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कहानी- महकती रहना चंदना… (Short Story- Mahkati Rahna Chandna…)

मैंने उसी दिन निश्चय कर लिया था कि मैं कभी पुरु के पांवों को जकड़ने का प्रयास नहीं करूंगी. इस प्रतिभावान ऊर्जावान व्यक्ति को बांधने की ज़रूरत ही क्यों पड़ेगी मुझे, जबकि वह ख़ुद मेरे प्रति अपने प्यार के एहसास में बंधा हुआ है. उनके सानिध्य में संस्कारित होते भविष्य के सुनहरेपन का एहसास मुझे चंदना से चंदनगंधा बना देता. मेरा मन और महकने लगता.

पुरु चले गए. कह गए हैं कि चार मास बाद आऊंगा, वह भी विदेश नहीं गए तो. विदेश से उनका आशय दुनिया के कौन-से देश से है, यह भी उन्होंने नहीं बताया. मैंने पूछा भी नहीं. मैं जानती हूं कि मैंने ज़्यादा जानने की कोशिश की, तो वो फिर चिढ़ जाएंगे. मैंने अपने सवालों को ख़ामोश कर दिया. ये सवाल ही तो थे, जिनसे मुंह छिपाकर वो एक दिन अचानक घर से निकल गए थे. पांच-छह दिन तक कहीं से कोई ख़बर नहीं मिली. मेरा तो हाल बुरा हो गया. ख़ुद को संभालती, बच्चों को हिम्मत बंघाती या लोगों की जिज्ञासाओं का समाधान करती. कैसी-कैसी कल्पनाएं ज़ेहन में दस्तक देने लगी थीं. अकेली औरत- कहां-कहां तलाश करती उनको?
फिर एक दिन इन्हीं का फोन आया. कलकत्ता से बोल रहे थे, "मेरी चिंता मत करना. ठीक हूं. एक जगह काम की बात चल रही है, शायद सब कुछ फाइनल हो जाए. यहां एक अख़बार को साहित्य संपादक की ज़रूरत है. बात फाइनल हो गई, तो इसी सप्ताह ड्यूटी ज्वॉइन करनी पड़ेगी. हो सकता है, कुछ महीने मुझे अकेले ही रहना पड़े. तुम वहां सब कुछ संभाल लेना." इतना कहकर उन्होंने फोन रख दिया. मेरे और बच्चों के बारे में कोई भी जिज्ञासा शायद उन्हें नहीं थी. ख़ैर इतना ही क्या कम था कि उन्होंने यह सोचकर अपनी कुशलता का समाचार दे दिया कि मैं परेशान हो रही होऊंगी.
बिना बताए, इस तरह उनके घर से चले जाने को उनके कुछ मित्रों ने 'महाभिनिष्क्रमण' कहा. इतिहास में महाभिनिष्क्रमण गौतम बुद्ध द्वारा महलों के परित्याग की घटना को कहा जाता है. लेकिन उनके 'पलायन' को महाभिनिष्क्रमण कैसे कहा जा सकता है? बुद्ध तो सत्य की तलाश में निकले थे, जबकि पुरु ने घर इसलिए छोड़ा, क्योंकि वो सच का सामना नहीं कर पा रहे थे. सच था भी बहुत कड़वा. दो बच्चों वाले परिवार का मुखिया अपनी शानदार जीवनशैली के साथ, इस बड़े शहर में, बिना नौकरी के निर्वाह कैसे करेगा? यह सवाल कड़वा होने के बावजूद एक सच्चाई से सामना तो करवाता ही था, लेकिन पुरु की प्रतिभा इस बार इस सवाल का सामना करने से कतरा रही थी.
मैं नहीं मानती कि प्रतिभा और ऊर्जा की उनमें कोई कमी है. मैं ही क्या, उन्हें जानने वाला कोई भी व्यक्ति शायद ही इस बात को माने. कॉलेज के दिनों में अपनी बहुमुखी प्रतिभा के दम पर शहर भर में चर्चित हो जाने वाले पुरु को प्रतिभाहीन कैसे कहा जा सकता था? एक छोटे से गांव का लड़का शहर जाने के साल भर बाद ही इलाके के सबसे बड़े कॉलेज के छात्रसंघ का अध्यक्ष बन जाए, तो उसकी प्रतिभा पर प्रश्नचिह्न लगाने का सवाल ही कहां उठता है?

