कहानी- ममाज़ बॉय (Short Story- Mumma’s Boy)

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“मेरे लिए तुम भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जितनी कि मां, पर क्या करूं डियर, तुम्हारी बात मानता हूं तो जोरू का गुलाम कहलाऊंगा और मां की मानता हूं, तो ममाज़ बॉय. अपनी ज़िंदगी तो भैया अब ऐसे त्रिशंकु की तरह लटकते हुए ही गुज़र जाएगी.” और एक कहकहा लगाते हुए वे ऑफ़िस निकल गए थे. लेकिन मांजी तो गहरी सोच में डूब गई थीं.

 

शादी से घर की रौनक ही कुछ और हो जाती है. कल तक इस घर में मात्र हम तीन प्राणी थे- मैं, नीरज और हर्ष. नीरज व हर्ष के ऑफ़िस चले जाने के बाद घर मुझे काट खाने को दौड़ता था. समय काटे नहीं कटता था. और अब 4 दिनों से हालत यह है कि मुझे घड़ी की तरफ़ आंख उठाने का मौक़ा भी नहीं मिल रहा है. इकलौते बेटे की शादी में मां को सांस लेने की फुर्सत मिले भी तो कैसे? कल से मेहमान एक-एक कर रवाना होने शुरू हो जाएंगे और 2 ही दिनों में घर पुन: खाली हो जाएगा. लेकिन मुझे अब खालीपन कभी नहीं घेरेगा, घर में नववधू जो आ गई है. उसके संग बातें करते, काम करते अब तो मेरा समय मज़े से कटेगा. एक तरफ़ घर में नववधू के आने का एहसास मुझे गुदगुदा रहा था, तो दूसरी ओर कुछ चिंताएं भी घेर रही थीं.
अपने बेटे हर्ष के प्रति जितना मेरा झुकाव है, उतना ही उसका भी मेरे प्रति लगाव है. ममा-ममा करते ज़ुबान नहीं थकती उसकी. घर में जितने सदस्य हैं, उतने ही नौकर हैं, फिर भी अपने हाथों से उसके सभी काम करने से ही मुझे संतुष्टि मिलती है. हम मां-बेटे का यह आपसी लाड़-प्यार नई बहू मेघा को भी उसी तरह खटकने न लग जाए, जिस तरह मुझे नीरज और उसकी मां का लाड़-प्यार खटकने लगा था.
कहां तो मैं सोच रही थी कि शादी की थकान के कारण पलंग पर लेटते ही नींद के आगोश में समा जाऊंगी, लेकिन यहां तो स्मृतियों के ताने-बाने ने मेरी नींद को कहीं दूर पटक दिया था. पास ही खर्राटे भरते नीरज को देखकर मुझे ईर्ष्या हो रही थी. पुरुष गृहस्थी में रहते हुए भी कितना निर्लिप्त जीवन जी सकता है. न किसी को कोई अतिरिक्त मोह और न भावनाओं से कोई अतिरेक ज्वार. दुनियाभर की संवेदनाएं तो मानो स्त्रियों के लिए ही बनी हैं, जिसकी दुख में भी आंखें बरस पड़ती हैं और ख़ुशी में भी.
जनवरी की सर्द रात अपने पूरे यौवन पर थी. चार दिन शादी की गहमागहमी में मैं इस ठंड को महसूस ही नहीं कर सकी. आज काम से कुछ राहत मिली तो सर्दी की तीव्रता का एहसास हुआ. मैं कंबल में और अंदर दुबक गई. लेकिन कंबल में दुबकने से भी इंसान स्मृतियों के शिकंजे से तो मुक्त नहीं हो सकता. विगत का एक-एक दृश्य मेरी आंखों के सामने ऐसे घूम रहा था मानो कल की ही घटना हो.
‘तुम्हें तो हर काम मांजी से पूछकर या बताकर करने की आदत हो गई है- ममाज़ बॉय.’
