उस दिन अमावस की काली रात थी. घनघोर वर्षा के आगमन की सूचना देती हुई बिजली ज़ोरों से कड़क रही थी. मैं अपनी किताब पढ़ रहा था. मुझे पुनः एक दरवाज़े पर दस्तक सुनाई दी. मैं सहम गया. दस्तक की आवाज़ थोड़ी तेज़ हो गई थी. मैंने साहस जुटा कर दरवाज़ा खोला. दरवाज़ा खोलते ही मेरा शरीर सिर से पांव तक कंपकंपाने लगा. शब्द कंठ में चिपक गए. सामने वही श्वेत कपड़ों वाली रहसमयी स्त्री खड़ी थी, जो मुझे रोज़ दिन-रात दिखती थी.
पूरा हॉल तालियों से गूंज रहा था. सभी मुझे मेरे उपन्यास 'खेल' के लिए पुरुस्कार मिलने की बधाइयां दे रहे थे. सामने बैठी नैना भी ख़ुशी से झूम रही थी. मुझको पुरुस्कार मिलते देखना उसका सपना था. बधाइयों का तांता लग गया था. पत्रकार मेरा इंटरव्यू लेने लगे. मुझे व्यस्त देख नैना मुझसे शाम को मिलने का वादा करके चली गई. पत्रकारों से निपट जैसे ही मैं गाड़ी में बैठा, मां का फोन आया.
“हेलो नलिन बेटा, नैना का एक्सीडेंट हो गया और वो हम सबको छोड़ कर चली गई.” मां के कहे शब्दों को सुन मैं जड़वत् हो गया. मन-मस्तिष्क दोनों शून्य हो गए. आंखों के सामने अंधेरा छा गया. अथाह प्रेम करता था मैं नैना से. उसका मेरे जीवन से अकस्मात् यूं चले जाना... मैं स्वीकार नहीं कर पा रहा था.
नैना ही तो मेरा जीवन थी. उसके बिना मेरा जीवन तो मरुभूमि के समान था. वो हर पल मेरे ज़ेहन मे रहती थी. मैं बदहवास सा रहने लगा था. मुझे दिन-रात कभी उसकी खिलखिलाती हंसी, कभी उसकी आवाज़, कभी उसकी चूड़ियां-पायल की छम छम सुनाई देती तो कभी साक्षात वही दिखाई देती.
पता नही मुझे क्या हो रहा था. मैं समझ नही पा रहा था कि ये स्वप्न है, भ्रम है या फिर नैना की आत्मा... दिन ऐसे ही बीत रहे थे. एक दिन
“ नलिन... नलिन..." की पुकार से मैं अचानक नींद से उठा. सामने श्वेत वस्त्रों में नैना की आत्मा को देख मैं सिर से पांव तक कांप उठा. माथे पर घबराहट बूंद-बूंद बन कनपटी से नीचे गिर रही थीं. मैं पागलों सा, “नैना... नैना..." चिल्लाता हुआ मूर्छित हो कर वहीं गिर गया.
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जब होश आया तो अपने आपको पलंग पर पाया. सिरहाने मां बैठी अत्यंत स्नेह और दुलार से मेरे बालों में हाथ फेर रही थीं.
“नलिन... तुम ठीक हो बेटा."
“हूं..." मैं मौन शून्य में ताक रहा था. कानों में बस नैना के पुकारने की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं.
"बेटा, तुम कुछ दिनों के लिए नैनीताल चले
जाओ. हवा-पानी बदलेगा तो तुम बेहतर महसूस करोगे.”
“पर मां… मेरा कहीं भी जाने का मन नही हैं...”
“बेटा ऐसा कब तक चलेगा... नैना को गए हुए दो महीने हो गए… देखो क्या हाल बना कर रखा है तुमने अपना. जब से नैना गई है, तुमने अपने आपको एक ही कमरे में क़ैद करके रखा है. ना खाने की सुध और ना सोने की सुध. जब देखो उसकी परछाइयों के पीछे पागलों की तरह फिरते रहते हो. ये तुम्हारे लिए ठीक नही है बेटा. मैं तुम्हारी मां हूं. सौतेली ही सही किंतु मैंने तुम्हें सगे बेटे से भी ज़्यादा माना है, स्नेह दिया है. आज अगर तुम्हारे पापा होते तो शायद तुम उनकी बात मान लेते.”
