
पूर्ति खरे
“ऐसा कौन सी किताब में लिखा है कि बच्चों के रोमांस के दिन शुरू हो जाएं तो पैरेंट्स को रोमांस करना छोड़ देना चाहिए.”“किसी किताब में नहीं, यह तो सोचने वाली बात है. हर चीज़ की अपनी एक उम्र होती है.” “अगर ऐसा है तो तुमने मुझसे फेरों के वक़्त चुपके से वो आठवां वचन क्यों लिया था?”
हमारे बीच प्रेम कम और दोस्ती ज़्यादा है. मैं ऐसा मानती हूं, पर शरद का कहना है कि दोस्ती का ज़्यादा होना प्रेम का कम होना नहीं होता, बल्कि प्रेम में दोस्ती का ज़्यादा होना प्रेम का और भी सशक्त होना होता है. शायद इसीलिए मैं शरद को कभी ऐ जी! या ओ जी! कहकर नहीं बुलाती. ना ही शरद मुझे कार्तिक की मां या कृतिका की मम्मी ही कहते. वे हमेशा मुझे मेरे आधे नाम यानी अरु... से ही संबोधित करते. वैसे मेरा पूरा नाम अरुणिमा है. मेरा नाम शरद को शुरू से पसंद है. वे कहते हैं कि उन्हें मुझसे पहले मेरा नाम पसंद आया था. इसका कारण ये था कि मुझसे मिलने से पहले वे मेरे नाम से ही मिले थे.
उनके ही घर में जब हम किराएदार बनकर आने वाले थे तब उनका मकान देखने आए मेरे बाबूजी ने शरद के सिर पर हाथ फेरते हुए उनके पिताजी से कहा था, “आपके बच्चे के बराबर ही मेरी बिटिया भी है... अरु.” शरद बताते हैं कि उस रोज़ मेरा नाम सुनते ही ना जाने क्यों वे भीतर तक खिल गए थे.
कोई दोस्त नहीं था इनका. आस-पड़ोस में ख़ूब बच्चे थे, पर शरद का मन किसी से नहीं मिलता था. लेकिन मेरे आने के बाद उन्हें मेरे रूप में एक सच्चा और अच्छा दोस्त मिल गया था. हम जिस दिन शरद के मकान के ऊपर वाले पोर्शन में शिफ्ट हुए, उसी दिन से हम एक-दूजे के मन में भी शिफ्ट हो गए. तब हमारी उम्र स़िर्फ 13 की थी.
हम उज्जैन से बिलासपुर शिफ्ट हुए थे. महाकाल की नगरी में छूटे अपने दोस्तों को मैं याद करके उदास हो जाती. तो शरद मेरे पास आकर मुझे कंपनी देते हुए कहते, “उदास क्यों होती हो अरु! तुम्हारे महाकाल ने तुम्हें यहां मेरी दोस्त बनने के लिए भेजा है. पता है तुम्हें, मैं भी भोलेनाथ का बड़ा भक्त हूं.”
शरद की उन मासूम बातों पर मैं हंस देती. हम एक ही स्कूल में पढ़ते थे. एक ही साथ टयूशन पढ़ने भी जाते थे. मेरे पास लाल साइकिल थी और शरद के पास पीली.
देखते ही देखते हम बहुत अच्छे दोस्त बन गए. हमारी पसंद-नापसंद एक होती गई. जो विषय मैं चुनती, वही शरद चुन लेते और जो शरद चुनते, वही मैं चुन लेती. हमारा रिश्ता साल दर साल गहरा होता गया. पर सालों बाद एक दिन हमें बिलासपुर छोड़कर जाना पड़ा.
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सात साल तक बाबूजी ने बिलासपुर में जॉब की. उसके बाद हम उज्जैन में वापस आ गए. सात साल बाद बिलासपुर से विदाई लेना बहुत दुखद था. पर बाबूजी की नई नौकरी उज्जैन में थी और वहीं हमारे पैतृक घर में दादा-दादी भी अब अकेले नहीं रह सकते थे, इसीलिए बाबूजी बिलासपुर वाली नौकरी छोड़कर उज्जैन आ गए.
