"सुनील ख़्वाबों की दुनिया से निकलकर, हक़ीक़त की ज़मीन पर चलना सीखो. ज़रा याद करो. यह वही जगह है, जहां बैठकर तुमने मुझसे कहा था कि तुम मालदार घर की बेटी से शादी कर ऐश में ज़िंदगी गुज़ारोगे, तब तो तुमने मेरे समक्ष शादी का प्रस्ताव नहीं रखा? आज जब तुम्हारे सारे सपने चूर हो गए, तो तुमने मुझे पाने के बारे में सोचा. तुमने तो मुझे एक दोस्त तक न समझा..."
रात के बारह बज रहे थे. सुनील सफदरजंग एन्क्लेव स्थित अपने दो कमरे के रिहायशी फ्लैट के बेडरूम में बिस्तर पर सोने की कोशिश कर रहा था, पर नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी. उसने बिस्तर से उठकर नींद की एक गोली पानी के साथ अपने गले से नीचे उतारी और इस आशा में कि शायद नींद आ ही जाए, पुनः बिस्तर पर लेट गया.
पर नींद की गोली भी उस पर अपना असर न दिखा सकी. उसे रह-रह कर रागिनी द्वारा भेजे गए उस पत्र की याद आ जाती, जो उसे दो दिन पहले ही मिला था. उस पत्र से मानो उसकी ज़िंदगी में भूचाल आ गया था. अन्यथा गत दो वर्षों से वह एक हताश और निराश ज़िंदगी जी रहा था, उसने लगभग यह मान लिया था कि अब अपनी ज़िंदगी तनहा ही गुज़ारनी है. सिगरेट और शराब के सहारे ही उसकी ज़िंदगी चल रही थी.
पर पिछले दो दिनों से वह एक पल भी सो न सका था, लाख सोचने पर भी वह यह निर्णय नहीं ले पा रहा था कि वह क्या करे. बिस्तर से उठकर उसने अपनी कोट की जेब से वह पत्र निकाला, फिर यह सोचकर कि यह पत्र तो उसने पिछले दो दिनों में पचासों बार पढ़ा है, पर अभी तक कुछ निर्णय नहीं ले पाया है. पत्र को मुड़ा हुआ ही टेबल पर रख दिया और पुनः बिस्तर पर पसर गया.
धीरे-धीरे वह अतीत की यादों में खो गया और सब घटनाएं एक-एक करके उसके मानस पटल पर चलचित्र की भांति घूमने लगीं. आज से लगभग ६ वर्ष पूर्व वह अपने बड़े भाई की शादी में करोलबाग गया था, वहीं उसने देखा था पूनम को, पहली ही नज़र में वह उस पर मोहित हो गया था. गेहुंआ रंग, तीखे नाक-नक्श और हंसने पर दांतों की धवल पंक्ति की झलक देने वाली पूनम बरबस ही सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही थी. सुनील के हृदय में एक हूक सी उठी थी कि काश, यह लड़की मेरी पत्नी बन पाती, पर पूनम इस सबसे बेख़बर थी.
दो माह बाद ही सुनील को वित्त मंत्रालय में लेखाकार की नौकरी मिल गई, अब सुनील के विवाह हेतु बहुत से प्रस्ताव आने लगे थे, पर सुनील ने अपने माता-पिता से यह स्पष्ट कह दिया था कि वह अभी विवाह की ज़िम्मेदारियों से बंधना नहीं चाहता है. और उसकी इच्छा है कि वे दो-तीन वर्ष बाद ही उसका विवाह करें, ताकि वह अपनी विवाहित ज़िंदगी को सुचारु रूप से चलाने के लिए पर्याप्त धन एकत्रित कर सके. यह सुनकर माता-पिता भी चुप्पी लगा गए थे. एक दिन जब वह दफ़्तर जाने के लिए तैयार हो रहा था, उसके बड़े भाई ने कहा, "तुम्हारी भाभी एक सप्ताह पहले से मायके गई हुई है. व्यस्तता के कारण मैं उनका कुशल क्षेम पूछने नहीं जा सका. आज दफ़्तर के बाद तुम उसका हालचाल पूछ आना."
"जी अच्छा." सुनील ने बस इतना ही कहा था.
