के सवाल का जवाब नहीं दे पाई, पर आंखों में जांसुओं की बूंदें तैर गईं.
रामू काका आगे कहने लगे, "बहू, तुम्हें आए दस महीने हो गए, तुमने शरद की, मां-बाबूजी की कोई ख़बर नहीं ली? क्या कमी रह गई थी उनके प्यार में, जो तुमने उनसे इस तरह मुंह मोड़ लिया. वह तो सारे गांव के देवता हैं दीपा. तुम्हें उनमें ऐसी क्या कमी नज़र आई, जो चंद पल का साथ देकर उन्हें दुखी करके छोड़कर चली आई. शरद, जिसने मां-बाबूजी को आज तक यह नहीं बताया कि तुम क्यों चली आई, पूछने पर यही बताता कि तुम्हारी पढ़ाई अधूरी रह गई है, वही पूरी करने गई हो."
रामू काका ने डबडबाई आंखें गमछे से पोंछी, मेरी ओर देखा. मैं सिर पर हाथ टिकाए बैठी थी. पश्चाताप के भाव चेहरे पर नज़र आ रहे थे. मैं धीरे से रामू काका से पूछा, "शरद मुझे याद करते हैं न?"
"बहू, यही सवाल तुम अपने आपसे करो, क्या तुम शरद को भुला पाई? शरद तो तुम्हें एक पल के लिए भी नहीं भूलता है. बहुत कमज़ोर हो गया है. हर वक़्त चेहरे पर उदासी का परदा ओढ़े रहता है. लाख समझाने और क़सम दिलाने पर उसने मुझे बताया कि तुम क्यों चली आई? गांव की तरक़्क़ी और मां-बाबूजी को सुख देना यही तो उसका सपना है. तुम तो उसका सपना तोड़ना चाहती हो, उसे शहर ले आना चाहती हो. क्या करेगा वह इस बेगाने शहर में, बेगानों के बीच आकर. वह तुम्हारी तरह स्वार्थी नहीं है. तुमने अपने स्वार्थ के लिए अपने पति को तुच्छ समझा, उसके दिल को तोड़ दिया. बहुत ख़ुशी मिली होगी तुम्हें सबकी ख़ुशियों का गला घोंटकर. तुम्हारे सास-ससुर दिनभर दीपा-दीपा करते नहीं थकते. बेटी से भी बढ़कर प्यार दिया उन्होंने तुम्हें. जाओ एक बार जाकर देखो उन्हें, किस तरह इंतज़ार कर रहे हैं वे तुम्हारा." रामू काका की आवाज़ भर गई थी. उन्होंने फिर गमछे से अपने आंसू पोंछे.
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"नहीं रामू काका, नहीं. मैं शरद, मां बाबूजी को पल-पल याद करती हूं. यहां आकर बहुत रोई हूं मैं." और दोनों हाथों में अपना चेहर छिपाकर मैं फफक-फफक कर रो पड़ी.
रामू काका ने हौले से मेरे सिर पर हाथ फिराया, खांसकर अपना गला साफ़ किया और आगे कहने लगे, "मैं तुम्हें समझता हूं बहू, इतने साल जो पढ़ाई की, उसे व्यर्थ गवां देना नहीं चाहती, पर पढ़ाई की ज़रूरत सिर्फ़ शहर में है ऐसा नहीं है, बल्कि शहर से ज़्यादा गांव में ज़रूरत है. गांव के स्कूल में तुम बदलाव ला सकती हो, ताकि बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके. जो महिलाएं अशिक्षित हैं, उन्हें तुम पढ़ा सकती हो. तुमने तो क़ानून पढ़ा है. तुम गांव के लोगों को क़ानून की जानकारी दे सकती हो.
शरद के काम में सहयोग देकर उसका हौसला बनाए रख सकती हो. मैं यह तो नहीं कह सकता कि तुम्हें यह काम करने में ख़ुशी होगी, पर अपनी ख़ुशी का ख़्याल न करते हुए यह सोचो कि तुम अपने त्याग से कितने लोगों को ख़ुशियां दे सकती हो, उनका भविष्य बना सकती हो. और जानती हो बहू, त्याग जीवन को सार्थक बना देता है. कोई भी चीज़ तोड़ना बहुत आसान है, पर जोड़ना बहुत मुश्किल होता है. उसके लिए संघर्ष करना पड़ता है और अगर संघर्ष करने की हिम्मत है तो कामयाबी ज़रूर मिलती है. मैं पढ़ा-लिखा होता, तो शायद तुम्हें ज़्यादा अच्छी तरह समझा पाता. पता नहीं तुम मेरी बात कहां तक समझ पाई हो." और उन्होंने मेरी ओर देखा, मेरी आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे. मुझे यूं रोते देखकर रामू काका ने घबराते हुए पूछा, "कहीं मैं चूक तो नहीं गया हूं बहू."