शरद और मैं अब दोस्ती से ऊपर उठ चुके थे. अमूमन प्रेमी प्रेम में ख़त लिखते हैं, पर शरद ने हमारे प्यार में पूरी की पूरी एक मोटी डायरी लिखी थी. जाने से पहले भीगी पलकों से वह डायरी शरद मुझे दे गए. डायरी क्या थी वह तो प्रेम में पगी कोई किताब थी. एकदम मखमली ख़्यालों वाली किताब. शरद से बिछड़ने के बाद यह डायरी ही मेरे अकेलेपन का सहारा थी.
हर रोज़ मैं चुपके-चुपके थोड़ा-थोड़ा डायरी का पढ़ लिया करती. डायरी पढ़कर लगता कि शरद से मुलाक़ात हो गई. वह डायरी मेरे लिए मंदिर में रखे किसी पावन ग्रंथ की तरह थी और उसमें लिखी बातें जादुई मंत्रों की तरह थीं. वह किताब यानी डायरी मैं अब भी पढ़ लेती हूं. हमारी शादी के 40 साल बाद भी. बच्चों के डर से वो पहले छिपाकर रखती थी और अब वह यूं ही आज़ादी से मेरे पास रखी रहती. उसे पढ़कर लगता है कि इस दुनिया के हर प्रेमी को ऐसी डायरी लिखनी चाहिए. प्यार को लिखना प्यार के वास्तविक एहसास को दर्ज करना है और प्यार को पढ़ना उस एहसास को फिर से जी लेने जैसा है. किसी भी उम्र में प्रेमी का लिखा एक छोटा सा ख़त भी भीतर तक वही सिहरन पैदा कर देता है, जो पहले प्यार में पहली बार होता है. फिर मेरे पास तो पूरा का पूरा ख़तों का पुलिंदा था.
चार बजे के आसपास कॉफी पीते हुए मैं शरद की वह डायरी पढ़ ही रही थी कि शरद ने किचन से पकौड़े तलते हुए पूछा, “अरु, आज शाम बाहर चलें?”
“नहीं शरद. घर पर ही रहते हैं.”

मेरे जवाब पर शरद बोले, “क्या यार, कितनी अजीब होती जा रही हो तुम! यह हमारी 40वीं एनिवर्सरी यानी रूबी एनिवर्सरी है. कुछ तो ख़ास करो डियर!”
“मेरे लिए कॉफी पीते हुए तुम्हारी डायरी पढ़ना ही सबसे ख़ास है.”
“छोड़ो ये डायरी और चलो कहीं चलें.”
“पर कहां?”
“वहीं जहां कोई आता-जाता नहीं.”
“फिर तो घर ही सबसे बेस्ट है. यहां भी अब कोई आता-जाता नहीं सिवाय मेड और दूध वाले के.” मैंने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा, तो शरद बोले, “ओह प्लीज़ अरु.”
“ओके ओके... अच्छा बताओ कहां चलना है, चौपाटी चलें?”
“उहूं... कहीं और.”
“कहां?”
“एक काम करते हैं. पहले हम मंदिर चलते हैं. उसके बाद हम मूवी देखेंगे, फिर ग्रीन ग्रास होटल में डिनर करेंगे. उसके बाद आइसक्रीम खाते हुए रोमांटिक गानों के साथ एक लॉन्ग ड्राइव लेंगे और फिर घर अगर मीठी-मीठी प्यारी भरी बातें करते हुए एक-दूजे की बांहों में खो जाएंगे.”
“शरद! कुछ तो शर्म करो. ये भी कोई उम्र है इन सब बातों की. रिटायर्ड हो गए हैं हम. अब हमारे बच्चों के रोमांस करने के दिन हैं, हमारे नहीं.” “ऐसा कौन सी किताब में लिखा है कि बच्चों के रोमांस के दिन शुरू हो जाएं, तो पैरेंट्स को रोमांस करना छोड़ देना चाहिए.”
“किसी किताब में नहीं, यह तो सोचने वाली बात है. हर चीज़ की अपनी एक उम्र होती है.”