दफ्तर के बाद वह बस स्टैंड पर जाकर करोलबाग जाने वाली बस में बैठ गया, पर यह क्या? बस अभी २-३ स्टैंड ही जा पाई होगी कि उसके कानों में बस कंडक्टर की यह आवाज़ पड़ी, "पता नहीं कहां से लोग चले आते हैं. कपड़े तो राजाओं-महाराजाओं की तरह पहनेंगे, पर टिकट लेने के नाम पर कहेंगे कि बटुआ चोरी हो गया. मैडम, जल्दी टिकट लीजिए, नहीं तो बस से नीचे उतार दूंगा."
सुनील ने उत्सुकतावश पीछे मुड़कर देखा था और देखते ही दंग रह गया था. यह तो पूनम थी. कंडक्टर उसे बुरा-भला सुना रहा था और बात-बात में उसे बस से नीचे उतार देने की धमकी दे रहा था. पूनम अपना उपहास उड़ते देख रही थी और दूसरे यात्री मुस्कुरा रहे थे. पूनम ने लगभग याचना भरे स्वर में कंडक्टर से कहा था, "मेरी बात का यक़ीन कीजिए, बस में चढ़ते वक़्त ही किसी ने मेरा बटुआ निकाल लिया है. प्लीज़, मुझे बस से मत उतारिए." पर कंडक्टर पर उसकी याचना का कोई असर न पड़ा और उसने बस रोकने के लिए सीटी बजा दी.
सुनील तत्काल अपनी सीट से उठकर कंडक्टर के पास पहुंच गया और बोला, "इनको मैं जानता हूं, यह दस रुपए का नोट पकड़िए और इनके टिकट का भी पैसा ले लीजिए." कंडक्टर ने पुनः बस चलने के लिए सीटी बजाई और टिकट फाड़ कर पूनम के हाथ में पकड़ा दिया तथा शेष पैसे सुनील को वापस कर दिए. इस बीच सुनील की सीट पर कोई दूसरी सवारी बैठ गई थी और कोई सीट खाली न थी, इसलिए वह पूनम की बगल में ही खड़ा हो गया.
पूनम सुनील को पहचान न सकी थी और सुनील के इस व्यवहार से वह ख़ुद को इस क़दर उसके एहसान तले दबा हुआ महसूस कर रही थी कि चाह कर भी उसे धन्यवाद न कह सकी. इस बीच करोलबाग का बस स्टैंड आ गया और दोनों बस से उतर पड़े.
पूनम ने जब देखा कि सुनील भी यहीं उतरा है, तो उसने हिम्मत जुटा कर कहा, "लगता है आप यहीं कहीं रहते हैं. मेरे घर चलिए, एक कप चाय पीकर ही जाइएगा." सुनील ने पूनम का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.
रास्ते में सुनील ने पूनम को बताया कि यहीं पर मेरे बड़े भाई की ससुराल है और विवाह समारोह में ही उसने पूनम को देखा था, पूनम ने भी बताया कि स्नातक की डिग्री प्राप्त कर पत्रकारिता का कोर्स करने के पश्चात् इस समय वह पीटीआई में काम कर रही है. पूनम के पूछने पर सुनील ने बताया कि वह वित्त मंत्रालय में लेखाकार है. इस बीच पूनम का घर आ गया. उसने सुनील को अपने माता-पिता से मिलवाया, साथ ही बस में घटी घटना को भी बताया.
उसके माता-पिता ने भी सुनील को शाबाशी दी. जलपान के पश्चात् जब सुनील ने जाने की इजाज़त मांगी तो उसके लाख मना करने के बावजूद पूनम ने बस का किराया उसकी जेब में डाल दिया.
पर यह मुलाक़ात का सिलसिला अब चल निकला. सुनील किसी न किसी बहाने पूनम के कार्यालय में फोन करता और कभी-कभी ख़ुद भी चला जाता. दोनों मिलते, हल्की-फुल्की बातें करते, कैंटीन में चाय-नाश्ता करते, पर सुनील कभी भी अपने दिल की बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता. उधर पूनम यह सब सामान्य तौर पर ही लेती, क्योंकि कार्यालय में नौकरी करते हुए उसे बहुत से पुरुषों के साथ बातचीत या चाय-नाश्ता करना पड़ता.
इसी बीच दीवार की घड़ी ने एक का घंटा बजाया और सुनील अतीत से वर्तमान में आ गया, प्यास से उसका गला सूख रहा था. जग में से एक ग्लास पानी निकालकर उसने अपने गले से नीचे उतारा और एक सिगरेट सुलगा कर वह पुनः बिस्तर पर लेट कर हल्के हल्के कश लेने लगा. आंख मूंदते ही उसका अतीत पुनः उसका पीछा करने लगा.
