कहानी- प्यार को हो जाने दो (Short Story- Pyar ko ho jane do)

 

hindi short story, हिंदी कहानी
ऐसा नहीं था कि इससे पहले उसकी ज़िंदगी में पुरुष नहीं आए थे, पर वे दोस्त ही रहे. उनके प्रति उसके मन में कभी कुछ अलग भावनाओं ने अपनी जगह नहीं बनाई थी. पर यह अंकित क्यों उसके दिलो-दिमाग़ पर एक तिलिस्म की तरह छा रहा है.

एक्सक्यूज़ मी.” वह वॉशरूम से बाहर निकल रही थी कि किसी ने पीछे से टोका. “क्या आपके पास सेफ्टी पिन होगी. मेरी पिन कहीं गिर गई है और साड़ी का पल्लू बार-बार सरककर नीचे आ रहा है.”
स़फेद रंग की बेहद ख़ूबसूरत साड़ी में उनका रूप खिल रहा था. स़फेद सितारों की कढ़ाई के कारण रोशनी में सितारे चमक रहे थे और चेहरे पर उनका ग्लो आ रहा था. कंधे तक कटे बाल, कलर की हुई कुछ लटें यहां-वहां बिंदास-सी झूल रही थीं. भरा हुआ चेहरा और गदराया हुआ बदन, गहरी ब्राउन कलर की लिपस्टिक, गले में हैवी आटिर्फिशयल ज्वेलरी, हाथों में मैटल के कड़े. एक हाई प्रोफाइल लुक था… उम्र 40-45 के बीच की होगी, पर चेहरे पर एक आभा व पूरे व्यक्तित्व से एक ऊर्जा बह रही थी.
बैग टटोलकर मैंने पिन ढूंढ़ी, तो उन्होंने पल्लू सेट करने की गुज़ारिश की. उनके थैंक्स पर सिर हिला बाहर निकलने ही लगी थी कि फिर एक सवाल गूंजा, “वर्किंग हो?”
“हां.” उसने धीमे स्वर में कहा. यूं भी उसकी आगे बात बढ़ाने या परिचय करने की कतई इच्छा नहीं थी, वह भी वॉशरूम में. वैसे भी अपने बारे में ज़्यादा बात करना उसे पसंद नहीं था. “कहां काम करती हो?” बाहर आने पर भी उनके सवाल जारी रहे.
“इस मॉल की रिटेल मैनेजर हूं.” “अरे वाह! मैं पालमिस्ट व एस्ट्रोलॉजर हूं… तुम्हारी हथेली पर नज़र पड़ी थी… अच्छा हाथ है. कभी आओ.” उन्होंने झट से अपना कार्ड उसे थमा दिया.
“वैसे पहले से अच्छा समय चल रहा है तुम्हारा. प्रोफेशनल लाइफ बढ़िया है, लव लाइफ में कुछ परिवर्तन आ सकता है. मेरी सलाह है कि प्यार के मामले में कभी देर नहीं करनी चाहिए, वरना बाद में स़िर्फ पछतावा ही हाथ आता है. उम्र हाथ से सरक जाती है. पहल करके देखो. अच्छा, चलती हूं… मन की बात कहने में हिचक कैसी.”
अपनी साड़ी के पल्लू को संभालती वह लिफ्ट में घुस गई. कमाल है. न जान, न पहचान, भविष्य भी बांच दिया… ख़ैर उसे इन सब पर विश्‍वास नहीं है. लव लाइफ…! उसे हंसी आ गई. केबिन में आकर काम में जुट गई, पर मन बार-बार उन्हीं शब्दों की ओर भाग रहा था… ‘पहल करके देखो.’
पहल करने का क्या मतलब है…? यानी जाए और उसका हाथ पकड़कर बोले कि वह उसे अच्छा लगता है, उसे उससे प्यार हो गया है… उसे यह सोचकर ही हंसी आ गई. उसे मुझमें कोई दिलचस्पी हो या न हो, बस वह जाकर अपने दिल की बात उसे बता दे. ज़रूरी तो नहीं कि जिसे आप पसंद करो या चाहो, वह भी आपको चाहता हो. किसी के मन में ज़बर्दस्ती तो प्यार के अंकुर प्रस्फुटित नहीं किए जा सकते हैं. शब्दों से या फिर बातों से प्यार झलकना भी तो चाहिए… और अगर कोई ऐसा न भी करे, तब भी आंखों से तो चाहत के सितारे झिलमिलाते हुए कभी न कभी तो नज़र आ ही जाते हैं.
उसकी आंखों में तारीफ़ की चमक तो देखी है उसने, पर प्यार?… झटका दिया उसने अपने विचारों को.
ऐसा नहीं था कि इससे पहले उसकी ज़िंदगी में पुरुष नहीं आए थे, पर वे दोस्त ही रहे. उनके प्रति उसके मन में कभी कुछ अलग भावनाओं ने अपनी जगह नहीं बनाई थी. पर यह अंकित क्यों उसके दिलो-दिमाग़ पर एक तिलिस्म की तरह छा रहा है.