“कैसी बात कर रही हैं आप मां… मेरे लिये तो आप सर्वोपर हैं. मैं तो सिर्फ़ दस साल का था जब मेरी मां मुझे छोड़ कर चली गईं. अगर आप ना होती तो मेरा क्या होता मां… पर मैं क्या करूं मां नैना की स्मृतियां परछाई की तरह हर पल मेरे साथ रहती हैं. उसकी आत्मा मुझसे मिलने को व्याकुल है.” कह कर मैं रोने लगा.
“मां मैं नैना से बहुत प्रेम करता था. क्यों छोड़ गई वो मुझे. मैं उसके बिना जीने की तो कल्पना भी नही कर सकता. मां उसकी आत्मा मुझे हर जगह दिखती है. घर में, कमरे में, बाहर…”
“अपने आप को सम्भालो बेटा. वह तुम पर, तुम्हारे दिलो दिमाग़ पर हावी हो रही है इसलिए आत्मा के रूप में तुम्हें हर जगह दिखती है. ये आत्मा सिर्फ़ तुम्हारा भ्रम है.सत्य तो यही है कि उसे गए दो महीने हो चुके बेटा. होनी को कोई नहीं टाल सकता. तुम्हारा ये भ्रम तुम्हारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल रहा है. और अभी तो तुम्हारे सामने पूरा जीवन शेष है, इसलिए तुम नैनीताल जाओ. मैंने वहां कॉटेज में बंसी से कह कर सारी व्यवस्था करवा दी है. तुम्हारा रहना, खाना-पीना सब कुछ, तुम्हें किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी…थोड़ा हवा -पानी बदलेगा तो तन और मन दोनों अच्छा होगा.”
“पर मां...”
“पर-वर कुछ नहीं. कल सुबह तुम निकल जाना. यहां की तरफ़ से तुम निश्चिंत रहना, मैं सब सम्भाल लूंगी."
“ठीक है मां...“ अत्यंत भारी मन से मैंने कहा.
सुबह बादलों ने पूरे आकाश को अपने आग़ोश में ले रखा था. सर्र-सर्र करती ठंडी हवा और रिमझिम बारिश ने मौसम को अत्यंत सुहावना बना दिया था. पर ये ख़ूबसूरत मौसम नैना की यादें भी अपने साथ ले आया था. मैंने आंखें मूंद लीं और नैना के साथ अतीत के गलियारों में विचरण करने लगा.
गांव के पुश्तैनी हवेली के सौदे के सिलसिले में मैं गांव गया था. सोंधी मिट्टी की ख़ुशबू, आम से भरे वृक्ष, कलरव करती नदी, हरे-भरे खेतों ने मेरा स्वागत किया. शहर के तनाव भरे कोलाहल से दूर बेहद सुकून था इस शांति में. आम और अमरूद के घने वृक्षों ने डाक बंगले को चारों ओर से घेरा हुआ था.
एक दिन मैं बालकनी में बैठा चाय पी रहा था कि मेरी नज़र सामने आम के पेड़ के नीचे बच्चों को पढ़ाती एक ख़ूबसूरत लड़की पर पड़ी. गोरा रंग, कजरारी आंखें, लम्बे-घने केश, कंचन सी काया... कुल मिलाकर अत्यंत ख़ूबसूरत. पता नहीं क्या चुंबकीय आकर्षण था उसमें, मैं तो उसके सम्मोहन के मोहपाश में बंध गया.
“रामू काका वो लड़की कौन है?" मैंने डाक बंगले के सेवक रामू काका से पूछा.
“वो.. वो हमारे गांव के मास्टरजी की बिटिया नैना है. अभी कुछ ही दिन पहले शहर से पढ़ कर आई है और अब यहां के बच्चों को पढ़ाती है. बहुत ही नेक लड़की है बाबू, पर..." कह कर रामू काका चुप हो गए.
“पर.. पर क्या काका?" मैंने कौतूहलवश पूछा.