उसे फिर याद आया, आज से लगभग ५ वर्ष पूर्व एक दिन वह कार्यालय से लौट कर अभी अपने कपड़े उतार ही रहा था कि पिताजी ने उसे अपने कमरे में बुलाकर कहा, "बड़ी मालदार आसामी फंसी है. इसके पिता का बहुत बड़ा व्यवसाय है. काफी दहेज मिलेगा. कार भी मिलने की उम्मीद है. मेरी ज़िंदगी ही बन जाएगी. अब बसों में मुझे धक्के नहीं खाने पड़ेंगे. अब तो ऐश करूंगा ऐश."
"मेरे एक दोस्त ने तुम्हारे लिए अपनी बेटी रागिनी का विवाह प्रस्ताव भेजा है. ये तस्वीर है."
सुनील ने रागिनी की तस्वीर को हाथ में लेकर देखा, पर उसे तत्त्वीर कुछ आकर्षित न कर सकी थी, क्योंकि उसकी आंखों में तो पूनम की तस्वीर बसी थी. अभी सुनील 'हां' या 'ना' कुछ कह भी न पाया था कि उसकी मां आ गई और बोली, "बेटा, देख क्या रहे हो? हां कह दो. रागिनी के पिता बहुत मालदार आदमी हैं. ढेर सारा दहेज देंगे, हो सकता है कार भी दे दें. ज़िंदगी भर ऐश करोगे, रागिनी भी सुंदर है और बी. ए. पास है."
ढेर सारा दहेज और कार मिलने के ख़्वाब ने सुनील की आंखों पर ऐसा पर्दा डाला कि वह पूनम को बिल्कुल ही भूल गया और मुफ़्त का माल उड़ाने की कल्पना में उसने बस यही कहा, "जो आप लोग उचित समझें, वही करें." माता-पिता ने सुनील की स्वीकृति पाते ही एक साल के भीतर ही शादी का मुहूर्त निकलवा लिया.
शादी का कार्ड बांटते समय सुनील को पता नहीं कैसे याद आया कि पूनम को भी अपने विवाह में आमंत्रित करना चाहिए. वह एक कार्ड लेकर पूनम के कार्यालय पहुंच गया. दोनों आकर कैंटीन में बैठ गए. सुनील ने बैरे की दो कप कॉफी लाने का आदेश दिया और जेब से रागिनी का फोटो निकालकर पूनम के हाथों में देते हुए बोला, "देखो, कैसी है?"
"अच्छी लग रही है." पूनम बोली.
"इसी से मेरी शादी होने जा रही है, लो यह कार्ड पकड़ो." सुनील बोला.
पूनम ने फिर फोटो को देखा और कहा, "बधाई हो."
सुनील अपनी रौ में बोलता गया था, "बड़ी मालदार आसामी फंसी है. इसके पिता का बहुत बड़ा व्यवसाय है. काफ़ी दहेज मिलेगा. कार भी मिलने की उम्मीद है. मेरी तो ज़िंदगी ही बन जाएगी. अब बसों में मुझे धक्के नहीं खाने पड़ेंगे. अब तो ऐश करूंगा ऐश."
सुनील के मुंह से यह सब सुनकर पूनम को अच्छा नहीं लगा था. आज उसे सुनील अपने वास्तविक रूप में दिखाई पड़ गया था. वह यह तो कभी सोच भी नहीं सकती थी कि सुनील इतना लोभी और गिरा हुआ आदमी है. पर वह वक़्त की नज़ाकत को समझकर बिना कुछ कहे अपने केबिन में चली गई. सुनील तो अपने हसीन ख़्वाब में ही डूबा हुआ था, अतएव पूनम उसके बारे में क्या सोचकर चली गई, इसकी उसे सुध ही न रही.
नियत दिन उसका विवाह हो गया. पूनम विवाह समारोह में भी नहीं आई, पर सुनील ने इस पर कोई ध्यान ही न दिया. दहेज के रूप में उसे सब कुछ मिला था पर कार नहीं मिली. रागिनी के पिता ने यह ज़रूर कहा था कि कार बुक कर दी है, डिलीवरी मिलते ही दे दूंगा. सुनील को उपहार स्वरूप एअर इंडिया की टिकटें भी हनीमून मनाने के लिए मिली थीं.