पहली बार उसकी अंकित गुप्ता से मुलाक़ात एक क्लाइंट के रूप में हुई थी, जो उनके मॉल में अपना शोरूम खोलना चाहता था. क्लाइंट की ज़रूरतों के अनुसार स्पेस एलॉट करना, आवश्यक संसाधनों को उपलब्ध कराना, रेंट डीड तैयार कराने जैसी औपचारिकताओं की वजह से वो मुलाक़ात मात्र एक बिज़नेस डील से ज़्यादा और कुछ नहीं थी. बेशक वह उसकी स्मार्टनेस और प्रोफेशनल एटिट्यूड की कायल हो गई थी. उसका बिज़नेस काफ़ी फैला हुआ था और यह शोरूम उसके बिज़नेस का
छोटा-सा एक्सपैंशन था. ऑडी जैसी बड़ी कारों में सफ़र करने व महंगे सूट-जूते पहनने और क़ीमती मोबाइल हाथ में पकड़े होने के बावजूद था वह एकदम डाउन टू अर्थ, सहज, एरोगेंस का तो क्षणांश भी नहीं था उसमें.
बातचीत के दौरान भी वह बहुत शालीन रहता था. डील फाइनल होने के बाद उसने कहा, “मिस पांचाल, मैं यह कहना चाहूंगा कि क्लाइंट्स को बेहतरीन तरी़के से डील करने की सभी क्वालिटीज़ आपमें हैं. आप जैसा इंसान तो हमारी कंपनी में होना चाहिए. बोलिए जॉइन करेंगी हमारी कंपनी.” थोड़ी-सी झेंप और थोड़ी-सी हंसी. मिली-जुली अपनी इस प्रतिक्रया पर उसे ख़ुद ही हैरानी हुई थी. उस समय उसके अंदर कुछ रंग-बिरंगे, चटकीले फूलों ने अपनी सुगंध फैलाई थी. क्या था वह… समझ नहीं पाई थी तब वह.
“एक कप कॉफी तो बनती है.” वो मुस्कुराया था, तो लगा था कि जैसे उसके पूरे केबिन में मुस्कुराहट का उजास फैल गया है. स्मार्ट, गोरा और लंबा… हर तरह से परफेक्ट और सबसे बड़ी बात कि घमंड, तो उसे छू भी नहीं पाया था.
“चलिए, हमारे मॉल के ही बेहतरीन कॉफी कैफे में चलते हैं. वैसे आप मुझे स्नेहा कहकर बुला सकते हैं.”
अच्छा लगा था उसका साथ स्नेहा को. एक अच्छा दोस्त बनने की सारी ख़ूबियां थीं उसमें, पर उसने अपने और उसके बीच एक रेखा खिंची रहने दी, कहीं अंकित ही कोई ग़लत मतलब न निकाल ले. वैसे भी उन दोनों के बीच फाइनेंशियल स्टेटस की एक लंबी दूरी थी, जिसे वह पार नहीं कर सकती थी. मिडिल क्लास की उसकी दुनिया में अच्छा खाना और एक सलीकेदार ज़िंदगी जीना तो संभव था, पर शानो-शौक़त और लक्ज़री जैसे शब्दों के लिए उसमें जगह नहीं थी.
प्रोफेशनल होना निहायत ही ज़रूरी होता है, जिसके लिए भावनाओं को दबाए रखना पड़ता है. वैसे भी उसने उसके प्रोफेशनल स्किल की ही तारीफ़ की थी. उस महिला पालमिस्ट की बात सोच स्नेहा का मन हुआ कि वह अंकित को फोन करे. हालांकि उसने इससे पहले कई बार उसे फोन किया था, पर तब शोरूम संबंधी बातों के लिए. अब उसे किसलिए फोन करे…? क्या कहेगी वह उसे…? फोन करने का कोई बहाना उसे सूझ नहीं रहा था. तभी उसका मोबाइल बजा.
“हैलो स्नेहा, अंकित दिस साइड, कैसी हैं? आई होप आई एम ऩॉट डिस्टर्बिंग यू?”
स्नेहा का मन हुआ कहे कि वह चाहती है कि वह उसे डिस्टर्ब करे, पर स्वयं को संभालती हुई पूरे प्रोफेशनल अंदाज़ में बोली, “गुड, मिस्टर गुप्ता, कहिए आज हमारी याद कैसे आई, सब ठीक चल रहा है न? आप बहुत दिनों से आए नहीं?” एक ही सांस में वह सब पूछ गई. उसे डर था कि उसकी आवाज़ का कंपन कहीं उसके दिल का राज़ न खोल दे. क्या हो रहा था उसे, दिल की धड़कनें क्यों तेज़ हो रही थीं उसकी?
“बस ऐसे ही, थोड़ा बिज़ी था. पर आपने भी तो फोन नहीं किया. डील हो गई, तो क्या बात भी नहीं की जानी चाहिए.” बहुत ही मित्रवत् उलाहना था अंकित के स्वर में. अच्छा लगा उसे… सहजता, संकोच और झिझक की दीवार गिराने में मदद करती है.
“आपने कभी कहा भी तो नहीं था फोन करने को, फिर कैसे करती?” उसने भी हंसते-हंसते उलाहना दिया.