‘ममाज़ बॉय! ममाज़ बॉय!’ मेरे कमरे के बाहर से गुज़रती मांजी के कानों में ये शब्द हथौड़े की भांति गूंज उठे. नीरज उनका इकलौता लाड़ला बेटा है, जिसकी बलाइयां लेते वे थकती नहीं थीं. बेटे को पालने में उन्होंने अपना पूरा ममत्व उड़ेलकर रख दिया था. नीरज ने भी उन्हें निराश नहीं किया था. मां के सब अरमान पूरे करना वे अपना पहला कर्त्तव्य समझते थे. अपनी बहू यानी मुझसे भी मांजी को कोई शिकायत न थी. दरअसल बेटे से उनका जुड़ाव इतना गहरा था कि उससे जुड़ी हर चीज़ उन्हें प्रिय थी. फिर चाहे वह सजीव हो या निर्जीव. इसलिए नीरज का रूमाल भी उन्हें उतना ही प्रिय था, जितना कि उसका बेटा या बीवी. लेकिन यहीं मांजी से भूल हो गई. वे भूल गईं कि बीवी में संवेदनाएं होती हैं, वह रूमाल की तरह भावशून्य नहीं होती. अपने अंधमोह में उन्होंने कभी यह जानने की चेष्टा ही नहीं की कि मैं उनके इस पुत्रमोह को पसंद करती हूं या नहीं. इसलिए उस दिन मेरा नीरज को ‘ममाज़ बॉय’ कहकर संबोधित करना उन्हें गहरा मानसिक आघात पहुंचा गया. लेकिन उससे भी अधिक आश्‍चर्य हुआ था उन्हें नीरज की प्रतिक्रिया सुनकर.
“कम ऑन नीरा डार्लिंग! मेरे लिए तुम भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जितनी कि मां, पर क्या करूं डियर, तुम्हारी बात मानता हूं तो जोरू का गुलाम कहलाऊंगा और मां की मानता हूं, तो ममाज़ बॉय. अपनी ज़िंदगी तो भैया अब ऐसे त्रिशंकु की तरह लटकते हुए ही गुज़र जाएगी.” और एक कहकहा लगाते हुए वे ऑफ़िस निकल गए थे. लेकिन मांजी तो गहरी सोच में डूब गई थीं.
इतने बड़े आक्षेप को इतने हल्के से ले रहा है उनका बेटा! बिल्कुल अपने बाप पर गया है. उन्हें भी हर बात एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देने की आदत है. नीरज भला क्या खाक मां की मानता है? उसके बाप तो पूरे श्रवणकुमार थे. अपनी मां यानी मेरी सास के सामने आंख ऊपर तक नहीं करते थे. रात को 2 घंटे नियम से मां के पांव दबाते थे. घर में सास का हुकुम पत्थर की लकीर होता था. वे बेचारी दबी ज़ुबान से कभी पति को कुछ कहतीं तो वे भी उनकी बात इसी तरह मज़ाक में उड़ा देते जैसे आज नीरज ने उड़ाई है. यदि उनके कारण नीरज की हालत त्रिशंकु की तरह हो गई है तो ठीक है. वे अब से उससे कोई अपेक्षा नहीं रखेंगी. उससे एक दूरी बनाकर रखेंगी, ताकि उस बेचारे को बहू के ताने न झेलने पड़ें.
उस दिन के बाद से मांजी ने अपने आपको पूरी तरह से बदल लिया था. बापूजी के तीन बंदरों को उन्होंने स्वयं में आत्मसात कर लिया था. न कुछ बोलना, न कुछ सुनना और न कुछ देखना. एक दिन मैं और नीरज किसी रिश्तेदार की शादी में जाने के लिए घर से निकल रहे थे. मांजी ने पहले ही तबियत ठीक न होने का बहाना कर साथ चलने से इंकार कर दिया था. पिताजी शादी समारोहों से वैसे ही दूर रहते थे. मैं अपने मेकअप को अंतिम टच दे रही थी कि नीरज की आवाज़ सुनाई दी. वे मांजी से पूछ रहे थे कि शादी में कितने रुपये लगाने हैं? मांजी ने तमककर जवाब दिया था, “इतनी छोटी-छोटी बातें मुझसे पूछने की आवश्यकता नहीं है. जो तुम्हें और नीरा को उचित लगे, वैसा कर लिया करो.”
मां का यह रूप नीरज के लिए सर्वथा नया था. वे अचकचाकर वहां से हट गए. समाचार देखते पिताजी ने भी एक क्षण को नज़रें उठाकर मां की ओर ताका, पर फिर जाने क्या सोचकर पुनः टीवी देखने लगे. लेकिन मुझे लग गया कि हो न हो, मांजी ने उस दिन का हमारा वार्तालाप सुन लिया है और अब वे चोट खाई सर्पिणी की तरह बदला लेने पर उतारू हैं. एकबारगी तो मैं डर गई. लेकिन फिर सोचा, अच्छा ही है कि चोट खाकर मांजी अपने केंचुल में सिमट रही हैं. मैं क्यों उनकी परवाह करूं? मैंने कुछ ग़लत थोड़े ही कहा था.