“बहुत अभागी है बेचारी. छोटी सी थी मां छोड़ कर चली गई. सौतेली मां ने इसका जीवन नर्क बनाया हुआ है. अत्यंत क्रूर, निर्दयी और लालची स्त्री है. बेचारी बिटिया बहुत सहती है. पिता इसी ग़म में खटिया पकड़ लिए है. सौतेली मां आख़िर सौतेली होती है. हम गांव वाले बहुत स्नेह रखते हैं उससे.”
“नहीं काका, सभी सौतेली मां एक जैसी नहीं
होतीं." मां को याद कर मैंने कहा.
“सब भाग्य का खेल है बाबू.” कह कर वो आहें भरते हुए चले गए.
अब तो नैना से मिलने का लोभ मुझे अक्सर गांव खींच ले जाता था. धीरे-धीरे नैना के साथ जान-पहचान हुई और फिर जान-पहचान ने कब प्रेम का रूप ले लिया पता ही नहीं चला.
हम अपने सुनहरे भविष्य के सपने संजोने लगे. पर वो कहती कि उसकी सौतेली मां उनका मिलन नही होने देगी. मां सिर्फ़ रुपए-पैसे की लालची है. वे उसका विवाह ऐसे घर में करेगी जहां उन्हें रुपए-पैसे अच्छे मिलेंगे. मैं हमेशा उसे हमारे विवाह हो जाने के लिए आश्वस्त करता रहता.
“नैना, अगले हफ़्ते मेरे उपन्यास 'खेल' को पुरस्कार मिलना है. तुम ज़रूर आना."
“मैं ज़रूर आऊंगी नलिन."
तभी ज़ोर से ब्रेक लगने पर मैं अतीत की गलियारों से वर्तमान में आ गया.
“क्या हुआ ड्राइवर?”
“साहब.. सड़क पर अचानक एक लड़की आ गई थी." ड्राइवर बोला.
उस लड़की को देख मैं जड़वत् हो गया.
“नैना..?” मैं फटाफट गाड़ी के बाहर निकल कर उसके पास जाने लगा, पर उसकी आत्मा धुंध में ग़ायब हो गई. मैंने इसे अपना भ्रम समझ लिया. ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी.
नैनीताल की धरती पर कदम रखते ही मेरी सारी थकावट दूर हो गई. ये प्रकृति भी कितनी ख़ूबसूरत है. चारों तरफ़ चीड़ और देवदार के घने वृक्षों से घिरी नैनीताल की वादियां, शांत, ठहरी हुई ख़ामोश नैनी झील, ये मख़मली ठंड और आसमां को अपने आंचल में समेटती ये धुँंध मुझे सुकून दे रहे थे.
पर साथ ही नैना की याद भी गहरी कर रहे थे. बंसी काका ने कॉटेज में मेरे आराम की पूर्ण व्यवस्था कर रखी थी. बालकनी में बैठ कर ढलते सूरज को नैनी झील में समाते हुए देखना, अविस्मरणीय पल था. मैं इस मनोरम दृश्य को अपलक निहार रहा था कि अचानक बंसी काका ने आवाज़ लगाई, “नलिन बेटा.. थोड़ी देर मॉल रोड घूम आओ. इस समय मॉल रोड पर ख़ूब चहल-पहल है. तुम्हें अच्छा लगेगा. रात के समय नैनीताल की ख़ूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं."
“ठीक है बंसी काका." कहकर मैंने मॉल रोड की ओर रुख़ किया. ठंड अपने पूरे शबाब पर थी. मैंने अपने आप को पूरा गर्म कपड़ों में समेट लिया. बंसी काका ने सही कहा था. रात के समय नैनीताल अत्यंत ख़ूबसूरत लग रहा था. पहाड़ों पर बने घरों में जलती लाइटें ऐसी लग रही थीं जैसे आसमां से तारें उतर कर पहाड़ों पर टिमटिमा रहे हों. मॉल रोड पर ख़ूब चहल-पहल थी. तभी मैंने इसी चहल-पहल में नैना को देखा. उसे देख कर मैं हड़बड़ाया हुआ उसके पीछे भागा. वो फिर कहीं ग़ायब हो गई. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह भ्रम है या फिर उसकी आत्मा.