“स्नेहा, आप मुझे कभी भी फोन कर सकती हैं, नो फॉरमैलिटी प्लीज़.” यह सुन स्नेहा को लगा कि कहीं उसके ज़ोर-ज़ोर से धड़कते दिल की आवाज़ वह सुन न ले.
“कहां आप इतने बड़े बिज़नेसमैन और कहां मैं एक रिटेल मैनेजर, कहीं से आपका मुक़ाबला नहीं कर सकती, मिस्टर गुप्ता.”
“आप मुझे अंकित कहें और दोस्तों में ये पैसों की दीवार कब से आने लगी? क्या हम दोस्त नहीं बन सकते?… एक दोस्त की तरह क्या मैं आपको फोन कर सकता हूं…? कॉफी पीने आ सकता हूं? आपकी कंपनी में एक सुकून-सा मिलता है.”
“यू आर मोस्ट वेलकम अंकित, मैं आपका इंतज़ार करूंगी.” फोन रखते ही स्नेहा को लगा कि उसके शरीर में जैसे पंख लग गए हैं. लेकिन उसने स्वयं को रोका, हो सकता है अंकित को कोई काम हो.
कॉफी पीते हुए उस महिला की ही बातें उसके कान में गूंज रही थीं. वही पहल कर ले क्या, क्या वही कह दे… नहीं, ये ठीक नहीं होगा…
“स्नेहा, मैं चाहता हूं कि हम अक्सर मिलें. तुम में मुझे एक अच्छा इंसान मिला है और तुम अगर मेरी दोस्त बनना पसंद करो, तो मुझे अच्छा लगेगा. सच कहूं, मैं जब भी किसी लड़की से मिलता हूं, तो वह मेरे पैसों से इम्प्रेस होकर मुझे इम्प्रेस करने में लग जाती है. अगर साफ़गोई से कहूं, तो उनका केवल एक ही मक़सद होता है, लेकिन तुम मुझे सबसे अलग लगीं. एक सुलझी हुई इंसान, जो बेवजह न तो अपनी क़ाबिलीयत का ढिंढोरा पीटती है, न ही किसी तरह के दिखावे का मुलम्मा चढ़ाए घूमती है.”
“थैंक यू, पर किसी के बारे में इतनी जल्दी किसी नतीजे तक पहुंचना ठीक नहीं.” स्नेहा मुस्कुराई. “आख़िर हमारी मुलाक़ातें ही कितनी हुई हैं, इन्फैक्ट आप मुझे जानते ही कितना हैं.”
“जानती तो आप भी मुझे बहुत नहीं हैं, पर आपको देखकर लगता है कि आप मुझे पसंद करने लगी हैं. वैसे किसी को जानने के लिए बहुत सारी मुलाक़ातों का होना कोई ज़रूरी तो नहीं.”
अंकित की स्पष्टता से स्नेहा के गाल आरक्त हो गए. एक अजीब-सी मदहोशी उस पर छाने लगी. नीले सूट में उसके सामने बैठा अंकित इस समय उसे किसी कामदेव से कम नहीं लग रहा था. सत्ताइस साल की स्नेहा को लगा कि वह सोलह साल की हो गई है. कैसे जान गया है वह उसके दिल की बात… कहीं वह चेहरा पढ़ने में तो माहिर नहीं…
“याद है मैंने कहा था कि आपको तो हमारी कंपनी में होना चाहिए, तो क्या आप ऐसा चाहेंगी? आई मीन क्या तुम मुझे अपना थोड़ा समय देना पसंद करोगी? बेशक हमारी कंपनी न जॉइन करो, पर मेरे साथ कभी-कभी कहीं बाहर घूमने तो चल ही सकती हो. मुझे अच्छा लगेगा.”
स्नेहा समझ नहीं पा रही थी कि यह सपना है या सच. वह तो ख़ुद अंकित का साथ चाहती है. स्नेहा की आंखों में तैरते प्रश्‍नों को पढ़ अंकित बोला, “अरे यार, परेशान मत हो, टेक योर टाइम. और हमारे बीच हाई क्लास और मिडिल क्लास जैसी बातें नहीं आनी चाहिए. ओके सी यू सून.” अंकित ने हौले से स्नेहा के हाथ को छुआ तो वह सिहर उठी.
मन हुआ कि उसे रोक ले. “तो जाऊं मैं?” उसने ऐसे पूछा मानो कहना चाह रहा हो कि रोक लो मुझे. शब्द मानो चूक गए थे उसके, दिल कह रहा था कि कह दे अपने मन की बात, पर होंठों पर ताले लग गए थे. इंद्रधनुषीय एहसास की बांसुरी मधुर तान छेड़ रही थी.
“चलता हूं.” इस बार अंकित ने उसके गालों पर थपकी दी.
“प्यार को हो जाने दो…” अंकित ने कहते हुए हवा में हाथ लहराया और कैफे से बाहर निकल गया.

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            सुमन बाजपेयी

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