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दस बरस बीत गए इस बात को उन दिनों पुरु की उपस्थिति हर जलसे की ख़ास ज़रूरत हुआ करती थी. पत्र-पत्रिकाओं में उनके विचारोत्तेजक लेख छपते थे और न जाने कितनी जनसमस्याओं के ख़िलाफ़ जन आंदोलनों का नेतृत्व उन दिनों पुरु ने किया था.
मुझे याद है, शादी के तुरंत बाद पुरु ने मुझसे कहा था, "चंदना! जो कुछ मेरी अंजुरी में है, सब कुछ तुम्हारा है. उसे सहेजना और संवारना, लेकिन स्वार्थी होकर कभी मेरे पांवों की बेड़ी होने का प्रयास मत करना, प्लीज़!"
मैंने उसी दिन निश्चय कर लिया था कि मैं कभी पुरु के पांवों को जकड़ने का प्रयास नहीं करूंगी. इस प्रतिभावान ऊर्जावान व्यक्ति को बांधने की ज़रूरत ही क्यों पड़ेगी मुझे, जबकि वह ख़ुद मेरे प्रति अपने प्यार के एहसास में बंधा हुआ है. उनके सानिध्य में संस्कारित होते भविष्य के सुनहरेपन का एहसास मुझे चंदना से चंदनगंधा बना देता. मेरा मन और महकने लगता.
देखते ही देखते दो साल बीत गए. पुरु उन दिनों एक प्राइवेट कॉलेज में लेक्चरर थे. एक दिन मैंने उनसे कहा, "मेरे पास अच्छी-ख़ासी योग्यता है. क्यों न मैं भी कहीं नौकरी कर लूं?"
पुरु ने सुना तो बिफ़र पड़े, "मेरे घर की महिलाएं पैसा कमाने के लिए इधर-उधर भटकें, यह मुझे पसंद नहीं." मैं तो सुनकर अवाक् रह गई. पुरु जैसा ऊर्जावान छात्र नेता इतनी संकीर्ण मानसिकता का हो सकता है, मैं तो सोच भी नहीं सकती थी.
ख़ैर, मैने यह कहकर उनसे प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने की अनुमति ले ली कि पढ़ाई के बहाने समय कटेगा. नौकरी करने या न करने का सवाल तो तब उठेगा, जब मैं परीक्षा में चयनित हो जाऊंगी. प्रतियोगी परीक्षा में चयनित होना भी कौन सा आसान काम है. बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं एक नियुक्ति पत्र पाने के लिए.
मेरा तर्क काम कर गया. शायद इसलिए भी कि इससे पुरु का अहम् संतुष्ट हुआ होगा, क्योंकि मैंने स्वयं अपनी सफलता की संभावनाओं को धुंधला करके आंका था. पुरु अपनी नौकरी के बाद पहले की ही तरह अपने मित्रों और आयोजकों में व्यस्त रहते, लेकिन मुझे समय काटने का साधन मिल चुका था. कमाल तो यह हुआ कि मैं अपने इलाके के क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में लिपिक पद के लिए चयनित भी हो गई. मैं इस अवसर को छोड़ना नहीं चाहती थी. पुरु पहले तो नौकरी करने के मेरे निर्णय पर बहुत नाराज़ हुए, लेकिन जब दोस्तों ने समझाया और मैंने भी ज़िद पकड़ ली, तो वो मान गए. हालांकि अपना क्षोभ प्रकट करने के लिए इन्होंने पूरे पंद्रह दिन तक मुझसे बात नहीं की थी.