अपने आप को सम्भालते हुए मैं वहीं बेंच पर बैठ गया. अब तो नैना मुझे अक्सर दिखने लगी. कभी रात के अंधेरे में कॉटेज के बाहर, कभी साया बन कर खिड़की के पास, कभी पेड़ों के झुरमुट में, कभी आती-जाती पगडंडियों और कभी मॉल रोड पर... मैं जैसे ही उसे ढूंढ़ने जाता वो ग़ायब हो जाती. ये सब देख कर दिन-ब-दिन मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ रहा था. मैं अवसाद की गुमनाम गहराइयों में जा रहा था. मुझे कुछ समझ नही आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है. मेरा जीवन धीरे-धीरे पहाड़ों की सफ़ेद धुंध में खो रहा था. इस गहरे रहस्य ने मेरे सोचने-समझने की शक्ति छीन ली थी. बावरा होने लगा था मैं. मेरी ऐसी हालत देख कर बंसी काका ने मां को बुला लिया.
“मां मुझे नैना की आत्मा दिखती है...” मां को देखते ही मैं उनसे लिपट गया.
“नलिन बेटा, अभी तक तुम इसी में उलझे हो. तुम्हारे इस पागलपन ने तुम्हारा क्या हाल बना दिया. नैना अब हमारे बीच नही है. वो जा चुकी है हम सब को छोड़ कर और ये आत्मा-वात्मा कुछ नही होती." मां झुंझलाते हुए बोली.
“नहीं मां.. नहीं, मेरा विश्वास कीजिए.. नैना...”
“बस नलिन… कब तक इसी भ्रम में जीते रहोगे. देखो क्या हाल बना कर रखा है तुमने अपना. बावरे से लगने लगे हो. ये तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए ठीक नही है बेटा. नैना को गए दो माह हो गए. तुम्हें इस सत्य को स्वीकारना होगा.” मां मुझे प्यार से सहलाते हुए बोलीं.
“चलो अब कमरे में जाओ और आराम से सो
जाओ. रात भी काफ़ी हो गई है. और हां अपनी दवाई लेना मत भूलना ” मुझे मेरे कमरे तक छोड़ कर मां अपने कमरे में चली गईं.
सर्दियों का मौसम, बाहर कड़कड़ाती ठंड के साथ धुंध भी गहराने लगी थी. कंबल की गर्माहट से मैं नींद के आग़ोश में चला गया. आधी रात को दरवाज़े पर किसी की दस्तक की आवाज़ से मेरी नींद खुली. मैंने दरवाज़ा खोला.
“नलिन.. नलिन..आओ मेरे पास.” किसी स्त्री की पुकार से मैं सिहर गया. अंधेरे और धुंध के कारण सब कुछ धुंधला-धुंधला था. मैं हिम्मत करके मोबाइल की रोशनी में पग-पग आगे बढ़ने लगा. तभी अचानक सामने देख कर मेरे हाथ से फोन छूट गया. सफ़ेद लिबास में लिपटी नैना की आत्मा थी जो रहस्यमयी आवाज़ में मुझे पुकारती चली जा रही थी. मैं “नैना... नैना...” चिल्लाता हुआ, सम्मोहित सा यंत्रवत् उसके पीछे-पीछे चलने लगा. वो आगे-आगे और मैं अंधेरे धुंध में उसके पीछे-पीछे... बस चले जा रहा था. कुछ दूर चलते ही वो अचानक गहरी धुंधलके में खो गई.
मैं विक्षिप्त सा नैना.. नैना…” चिल्लाने लगा.
मेरा शोर सुन कर मां और बंसी काका भी आ गए. मुझे बदहवास अवस्था में वहां बैठा देख कर वे डर गए.
“नलिन... नलिन, उठो बेटा.. क्या हुआ?”
“मां.. मां वो नैना…”
“फिर वही राग… ये क्या पागलों जैसी दशा बना रखी है तुमने. यहां कोई नही है बेटा ये सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारा भ्रम है. कब समझोगे तुम." मां मुझे झकझोर कर रोने लगी.
जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे. पल-पल मेरे दिलो-दिमाग़ पर नैना और उसकी यादें पागलों की तरह हावी होने लगी. कभी मुझे विचित्र-विचित्र आवाज़ें सुनाई देतीं, कभी किसी के गाना गाने की, कभी पायलों की झम-झम तो कभी चूड़ियों की खन-खन. दिन-ब -दिन मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ रहा था. तन्हाइयों से मेरी मित्रता और गहरी हो रही थी.
उस दिन अमावस की काली रात थी. घनघोर वर्षा के आगमन की सूचना देती हुई बिजली जोरों से कड़क रही थी. मैं अपनी किताब पढ़ रहा था. मुझे पुनः दरवाज़े पर दस्तक सुनाई दी. मैं सहम गया. दस्तक की आवाज़ थोड़ी तेज़ हो गई थी. मैंने साहस जुटा कर दरवाज़ा खोला. दरवाज़ा खोलते ही मेरा शरीर सिर से पांव तक कंपकंपाने लगा. सामने वही श्वेत वस्त्रों वाली रहस्यमयी स्त्री खड़ी थी, जो मुझे रोज़ दिन-रात दिखती थी. वो नैना थी या फिर उसकी आत्मा पता नहीं. वो घबराई हुई सी इधर-उधर देखती हुई बोली, “नलिन मुझे तुमसे कुछ बात करनी है."
“नैना...” मेरे मुख से बमुश्किल बस यही निकला.
“मुझे तुम्हें कुछ बताना है नलिन.” इससे पहले वो कुछ और कह पाती किसी की आहट सुन कर वो ग़ायब हो गई.
मैं कुछ कह नही पाया, बस निष्प्राण सा अपलक उसे जाते हुए देखता रहा.
“नलिन क्या हुआ बेटा. मैं तुम्हारे लिए अत्यंत चिंतित थी इसलिए तुम्हें देखने चली आई.“
“अरे तुम इतना पसीना-पसीना क्यों हो रहे हो. तुम्हारी तबियत तो ठीक है ना?”
“हा मां मैं ठीक हूं. आप आराम से सो
जाइए." मैंने मां को तसल्ली दी.
मैंने मां को इस संक्षिप्त भेंट के विषय में कुछ नही बताया, किंतु इस बार मेरे मन में कुछ खटक सा रहा था. मैं अभिमन्यु की तरह इस चक्रव्यूह में फंसता जा रहा था. ये रहस्य तो और उलझता जा रहा था.
आख़िर कौन थी वो. और वो मुझे क्या बताना चाह रही थी. ऐसा क्या राज़ है. कुछ समझ नही आ रहा... प्रश्नों के द्वंद्व में उलझा मैं कब सो गया पता ही नही चला.
सुबह उठा तो सिर बहुत भारी था. बंसी काका ने बताया कि मां मंदिर में पूजा करने गई हुई थीं. वे मुझे चाय देकर सब्ज़ी लेने चले गए. मैं बाहर बैठ कर चाय पीने लगा कि तभी मुझे पायलों की झन-झन सुनाई दी. मैंने डरते-डरते देखा. सामने नैना की आत्मा थी.
“नलिन मैं नैना हूं.” उसे देख मैं स्तब्ध, निःशब्द, किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा था.
“नैना.. तुम...”
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“नलिन… इस समय मैं तुम्हारे किसी भी प्रश्न का उत्तर नही दे सकती. मेरे पास वक़्त बहुत कम है. मैं तुम्हें कुछ बताना चाहती हूं. मैं रात को ताल के पीछे वाले रास्ते पर तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी. वहीं मिल कर मैं तुम्हें सब बताऊंगी. हां, बस एक विनती है कि हमारी इस मुलाक़ात के विषय में किसी से भी ज़िक्र मत करना.” एक ही सांस में वो ये सब कहकर ग़ायब हो गई.