एक माह का समय बीत गया, नवदंपति को कुछ पता ही न चला, विदेश में हनीमून मनाने के पश्चात् पति-पत्नी घर लौट आए थे. सुनील अब दफ़्तर जाने लगा था पर नवविवाहिता पत्नी के आकर्षण में वह कुछ ऐसा बंधा था कि मौक़ा मिलते ही घर भाग आता. सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था.
इस बीच एक ऐसी घटना घटी जिसकी किसी को उम्मीद तक न थी. रागिनी के पिता को व्यवसाय में ज़बरदस्त घाटा हुआ और वे करोड़पति से एक साधारण आदमी बन गए. उन्हें अपनी कोठी, कार तक ऋण चुकाने के लिए बेच देनी पड़ी.
इस घटना ने मानो सुनील के सपनों के महल को ही ढहा दिया. कहां उसने ससुराल के माल से ज़िंदगीभर ऐश करने की सोची थी और कहा अब कार मिलने की रही-सही उम्मीद भी जाती रही. शिष्टाचारवश वह ससुराल गया भी, पर उसके व्यवहार से यह साफ़ झलक रहा था कि ससुर को व्यवसाय में घाटा होने से वह उतना दुखी नहीं है जितना कि अपने ख़्वाब सच न हो पाने से.
जिस रागिनी में सुनील को अब तक कोई कमी नज़र नहीं आ रही थी, वहीं अब क़सूरवार लगने लगी थी. वह अब अपना अधिकांश समय दफ़्तर में ही गुज़ारने लगा था. देर रात गए वह घर लौटता और रागिनी के कुछ भी कहने पर उसे बुरा-भला सुनाता. कई बार उसने रागिनी को सुनाकर कहा भी था, "रईस बाप की बेटी बनती है, शर्म नहीं आती. इसके बाप ने कार देने के लिए कहा था, आज तक नहीं दी." रागिनी सुनकर चुप्पी लगा जाती और कर भी क्या सकती थी?
एक दिन सुनील लंच के समय में घूम रहा था कि उसकी निगाह पुनम पर पड़ गई. हेलो-हाय के बाद दोनों चाय पीने के लिए एक दुकान के सामने खड़े हो गए. पूनम ने यह सोचकर सुनील से कुछ नहीं पूछा कि उसकी ज़िंदगी मज़े में चल रही होगी, पर सुनील उसमें काफ़ी रुचि लेता रहा. फिर यदा-कदा सुनील के फोन पूनम के पास आने लगे और सुनील उससे मिलने आने लगा. पूनम इस सबको सामान्य तौर पर ही लेती रही.
पर सुनील को ऐसा लगा कि पूनम अभी भी उसमें रुचि लेती है और यदि उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखें, तो वह तैयार हो जाएगी. इतना सोचते ही वह पूनम को पाने के लिए तड़प उठा. उसने सोचा कि इसके लिए उसे सबसे पहले अपनी पत्नी को रास्ते से हटाना पड़ेगा.
इस सोची-समझी नीति के तहत वह रागिनी के साथ अपने इस किराए के फ्लैट में आ गया. वह अब रागिनी को रोज़ जली-कटी सुनाता और बात-बात में उस पर हाथ भी उठाने लगा था. रागिनी सब कुछ चुपचाप बर्दाश्त कर जाती.
उस दिन तो हद हो गई. सुनील देर रात गए दफ़्तर से लौटा था. रागिनी ने बस इतना ही पूछ लिया था कि देर कैसे हो गई. सुनील ने उसकी बुरी तरह पिटाई की और उसका हाथ पकड़कर घसीटते हुए उसे घर से बाहर कर दिया और चीखा, "जा भाग जा, अपने बाप के पास. आइन्दा कभी इधर की तरफ़ मुंह भी न करना, मैं तुम्हारी शक्ल तक नहीं देखना चाहता." वाक्य समाप्त होते ही उसने दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया.
रागिनी दरवाज़े के बाहर बहुत देर तक पड़ी रोती रही, पर सुनील को उस पर ज़रा भी तरस नहीं आया. यह तो महानगर की फ्लैट संस्कृति का ही कमाल था कि सब कुछ देख-सुन कर बहुत से लोग एकत्र तो हो गए, पर सुनील से किसी ने भी कुछ कहने की ज़रूरत नहीं समझी.