“अगर ऐसा है, तो तुमने मुझसे फेरों के वक़्त चुपके से वो आठवां वचन क्यों लिया था?”
“अरे वो... वो तो ऐसे ही...”
“ऐसे ही कुछ नहीं होता अरु! मैंने वचन दिया था तो मैं निभाऊंगा, ‘तुम्हारे प्रेमी बने रहने वाला वचन’ फिर चाहे 60 का हो जाऊं या 90 का.” शरद की बात पर मैं मुस्कुरा दी. शाम स्याह हो रही थी. मैं फटाफट उठकर तैयार होने लगी, तो शरद ने मेरे बालों में बगीचे से तोड़कर लाया एक गुलाब लगा दिया. मुझे आसमानी साड़ी पहना देखकर शरद ने ख़ुद भी आसमानी शर्ट पहन ली. हमारी लव मैरिज से भी ज़्यादा वाली लव मैरिज थी. शादी के शुरुआती दिनों में हमारा प्यार बेहिसाब था. पर कुछ सालों बाद जब हमारे दोनों बच्चे बड़े होने लगे और हमारे माता-पिता शिथिल, तो हमारी ज़िम्मेदारियां बहुत बढ़ गईं.
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हम दोनों एक ही कॉलेज में लेक्चरर थे. जॉब और घर दोनों संभालते-संभालते अक्सर लगा कि हमारे बीच अब प्यार जैसा कुछ रहा ही नहीं. हम भी क्या करते? जीवन की आपाधापी में रोमांस की कोई जगह ही नहीं थी. कुछ साल जीवन के ऐसे ही बीते.
बच्चे और बड़े हुए तो बाहर चले गए. उनका जॉब लगा और वे भी कुछ दिनों में दूसरे शहरों में शादी करके सेटल हो गए. हमारे माता-पिता भी एक समय बाद एक सुखी संसार देखकर दुनिया को विदा कह गए. यूं ही हर दांपत्य की तरह हमने भी ज़िम्मेदारियों से भरी एक लंबी व्यस्त ज़िंदगी जी ली.
इस दौरान ना हम एक-दूजे से आई लव यू... आई लव यू... कहते थे, ना बांहों में बांहें डालकर झूलते थे. हम सबके साथ ऐसा ही तो होता है. ऐसे में क्या लव और क्या अरेंज मैरिज? एक वक़्त के बाद हर शादी स़िर्फ एक बंधन बनकर रह जाती है, पर उस व्यस्तता का भी अपना ही आनंद होता है. घर और जॉब वाली दोहरी ज़िंदगी जीते पति-पत्नी... बच्चों और बूढ़े माता-पिता को संभालते पति-पत्नी... सुबह-शाम छोटी-छोटी बहस पर लड़ते-झगड़ते और दौड़ते-भागते पति-पत्नी... हम वो दौर जी चुके थे और अब हमारे पास वो सब कुछ करने का समय था, जो ना चाहते हुए भी कहीं खो गया था. वही जो हर पति-पत्नी के मन में दबा होता है. जी हां बिल्कुल सही सोचा आपने. मैं प्यार की ही बात कर रही हूं. प्यार तो मुझमें भी ख़ूब था, पर मेरे भीतर उम्र का एक संकोच आ गया था. शरद उम्र का यही संकोच तोड़ना चाहते थे. जो सही भी था.
हमने तैयार होकर सबसे पहले मंदिर में दर्शन किए. उसके बाद हमने मूवी देखी, लज़ीज़ सा डिनर करने के बाद हम कार में आइसक्रीम लिए लॉन्ग ड्राइव पर निकल लिए.
तू अगर मेरी ये हवाएं मेरी... अरिजीत सिंह की आवाज़ वाला यह ट्रेंडी गाना शरद ने प्ले कर दिया. “कितना प्यारा गाना है ये, पहली बार सुन रही हूं मैं!”

मेरी बात पर शरद बोले, “अभी आया है, नया. सुना करो अरु. हमेशा वही पुरानी प्ले लिस्ट चलाती रहती हो. नया सुनना, नया करना और नया सोचना ही इंसान को नया बनाए रखता है.” “सही कह रहे हो आप. आज बाहर निकलकर भी कितना नया सा लगा ना.”