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आज सोचती हूं, मेरी नौकरी न होती तो घर कैसे चलता? पुरु तो एक दिन कॉलेज की लेक्चररशिप छोड़ आए. बोले, "सेठ समझता क्या है अपने आपको? मुझे समझाने चला था कि कविताओं की व्याख्या कैसे की जाए. ऐसे बेवकूफ़ों की ग़ुलामी मुझसे नहीं होती. अब अपना अख़बार निकालूंगा और राजनीति में जगह बनाऊंगा."
मैंने ख़ामोशी से उनकी बात सुन ली. उनकी ख़ुशी में मेरी ख़ुशी थी. जितनी जमा-पूंजी थी, उसके सहारे एक साप्ताहिक अख़बार निकाला. धीरे-धीरे उनकी कलम उग्र होती गई. ऐसे में राजनीति में जगह तो क्या बनती, जिन नेताओं से अच्छे संबंध थे, वो भी ख़राब हो गए, क्योंकि पुरु ने अपने अख़बार में अपने ही मित्रों के ख़िलाफ़ लेख छापे, कोई समझाने का प्रयास करता, तो कहते, "मैं अपने अख़बार को ईमानदारी की मिसाल बनाऊंगा. कोई कितना ही अपना क्यों न हो, उसकी कमियों को उजागर करने में कमी नहीं रखूंगा."
धीरे-धीरे लोगों ने कन्नी काटनी शुरू कर दी. छोटे अख़बारों के पाठक होते ही कितने हैं, विज्ञापन भी मिलने बंद हो गए. धीरे-धीरे अख़बार का प्रकाशन बंद करना पड़ा. पुरु एक बार फिर बेरोज़गार हो गए.
उन्हीं दिनों इनके बचपन के एक मित्र के चाचा ने हमारे शहर में एक बड़ी फैक्ट्री डाली. मित्र ने चाचा को समझाकर पुरु को इस फैक्ट्री में जनसंपर्क प्रबंधक की नौकरी दिलवा दी. दो साल तक पुरु ने यह नौकरी की. फिर एक दिन जनरल मैनेजर को भला-बुरा कह आए. ऐसे में नौकरी तो जानी ही थी. चली गई. क़रीब महीनेभर तक पुरु घर में रह कर किताबें पढ़ते रहे. मैंने भी नौकरी के विषय में उनके घाव को तुरंत कुरेदना उचित नहीं समझा, लेकिन कभी तो यह मौन टूटना ही था. दोनों बच्चे बड़े हो रहे थे. परिवार की ज़िम्मेदारियां बढ़ रही थीं. मेरी तनख़्वाह में घर ख़र्च चलता, बच्चों की पढ़ाई होती, मकान की किश्तें जाती, दोनों की गाड़ियों में पेट्रोल भरता, टेलीफोन के लंबे-चौड़े बिल का भुगतान होता और पुरु की शाही आदतों का निर्वहन होता? फिर खाली बैठे-बैठे पुरु चिड़चिड़े भी तो होने लगे थे.
"आख़िर ऐसे कितने दिन और चलेगा?" उस रात मैंने पुरु से यही सवाल किया था और पुरु अगले दिन बिना बताए घर छोड़ चले गए!
ख़ैर! कलकत्ता से ही पुरु ने एक दिन ख़बर दी कि वो उस अख़बार के साहित्य संपादक हो गए हैं. उन्होंने कहा था कि वो सेट होने के बाद हम सबको भी वहां ले जाएंगे. लेकिन इस विषय में मैं फ़िलहाल जल्दी में कोई निर्णय नहीं लेना चाहती. अभी तो बैंक की नौकरी का बड़ा सहारा है, लेकिन कलकत्ता जाने के लिए तो यह नौकरी छोड़नी पड़ेगी. राजस्थान के इस इलाके के ग्रामीण बैंक की कोई शाखा उस महानगर में तो होगी नहीं, इसलिए मैंने उनसे कह दिया कि फ़िलहाल वो ख़ुद वहां सेटल हो जाएं. क़रीब महीने भर बाद वो दो दिन के लिए आए और अपने लिए कुछ ज़रूरी सामान साथ ले गए. इन दो दिनों में करने के लिए उनके पास कामों की इतनी लंबी सूची थी कि तसल्ली से बात करने की, तो उन्हें फ़ुर्सत ही नहीं मिली. थोड़ी देर घर में रहते, तो भी दोस्तों से घिरे रहते.
इस बार पुरु सप्ताह भर के लिए आए थे. सोचा था, अब तो तसल्ली से बात कर सकूंगी, लेकिन इस बार भी हालात वैसे ही रहे. इतना ज़रूर उन्होंने बताया कि प्रिंट मीडिया की नवीनतम तकनीक के अध्ययन के लिए कंपनी उन्हें विदेश भेजना चाहती है. वो विदेश चले गए, तो साल भर बाद लौटेंगे, वरना चार महीने बाद सप्ताह भर के लिए फिर आएंगे और हो सकता है हम सबको अपने साथ ले जाएं. हां, एक दिन दोस्तों के साथ जाते समय वो लवेश और लवीना को भी अपने साथ ले गए थे. मेरा मन भी अपनत्व से सनी किसी मनुहार के लिए हुलसता होगा, इस बात की शायद उन्हें चिंता नहीं थी.