उसके बाद भी कुछ मौ़के ऐसे आए जब नीरज ने मांजी से कुछ पूछना चाहा और मांजी ने उन्हें झिड़क दिया. तब से नीरज मांजी से कतराने लगे और हर बात में मुझसे सलाह-मशविरा करने लगे. शायद मेरा अहं यही चाह रहा था. लेकिन बेटे पर अपना एकाधिकार खंडित होते देख मांजी कुंठित रहने लगी थीं. यह कुंठा समय-असमय झल्लाहट बनकर उनके सीने से निकल पड़ती.
मामाजी के पोते के मुंडन-संस्कार के समय ऐसा ही वाकया हुआ था. इकलौती बहन होने के कारण मांजी और संग में पिताजी को समारोह में जल्दी पहुंचना था. तय हुआ कि मैं नीरज के ऑफ़िस से आने के बाद उनके संग पहुंचूंगी. पोते से स्वाभाविक जुड़ाव के कारण मांजी ने हर्ष से अपने संग चलने का आग्रह किया, लेकिन उसने यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपनी मम्मी के संग आएगा. बस, मांजी का दबा हुआ आक्रोश फूट पड़ा. “हां-हां, मम्मी के संग ही आना. ममाज़ बॉय जो ठहरा.”
मैं तुरंत समझ गई कि मेरा तीर मुझ ही पर चलाया जा रहा है. मैं कहां पीछे हटनेवाली थी. मैंने तुरंत हर्ष को अपने सीने से चिपका लिया और कहा, “ठीक है, मां का लाड़ला मां के साथ ही आएगा. आप जाइए.”
मेरी इस हरकत से मांजी और चिढ़ गईं और बोलीं, “पर कल को इसकी बहू को यह मां-बेटे का लाड़-प्यार पसंद नहीं आया तो?”
“मांजी, मैं उन मांओं में से नहीं हूं, जो बेटे की शादी के बाद भी उसे अपने पल्लू से बांधे रखती हैं. शादी के बाद हर्ष की अपनी गृहस्थी होगी, जिसे वह स्वनिर्णय या अपनी बीवी के परामर्श से चलाएगा. मैं एक आदर्श मां की तरह उसमें कदापि हस्तक्षेप नहीं करूंगी.”
पिताजी ऑटो ले आए थे, इसलिए हम सास-बहू की तकरार वहीं समाप्त हो गई. मांजी ने उस दिन के बाद अपना मुंह पूरी तरह सिल लिया था. घर की शांति के लिए नीरज ने भी चुप्पी साधना ही बेहतर समझा. पिताजी की तरह वे भी धीरे-धीरे आत्मकेन्द्रित रहने लगे. हर समय ऑफ़िस की फाइलों में लीन. सेवा निवृत्ति के बाद फाइलों का स्थान अख़बार और पत्र-पत्रिकाओं ने ले लिया. पिताजी का अब तक स्वर्गवास हो गया था. मांजी उम्र के अंतिम पड़ाव पर थीं. हर्ष युवा हो चला था तो मैं प्रौढ़ा. अब मैं मांजी की मन:स्थिति समझने लगी थी. बेटे पर अपना एकाधिकार छिन जाने का भय मुझे भी कुछ-कुछ सताने लगा था. मांजी के प्रति आक्रोश सहानुभूति में बदल चुका था. पर मैं उसे व्यक्त करने में हिचकिचाती रही. और फिर बेटे के प्रति स्नेह का सागर दिल में समेटे ही एक दिन मांजी भी इस लोक से विदा हो गईं.
आज घर में नववधू के आगमन के साथ ही मांजी से जुड़ी समस्त यादें पुनर्जीवित हो उठी हैं. घर की शांति बनी रहे, इसके लिए मांजी ने अन्तत: अपनी ममता के उफनते ज्वार को काबू में कर लिया था. मैं भी आज से हर्ष और उसकी गृहस्थी से जुड़े समस्त अधिकार नववधू मेघा को सौंपती हूं. मांजी के सम्मुख मैंने जो आदर्श मां का दंभ भरा था, उसे हक़ीक़त में परिवर्तित करके दिखाऊंगी, ताकि कल कोई और विद्रोहिणी नीरा न पैदा हो जाए.
इस दृढ़ निश्‍चय से मेरे अशांत मन को गहरी शांति मिली और मैं शीघ्र ही नींद के आगोश में समा गई.