"ग़लत तो मैं थी रामू काका. इतने दिन इस तरह यूं भटकती रही, रोती रही, अपनों का दर्द समझ न सकी. मां-बाबूजी और शरद के विश्वास को तोड़ा मैंने. काका, आपने मुझे इतनी अच्छी तरह समझाया, काश! आप जल्दी आते." अपने बहते हुए आंसू पोंछते हुए मैंने कहा.
"बेटी, अभी भी देरी नहीं हुई है, वहां के दरवाज़े तुम्हारे लिए हमेशा खुले हैं." थोड़ा मुस्कुराते हुए रामू काका बोले.
"सच कह रहे हो काका... पर शरद, वो मुझे माफ़ कर देंगे न." उदास होते हुए मैंने कहा.
"दीपा, इन हाथों ने शरद को बड़ा किया है. तुम्हें देखकर उन्हें कितनी ख़ुशी होगी, इस बात का अंदाज़ा सिर्फ़ मैं लगा सकता हूं, पर अब जिस मंज़िल की ओर तुम बढ़ना चाहती हो, वहां से मुड़कर तुम्हें फिर से इस ओर देखना नहीं है."
"नहीं काका, एक बार ग़लती कर चुकी हूं, अब फिर से वो ग़लती नहीं करूंगी. शरद का सपना ही अब मेरा सपना है. अब आपके बताए हुए रास्तों पर चलना ही मेरे जीवन का उद्देश्य होगा."
रामू काका ने मेरी आंखों में उभरी एक ऐसी चमक देखी, जो कभी नहीं मिट सकती.
और जब मैंने यह फ़ैसला पापा और भैया को सुनाया तो पापा बहुत ख़ुश हुए और कहने लगे, "आज मैं तुम्हें सही मायनों में विदा कर रहा हूं, ऐसा मुझे लग रहा है." भैया मेरे फ़ैसले से खुश नहीं थे, पर मुझे उनकी ख़ुशी की परवाह नहीं थी और मैं उसी रात रामू काका के साथ निकल पड़ी.
सुबह जब यहां पहुंची तो मन में अजीब सी हलचल थी. शरद से मिलने, उन्हें देखने के लिए मैं बहुत बेताब थी, शरद का मेरे प्रति कैसा व्यवहार रहेगा, यह सोचकर मन बार-बार विचलित हो रहा था. रामू काका एकदम प्रसन्न नज़र आ रहे थे. घर पहुंचने पर मैने देखा कि मेरे आने से मां-बाबूजी की ख़ुशी का ठिकाना न रहा. मैं जैसे ही मां के पैर छूने के लिए झुकी, तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया. अपने गले का हार मेरे गले में डालते हुए कहा, "बहू, इतने दिनों के लिए मैके मत जाया करो, तुम्हारे बिना यह घर सूना-सूना लगता है."
"अब मैं नहीं जाऊंगी मां. हर वक़्त आपके पास रहूंगी." मेरे जवाब से उन्हें बहुत राहत मिली.
कुछ देर पश्चात् मैं जैसे ही शरद से मिलने उनके कमरे की ओर बढ़ी, दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं. शरद मेरी ओर पीठ किए खड़े थे. बहुत ख़फ़ा नजर आ रहे थे. मैं हौले-हौले कदमों से चलकर शरद के चरणों में जा गिरी और फूट-फूट कर रोते हुए कहने लगी, "मुझे माफ़ कर दो, मुझे माफ़ कर दो."
शरद की आंखों से आंसू बह रहे थे. उन्होंने मुझे उठाया और मेरा चेहरा अपने हाथों में लेकर शिकायत भरे अंदाज़ में पूछा, "दीपू, अब मुझे छोड़कर नहीं जाओगी न. नहीं तो तुम्हारा शरद यह ग़म बर्दाश्त नहीं कर पाएगा."

