दरवाज़े पर लगी नेमप्लेट ने बताया… अब तुम यहां नहीं रहते, ये घर किसी और का हो चुका है… तुमने घर बदल लिया… वैसे.. वैसे घर तो तुम बहुत पहले ही बदल चुके थे न, याद नहीं तुमको?.. कभी मेरे दिल में घर बनाया था तुमने!
आज गई थी मैं फिर से उसी गली में… जहां तुम्हारा घर था! घर की दीवारें और बाग की फुलवारी की क्यारियां अब भी वैसी ही थीं जैसी आख़िरी बार देखी थीं, बस… ये मोरपंखी के पौधे तब इतने बड़े नहीं थे… आज दरबान की तरह सिर तान कर मुख्य द्वार पर तन कर खड़े हैं… और ये बोगनबेलिया तब रातरानी के पीछे से झांकता था… अब तो उसके साथ खड़ा होकर बातें कर रहा है.
मैं आगे बढ़ी थी पर… दरवाज़े पर लगी नेमप्लेट ने बताया… अब तुम यहां नहीं रहते, ये घर किसी और का हो चुका है… तुमने घर बदल लिया… वैसे.. वैसे घर तो तुम बहुत पहले ही बदल चुके थे न, याद नहीं तुमको?.. कभी मेरे दिल में घर बनाया था तुमने!
ये दीवारें मुझे पहचान पाएंगी या नहीं ये जानने केलिए मैने उन पर अपनी हथेली फेरी थी.. ठीक वहीं जहां तुमने मुझे एक दिन खड़ा करके मेरे चेहरे को हाथों में भरा था और मैं छुईमुई के पौध के गमले के साथ ही दीवार से चिपक गई थी…सहमी हुई सी.
दीवारों पर हमारी सांसों की वाष्पित नमी अब भी मौजूद थी. उन्होंने मुझे पहचान लिया था… पहचान तो कैक्टस भी गए थे… क्यों न पहचानते आख़िर तुमने ही तो मेरे हाथों से लगवाए थे मेरे न न कहने के बावजूद भी… हथेली से खून की बूंदें भी चू गई थीं मिट्टी में पर अपने उत्साह में तुमने ध्यान ही नहीं दिया था.
पहचान गए थे कैक्टस मुझे.. मेरी चुन्नी उलझा लीथी उन्होंने, ताकि कुछ देर मुझे देख सकें और फिर याद दिला कर विदा कर दिया था मुझे कि अब इन कंटीली यादों से परे चले जाओ.
गुलाब निर्मोही थे, देखकर भी अनदेखा कर झूमतेरहे जबकि… जबकि वे तो साक्षी थे हर पल के.
आख़िरकार मैं वापिस लौट आई थी पर उस घर में अब भी… अब भी तुम्हारी ख़ुशबू समाई हुई है, पर… पर एक बात बताऊं… किसी से कहना मत… मैं चाह कर भी दिल के दरवाज़े की नेमप्लेट आज भी नहीं बदल पाई हूं.
– मेघा राठी
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