आधी रात के बाद कानों में ‘मम्मीजी, मम्मीजी’ की फुसफुसाहट सुन मैं चौंककर उठ बैठी. नववधू मेघा अपने रात्रि परिवेश में ही मुझे उठाने का प्रयास कर रही थी. फुसफुसाहट इस बात का संकेत थी कि उसे नीरज के उठ जाने का भय था. किसी अनिष्ट की आशंका से मैं कांप उठी. कहीं प्रथमयामिनी में ही हर्ष ने ममा के प्रति लाड़ जताते हुए कुछ ऐसी-वैसी बात तो नहीं कह दी कि मियां-बीवी लड़ बैठे और मेघा उसे बुलाने आ गई. मेरी घबराहट भांपकर मेघा फिर फुसफुसाई, “हर्ष की तबियत कुछ ठीक नहीं है. आपको बुला रहे हैं.”
मैं नंगे पांव बिना शॉल लपेटे ही मेघा के पीछे हो ली.
“हर्ष! बेटे क्या हुआ?”
“घबराओ नहीं मां. शादी में इतने दिन उल्टा-सीधा खा लेने से पेट गड़बड़ा गया है. 5-5 दस्त हो चुके हैं. मैंने सोचा आपसे दही-हल्दी बनवाकर खा लूंगा तो तबियत संभल जाएगी.”
“मैं अभी बनाकर लाई.” कहकर मैं उल्टे पांव रसोई की ओर जाने लगी, तभी मुझे अपने कुछ समय पूर्व किए गए निश्‍चय की बात याद आ गई और मैं वहीं ठिठककर रुक गई. इतिहास अपने को दोहरा रहा है. यदि हर्ष इसी तरह अपने हर काम के लिए मुझे बुलाता रहा तो कोई आश्‍चर्य नहीं कि कल मेघा भी उसे ममाज़ बॉय की उपाधि दे दे, जो मैं कदापि नहीं चाहती थी. मुझे आज पहले दिन से ही हर्ष की देखभाल की संपूर्ण बागडोर मेघा को सौंप देनी चाहिए. यह सोचकर मैं वापस मुड़ी.
“क्या हुआ मां?”
“बेटा, इतने से काम के लिए तुमने मुझे क्यों बुलवाया? अब तुम्हारी सार-संभाल के लिए मेघा तुम्हारे पास है, तुम्हें उसे सौंपकर मैं बिल्कुल निश्‍चिन्त हो चुकी हूं. अब तुम अपनी ज़रूरत उसे बताया करो.”
“ज… ज़ी… मम्मीजी. मैंने इनसे कहा भी था कि मैं बना लाती हूं.” मेघा स्वयं को दोषी मानकर बौखला उठी थी.
“मेघा को अभी घर की ज़्यादा जानकारी नहीं है. फिर उसे सही मात्रा भी नहीं पता होगी. वैसे भी अपने कामों के लिए मैं आपके अलावा अभी किसी पर भरोसा नहीं कर सकता.”
अपनी प्रशंसा सुन मैं फूल उठी और तुरंत रसोई की ओर लपकी. सधे हाथों ने पलक झपकते ही दवा तैयार कर ली और अगले ही क्षण मैं पुन: हर्ष के दरवाज़े पर थी. लेकिन परदे के पीछे के वार्तालाप से मेरे उड़ान भरते पैरों को लकवा मार गया.
“आपने मुझे क्यों नहीं जाने दिया? क्या सचमुच आपको मुझ पर भरोसा नहीं है?” मेघा का रूठा स्वर सुनाई दिया.
“अरे मेरी जान! तुम बहुत भोली हो. इतनी ठंड में मैं तुम्हें तकलीफ़ नहीं देना चाहता था. तुम कहां इतनी ठंड में रसोई में जाती और सामान ढूंढ़ती. ममा को तो मेरा काम करने की आदत है और उन्हें इसमें आनन्द भी आता है. मैं तो चाहता हूं कि शादी के बाद भी वे मेरे सभी काम पूर्ववत करती रहें. तुम तो बस अपनी इस फूल-सी काया की सार-संभाल करो और मुझ पर अपना सारा प्यार लुटाओ.”
‘नॉटी बॉय’ मेघा के इस स्वर के साथ ही दोनों की सम्मिलित शरारती हंसी सुनाई दी.
मैं हाथ में कटोरी लिए किंकर्त्तव्यविमूढ़ खड़ी थी. सोच रही थी, पीढ़ियों के अंतराल ने श्रवणकुमार को पहले ममाज़ बॉय बनाया, फिर नॉटी बॉय. अगला रूप जाने क्या होगा?
‘हे भगवान, मुझे वह रूप दिखाने के लिए ज़िंदा मत रखना.’ बुदबुदाते हुए मैंने कसकर आंखें बंद कर लीं. मानो ऐसा करके मैं वह भयावह रूप देखने से बच जाऊंगी.

Sangeeta Mathur

           संगीता माथुर

 

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