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कहानी- पारस मणि (Short Story- Paras Mani)

मैंने तैयार होने में कोई कसर नहीं छोड़ी. सबसे अच्छे कपड़े, पर्स. शीशे के सामने अंग्रेज़ी बोलने का अभ्यास किया. महंगे होटलों के नाम याद किए... और हाई क्लास खाने-पीने की चीज़ों के भी.

"हेलो निक्की, मैंने पापड़ और अचार अंचला के हाथ भेज दिए हैं, शाम को जाकर ले आना... लिखो उसका पता."

"ये सब क्या है मां?.. और अंचला कौन?"

"अरे मिसेज़ अस्थाना की बेटी. वहीं दिल्ली में है ना."

मैं तिलमिलाकर रह गई. इतना ज़रूरी था अचार-पापड? अब जाना पड़ेगा. ना मैं उनसे कभी मिली हूं, ना कोई ख़ास इच्छा है मिलने की, बस सुना बहुत है उनके बारे में; बहुत संपन्न हैं, कई सालों तक विदेश में रही हैं, अंग्रेज़ी की व्याख्याता हैं, पति फलां फलां कंपनी में हैं...

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मैंने तैयार होने में कोई कसर नहीं छोड़ी. सबसे अच्छे कपड़े, पर्स. शीशे के सामने अंग्रेज़ी बोलने का अभ्यास किया. महंगे होटलों के नाम याद किए... और हाई क्लास खाने-पीने की चीज़ों के भी.

"... आई एम निकिता. आर यू मिसेज़ अंचला भट्ट?"अच्छा हुआ घबराहट में मेरे मुंह से हिंदी नहीं निकली.

"निक्की ना! आओ आओ... आंटी ने बताया था कि तुम शाम को आओगी. कल ही तो मैं लौटी हूं कानपुर से..." वो  गले लगते हुए बोलीं. सूती साड़ी, ढीला जूड़ा, बच्चों जैसी मोहक मुस्कान और इतना मीठा स्वागत! मेरे लिए ये सब अप्रत्याशित था.  

"देखो, बातों में लगकर मैं पूछना ही भूल गई; क्या लोगी निक्की, ठंडा या गर्म?"

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ब्लू‌ लगून, मोइतो, फ्रूट पंच... और ना जाने कितने नाम याद किए थे, सब गले में अटक गए.

मैं मुस्कुराते हुए बोली,"हल्की सी ठंड हो रही है ना दीदी! आधा-आधा कप चाय पिएं?"

- लकी राजीव

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Photo Courtesy: Freepik

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