“बिल्कुल, वैसे एक बात बोलूं?”
“हां बोलो, इसमें पूछना क्या.”
”तुम आज लाल साइकिल वाली अरु लग रही हो.”
“अच्छा! और आप पीली साइकिल वाले शरद!” “सुनो एक किस दोगी क्या?”
“हट... कुछ भी.”
"प्लीज़.. एक...” बड़े संकोच से मैंने चुपके से उनके गाल पर एक किस दे दिया, तो पुराना प्यार फिर नया हो गया.
शरद एक नज़र मेरी ओर देखते तो एक नज़र सामने की सड़क की ओर... मैं कुछ शर्माती तो शरद मुझे देखकर प्यार से मुस्कुरा देते. हम लाल-पीली साइकिल चलाते हुए भी ऐसा ही करते थे. यहां कार में एक के बाद एक रोमांटिक गाना प्ले हो रहा था, तभी मैं बोली, “कितने प्यारे-प्यारे नए गाने आ रहे हैं.”
“हम्म! यह गाना भी आजकल ट्रेंड कर रहा है.” “अच्छा! आपको बड़ा पता है आजकल के ट्रेंड का, मैं तो ये सब नहीं जानती.”
“क्यों नहीं जानती, जानना चाहिए, पता नहीं हम भारतीय पैरेंट्स ख़ुद को ट्रेंड से बाहर क्यों रख लेते है, ट्रेंड में रहना बुरा थोड़ी ही है. पता है अरु, आज की नई जनरेशन हमारी तरह नहीं है. वह खुलकर प्यार करती है और खुलकर ग़ुस्सा. माना यह थोड़ा अटपटा है, पर इमोशन को ज़्यादा दबाना भी ठीक नहीं. हमें भी अपने इमोशन को एक्सप्रेस करना आना चाहिए. आज की ज़ेेन जी से हमें यह सीखना चाहिए.” शरद सही कह रहे थे पुराने ज़माने का अच्छापन ही हमारे ज़ेहन में रचा-बसा है. प्यार हो या कुछ और, हम बयां ही नहीं करते. संकोच के कारण हम अपने भीतर की कितनी ही ख़्वाहिशों को मार देते. ‘अब उम्र हो गई...’ कहकर हम अपने सुनहरे दिनों की यूं ही बलि चढ़ा देते हैं.
प्यार करने की कोई उम्र नहीं होती. प्यार को आयु से नहीं नापना चाहिए, प्यार तो मन की आयु से नापा जाना चाहिए. और मन भी कभी बूढ़ा होता है क्या?”
मैं शरद की कही बात सोच ही रही थी कि ख़ूबसूरत प्यार भरे गाने सुनते हुए हम घर आ गए. अभी भी टेबल पर शरद की डायरी रखी थी. प्यार से उस पर हाथ फेरते हुए मैंने एक पन्ना खोला जिस पर लिखा था- “प्रेमिका का पत्नी होना किसी लड़के के लिए एक सपना है तो पत्नी का प्रेमिका होना उसके लिए सबसे प्यारा सपना. मैं ताउम्र तुम्हें अपनी प्रेमिका और ख़ुद को तुम्हारा प्रेमी बनाए रखना चाहता हूं.”
हम प्यार और दांपत्य का आदर्श रूप थे या नहीं, यह तो हमें नहीं मालूम था, पर हम अपने प्यार के रिश्ते में ट्रेंडी ज़रूर थे. औरों के लिए ट्रेंडी होने का क्या मतलब है मुझे नहीं पता, मेरे और शरद के लिए जीवन में प्यार को नया बनाए रखना ही ट्रेंडी होना था.
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मैं डायरी पढ़ते हुए कुछ सोच ही रही थी कि शरद ने मुझे बांहों में भर लिया. उम्र और अवस्था हमारे प्यार में अड़चन नहीं थी. शरद अपना आठवां और सबसे अहम वचन आज भी निभा रहे थे. ‘तुम प्रेमी बने रहना...’ वाला आठवां और अनोखा वचन.

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