हारकर रागिनी देर रात गए एक स्कूटर पकड़कर अपने माता-पिता के पास चली आई. बेटी के इस प्रकार घर आने पर उन्हें आश्चर्य तो हुआ, पर रागिनी के यह बताने पर कि कार न मिलने की वजह से ही सुनील ने उसके साथ इस तरह का दुर्व्यवहार किया है. उन्होंने सोचा कि ग़ुस्सा शांत होने पर सुनील पुनः रागिनी को लिवाने आ जाएगा.
पर उन्हें आश्चर्यं तो तब हुआ जबकि एक सप्ताह के भीतर ही सुनील द्वारा तलाक़ मांगे जाने की न्यायालय की नोटिस उन्हें मिली. रागिनी के पिता ने एक बार कहा भी कि मैं जाऊं. सुनील से बात करूं, शायद बात बन ही जाए, पर रागिनी ने अपने पिता को दृढ़ता से ऐसा करने से मना कर दिया.
रागिनी ने हालात से समझौता कर लिया था. वह बी. ए. कर ही चुकी थी. वह अब टीचिंग का कोर्स कर एक स्कूल में अध्यापन करने लगी थी.
उधर न्यायालय अपना कार्य करता रहा. लगभग दो वर्ष पश्चात् रागिनी को न्यायालय में हाज़िर होना पड़ा. भरी अदालत में सुनील ने रागिनी पर दुश्चरित्रता का झूठा आरोप लगाया और इसी बिना पर तलाक़ की मांग की. पर रागिनी ने अपने बचाव में कुछ भी न कहा था और कातर निगाहों से सुनील की तरफ़ देखकर बस इतना ही कहा था, "इन्हें जिसमें ख़ुशी मिले, वह कर दीजिए, अगर इन्हें तलाक़ ही चाहिए, तो दे दीजिए. मुझे और कुछ भी नहीं कहना है." पर सुनील पर इसका कुछ भी असर न पड़ा था, बल्कि वह तलाक़ मिल जाने पर ख़ुश ही हुआ था.
सुनील को रागिनी का कातर निगाहों से देखना और बोलना आज भी याद है. उसे वह दिन याद आया जब उसने सोचा था कि आज पूनम के समक्ष वह शादी का प्रस्ताव स्खेगा.
बन-संवर कर जब वह पूनम के कार्यालय पहुंचा, तो उस समय वह एक व्यक्ति से बातें कर रही थी. सुनील को देखकर पूनम ने उस व्यक्ति का परिचय कराते हुए उससे कहा था, "मि. सुनील, ये डॉ. अविनाश हैं, अमेरिका में रहते हैं. मेरे बड़े भाई के दोस्त हैं. ये भारत में शादी करने के इरादे से आए हैं. इनके पास केवल एक महीने का समय है, कोई अच्छी लड़की तुम्हारे ध्यान में हो तो बताओ."
लगभग एक सप्ताह बाद ही वह पुनः पूनम के कार्यालय पहुंचा, उस समय वह कुछ व्यस्त थी, थोड़ी देर बाद ही पूनम आ गई, सुनील की सामने वाली सीट पर बैठकर वह बोली, "जल्दी बताओ, तुम्हें कौन सी बात करनी है."
"नहीं, पहले तुम बताओ. तुम मुझे कौन सी सरप्राइज देने वाली हो." सुनील बोला.
पूनम बोली, "चलो, मैं ही पहले बता देती हूं. वो अमेरिका में रहने वाले डॉ. अविनाश से तुम्हें मिलवाया था न, उनसे मेरी शादी तय हो गई है. अगले हफ़्ते ही हमारी शादी होने वाली है और शादी के तुरंत बाद मैं अमेरिका चली जाऊंगी. फिर पता नहीं कब मुलाक़ात हो. मेरी शादी में ज़रूर आना, लो ये कार्ड पकड़ो और हां. अब तुम अपनी बात बताओ."
सुनील ने कांपते हाथों से कार्ड पकड़ा? उसे लगा जैसे कि उसका दिल बैठा जा रहा है.
पूनम के बार-बार पूछने पर सुनील ने सब कुछ सुनाया और साथ में यह भी कहा, "आज मैं अपनी ही निगाह में काफ़ी गिर गया हूं. सारा दोष मेरा है. इसके लिए मैं तुम्हें दोष नहीं देता, शायद नियति मुझे अपने किए का दंड दे रही है." इतना कहकार सुनील की आंखों से आंसू झरने लगे थे.