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सात दिन कब बीत गए, कुछ पता ही नहीं चला, वो अपने काम निबटाते रहे और मैं उनके साथ बांधने के लिए तरह-तरह का नाश्ता बनाती रही. कलकत्ता में उनकी पसंद का राजस्थानी खाना आसानी से कहां मिल पाता होगा? मठरी, नमकीन, भुजिए, पापड़… सबका एक-एक पैकेट इस बार मैंने इनके साथ रख दिया. गाड़ी का समय नज़दीक आया, तो एक-एक करके दोस्तों से घर भरने लगा. मुझे इनसे बतियाने का मौक़ा ही नहीं मिला.
प्लेटफार्म पर पहुंचने के बाद भी आठ-दस दोस्त इन्हें घेर कर खड़े रहे. लवेश, लवीना और मैं इनके सामान के पास खड़े रहे. मैं यह सोचकर ख़ुद को तसल्ली देती रही कि ये मुझसे बतियाना भी चाहें, तो दोस्तों को छोड़कर आना कोई अच्छा थोड़े ही लगेगा.
गाड़ी आई तो प्लेटफार्म पर अफरा-तफ़री मच गई. फिर इंजन ने सीटी दी, तो कलेजा हलक में आ गया. मन किया कि फूट-फूटकर रो पडूं, लेकिन किसी तरह अपने आप को संभाले रही. ये दौड़कर डिब्बे में चढ़ चुके थे. चलती रेल से हाथ हिलाते समय एक ख़ास क़िस्म का दर्प इनकी आंखों में झलक आया था. मानो कह रहे हों, तुम तो व्यावहारिक जीवन में मुझे असफल बताती थीं. भला असफल आदमी को विदा करने इतने मित्र स्टेशन पर जाते हैं?
उन्होंने चलती रेल से हाथ हिलाया, तो मेरा हाथ यंत्रचालित तरीक़े से ऊपर उठ गया. अचानक जैसे उन्हें कुछ याद आया और वो पूरी ताक़त से चीखे, “महकती रहना चंदना!” पता नहीं, क्या हुआ मुझे मैंने लवेश और लवीना को सीने से लगाकर भींच लिया. इस एक संबोधन ने मानो मुझमें ढेर सारी ऊर्जा का संचार कर दिया था. रेल मेरी आंखों से ओझल होने लगी थी.

- अतुल कनक

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