मैंने शरद के मुंह पर अपना हाथ रख दिया और उनके सीने से लगते हुए कहा, "अब मैं कभी नहीं जाऊंगी, आप, मां-बाबूजी, रामू काका और मेरा गांव यही मेरी दुनिया है. आपका सपना ही मेरा सपना है."
दीपा ने एक गहरी सांस छोड़ी. पास रखे ग्लास का पानी पिया और आगे कहने लगी, "प्रीती, रामू काका ने मेरा दामन ख़ुशियों से भर दिया है. मैं उनका यह एहसान ज़िंदगीभर उनकी सेवा करके भी नहीं उतार सकती हूं. उस दिन के पश्चात् उनके कहने के मुताबिक़ मैं अपने आपको बदलने लगी और इसके लिए मुझे बाबूजी, शरद और रामू काका ने पूरा-पूरा सहयोग दिया. और जानती हो, मुझे इसके बदले में क्या मिला मां-बाबूजी, शरद और रामू काका का ढेर सारा प्यार, सारे गांव की बहू बन चुकी हूं. क्या यह प्यार मैं मुम्बई में पा सकती थी?
शरद के अनमोल प्यार ने मुझे यह नई दिशा दी है, नया जीवन दिया है, जीने का सही रास्ता दिखाया है. उनके प्यार में, उनके व्यवहार में ऐसा जादू है कि सारा गांव उनका सम्मान करता है. उनके फ़ैसलों से यहां के लोग संतुष्ट हैं. प्रीती मैं यहां बहुत ख़ुश हूं, ऐसा लगता है कि मैं दुनिया की सबसे ख़ुशनसीब महिला हूं."
दीपा ने प्रीती की ओर देखा, वह नज़रें झुकाए किसी गहरे सोच में डूबी नज़र आ रही थी. उसने प्रीती को हल्के से छूते हुए पूछा, "क्या बात है, किसी गहरे सोच में डूबी नज़र आ रही हो? कहीं तुम यह तो नहीं सोच रही हो कि मैंने गांव में रहने का जो फ़ैसला किया है, वह उचित नहीं है, पर मेरे इरादे इतने बुलंद हैं कि मंज़िल की ओर बढ़नेवाले कदम अब डगमगा नहीं सकते."
"नहीं दीदी, बात यह नहीं है, बल्कि तुम्हारी बातों से मुझे मेरे हर सवाल का जवाब मिल गया है. मेरी उलझन तुमने सुलझा दी है." ख़ुशी से मुस्कुराते हुए प्रीती बोली.
"कैसा जवाब प्रीती, मैं कुछ समझी नहीं?" आश्चर्य से प्रीती की ओर देखते हुए दीपा ने पूछा.
"बात यह है दीदी कि मैं जहां प्रैक्टिस करती हूं, वहां मेरी मुलाक़ात डॉ. समीर से हुई. धीरे-धीरे हम एक-दूजे को चाहने लगे. पर समीर अपना क्लीनिक अपने गांव संग्रामपुर में खोलना चाहता है. ऐसा नहीं है कि उसके फ़ैसले से मैं संतुष्ट नहीं हूं, पर मैं बचपन से मुम्बई में रही और यही सोचती रही कि गांव में रह पाऊंगी या नहीं. गांव का माहौल मुझे रास आएगा या नहीं? मैं जानती थी कि इस दुविधा का जवाब आपके पास है और मुझे मेरा जवाब मिल गया है. अब मैं समीर के साथ गांव में क्लीनिक खोलने के लिए पूरी तरह सहमत हूं. सच दीदी, आपने मुझे मझधार से उबार लिया है, मैं आपकी बहुत एहसानमंद हूं." ख़ुशी से झूमते हुए प्रीती ने कहा.
"एहसान मेरा नहीं, रामू काका और शरद का मानो, उन्होंने ही मुझे यह नई दिशा दी है और मेरा जीवन ख़ुशियों से भर दिया."
"हां दीदी, एहसान तो उन्हीं का मानना चाहिए, जिन्होंने हमारे मन में नया विश्वास जगाया है. शादी में रामू काका को ज़रूर लेकर आना, मैं समीर से उन्हें मिलवाना चाहूंगी."
"क्यों नहीं प्रीती."
और दोनों जीवन को नई डोर में बांधने का प्रयास करने लगी.
- सौ. अनिता राठी

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