पूनम को अब सारी बात समझ में आ गई थी, पर वह सुनील को ढांढ़स बंधा पाने में भी अपने को असमर्थ पा रही थी. काफ़ी सोचकर वह बोली, "सुनील ख़्वाबों की दुनिया से निकलकर, हक़ीक़त की ज़मीन पर चलना सीखो. ज़रा याद करो. यह वही जगह है, जहां बैठकर तुमने मुझसे कहा था कि तुम मालदार घर की बेटी से शादी कर ऐश में ज़िंदगी गुज़ारोगे, तब तो तुमने मेरे समक्ष शादी का प्रस्ताव नहीं रखा? आज जब तुम्हारे सारे सपने चूर हो गए, तो तुमने मुझे पाने के बारे में सोचा. तुमने तो मुझे एक दोस्त तक न समझा. अपनी पत्नी को प्रताड़ित कर उसे तलाक़ तक दे डाला, पर मुझे कुछ भी न बताया. इतना बड़ा निर्णय लेने से पहले तुम्हें कुछ तो सोचना चाहिए था. तुम्हारे जैसे व्यक्ति घृणा के पात्र होते हैं न कि सहानुभूति के." इतना कहकर पूनम चली गई थी और फिर कभी सुनील की मुलाक़ात पूनम से न हुई.
दीवार की घड़ी ने तीन का घंटा बजा दिया था. सुनील अपने को रागिनी का अपराधी समझ रहा था, उसके भीतर तो भयानक द्वंद्व चल रहा था, इसलिए राहत पाने का यह प्रयास भी व्यर्थ गया, वह फिर बेडरूम में घुस गया.
उसकी निगाह फिर रागिनी के पत्र पर पड़ी. पत्र को खोलकर वह पढ़ने लगा, "क्या कहकर आपको संबोधित करूं, समझ में नहीं आ रहा है. संबोधित करने का अधिकार तो आपने मुझसे छीन ही लिया है. ख़ैर, पिछली बातों में क्या रखा है, यह पत्र मैं आपका दुख बढ़ाने या ताने देने के लिए नहीं लिख रही हूं. परसों पूनम की एक सहेली मिली थी. उसी के द्वारा आपके बारे में सब कुछ मालूम हुआ. पता नहीं क्यों मैं आपको ख़ुश देखना चाहती थी, इसीलिए आप द्वारा तलाक़ दिए जाने को भी मैंने स्वीकार कर लिया था, पर अब यह जानकर कि मेरे चले आने के बाद भी आप ख़ुश नहीं है, दुख हुआ.
होनी को कौन टाल सकता है. शायद यही सब हमारे भाग्य में लिखा था. आपको आश्चर्य तो ज़रूर होगा, पर मैं अपनी तरफ़ से एक प्रस्ताव भेज रही हूं. यदि आप अपना दुख मेरे साथ बांटने के लिए तैयार हों, तो सभी प्रकार के मान-अपमान को भूलकर मुझे अपने साथ लिवा चलने के लिए आ जाइए, यही समझिए कि मैं' आपका इंतज़ार कर रही हूं.
आपकी कोई नहीं,
रागिनी
सुनील की आंखें भर आई थीं. वह सोचने लगा, रागिनी कितनी महान है, मैंने उस पर इतने ज़ुल्म ढाए पर वह सब कुछ भुला देने और मेरे साथ नई ज़िंदगी शुरू करने को तैयार है. एक मैं हूं कि स्वार्थों के वशीभूत होकर मैंने भरी अदालत में उसको अपमानित किया. सचमुच मैं माफ़ करने योग्य नहीं हूं. फिर भी रागिनी मुझे माफ़ कर अपनाने को तैयार है. मैं उसको मुंह दिखाने के काबिल भी नहीं रह गया हूं, पर मैं उसके पास जाऊंगा और उससे क्षमायाचना करूंगा. शायद इसी तरह मैं अपनी ग़लतियों का प्रायश्चित कर सकूंगा. प्रायश्चित करने के इस सुनहरे अवसर को मैं हाथ से नहीं जाने दूंगा."
उसके भीतर दो दिनों से चल रहा भीषण तूफ़ान अब शांत हो चुका था.
- शशांक अत्रे

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