मैं कशमकश में था. ये रहस्य अब और गहरा गया था. पूरा दिन इस रहस्य की उलझन में जैसे-तैसे गुज़रा. अपने भीतर साहस समेट कर मैं रात को डरे कदमों के साथ ताल के पीछे वाले रास्ते पर पहुंच गया. रास्ता एकदम अंधेरे में डूबा और सुनसान था. गहरा सन्नाटा पसरा था वहां. हवाओं की सरसराहटों और चर्च के घंटे की आवाज़ मुझे और भी भयभीत कर रही थीं. रोशनी के नाम पर वहां बने चर्च की मध्यम सी रोशनी थी और उस रोशनी में नैना खड़ी थी. उसे देख मैं जड़-चेतन हो गया.
“डरो मत नलिन. मैं जीवित हूं.”
“तुम जीवित हो नैना या फिर मेरा भ्रम है.”
“ये तुम्हारा भ्रम नही है नलिन. मेरी कोई मृत्यु नही हुई है और मैं जीवित हूं.” वो बोली.
“फिर.. ये सब…”
“ये सब एक षडयंत्र भरा खेल था नलिन.”
“खेल? कैसा खेल नैना और तुमने ये खेल क्यों खेला...”
“मैंने स्वेच्छा से नही खेला नलिन. मुझे विवश किया गया था. मैं तो सिर्फ़ एक कठपुतली हूं, जिसकी डोर किसी और के हाथ में है... पर अब बहुत हो गया, अब मुझसे तुम्हारी ये दशा देखी नही जाती नलिन.” कहकर वो रोने लगी.
मैं डरते-डरते उसके पास गया और उसे कंपकंपाते हुए छुआ.
“ नैना..” बस उसे छू कर इतना ही कह पाया.
भावनाओं का समवेग मेरी आंखों से बहने लगा.
“हां नलिन मैं नैना.. तुम्हारी नैना... गहरी विवशता के कारण मुझे ये खेल खेलना पड़ा. मैं तुम्हारी अपराधी हूं. मुझे क्षमा कर दो.”
“ये कैसा खेल है नैना.”
“मैं सब बताती हूं नलिन. बहुत दिनों से मैं तुमसे बात करने की और इस घिनौने खेल का सच बताने का प्रयास कर रही हूं, पर मौक़ा नही मिल रहा था. तुम्हें यूं तिल-तिल घुटते हुए मैं और नही देख सकती. बहुत कठिनाइयों से मैंने तुम्हें यहां मिलने बुलाया है.” वो घबराई हुई बोली. “कैसा सच नैना. मैं पागल हो जाऊंगा."
“तुम अपना हृदय थाम लेना, क्योंकि जिस खेल का सच मैं तुम्हें बताऊंगी. तुम सहन नही कर पाओगे." कह कर वो परत दर परत सारा रहस्य खोल रही थी और मैं शब्द-ब -शब्द किर्चे-किर्चे हो रहा था. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी ने गर्म शीशा मेरे कानों में घोल दिया हो. विश्वासघात, छल, कपट और लालच का इतना बड़ा खेल… मेरे लिए ये अविश्वसनीय ही नही अपितु अकल्पनीय था. मुझे विश्वास नही हो रहा था, पर वो पूरे साक्ष्य के साथ सच पर से पर्दा उठा रही थी. सत्य कड़वा होता है सुना था, पर सत्य प्राण घातक भी होता है, वो आज पता चल रहा था. मैं विक्षिप्त, निस्तेज, शब्द हीन वहीं बैठ गया.
कॉटेज पहुंच कर नैना को मेरे साथ देख मां सब समझ गईं, पर मौन रहीं.
“मां इस निर्जीव संपत्ति के लिए इतना बड़ा खेल… वो तो मैं वैसे ही आपको दे देता. उसके लिए मुझे मानसिक रोगी बना दिया, नैना की मां को पैसों का लालच दिया, उसके पिता की बीमारी को मोहरा बना कर उससे उसकी मृत्यु का झूठा नाटक करने को विवश कर दिया. मां आप भी नैना की मां की तरह सौतेली बन गई... और...” शब्द कंठ में अटक गए.
भावनाओं का समवेग मेरी आंखों से अविरल बह रहा था और मां... वे एक निर्भाव, स्वार्थ की मूरत बन कर खड़ी रही.

कीर्ति जैन
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