पारुल ने चूल्हे को देखा. धुएं की कल्पना उसके मन में घूम गई. फिर झुंझलाकर बोली, “ये सब केवल लिखने में अच्छा लगता है सुधीर! असल में धुआं झेलना, आंखों में जलन, लकड़ियां सुलगाना यह कोई सुख नहीं है.”
पारुल, जो एक लेखिका थी, मेज़ पर झुकी हुई वह अपने नए लेख पर काम कर रही थी. एक लेख जिसमें वह अपने बचपन के चूल्हे की सोंधी ख़ुशबू और उस आंच में पकी रोटियों की यादों को संजो रही थी. कॉपी में शब्द उतर रहे थे- “चूल्हे की आंच में रोटियों के साथ रिश्तों की गर्माहट भी पकती थी, उस धुएं में मां की ममता की सोंधी ख़ुशबू घुली होती थी...”
लिखते-लिखते वह मुस्कुरा उठी. उसके सामने बचपन का वही आंगन, मिट्टी का चूल्हा, गोबर से लिपी दीवारें और मां के हाथों की गरम रोटियां तैर रही थीं. हर शब्द उसके अंदर पुराने दिनों की सजीव तस्वीरें खींच लाता.
वह सोच रही थी कितनी मीठी ख़ुशबू थी उस धुएं में, कितने सुनहरे दिन थे जब चूल्हे की आंच में घर का अपनापन भी पकता था. तभी दरवाज़ा खुला. सुधीर भीतर आया, थका-हारा, हांफता सा. कपड़े धूल से अटे हुए थे, चेहरे पर दिनभर की थकान की रेखाएं थीं.
“आज भी सिलेंडर नहीं मिला, लगता है कुछ दिन और यही हाल रहेगा.”
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उसने चूल्हा और लकड़ियों की गठरी कमरे में रखते हुए कहा, “अब आगे इसी से काम चलाना पड़ेगा.”
यह सुनते ही पारुल की मुस्कान जैसे बुझ गई. उसने चूल्हे की ओर देखा, फिर अपनी कॉपी को देखा. कुछ पल तक वह चुप रही, फिर बोली, “तो इंडक्शन ले आते, बिजली की तो किल्लत नहीं है.”
सुधीर ने धीरे से हंसते हुए कहा, “तुम्हें क्या लगता है? मैं इंडक्शन लेने नहीं गया. कितनी ही दुकानें छान मारी, लेकिन बढ़ती मांग ने बाज़ार से सारे स्टॉक ख़त्म कर दिए. लकड़ी का चूल्हा ही बचा है अब.”
पारुल ने चूल्हे को देखा. धुएं की कल्पना उसके मन में घूम गई. फिर झुंझलाकर बोली, “ये सब केवल लिखने में अच्छा लगता है सुधीर! असल में धुआं झेलना, आंखों में जलन, लकड़ियां सुलगाना यह कोई सुख नहीं है.”
सुधीर चुपचाप उसे देखता रहा. फिर हल्की सी हंसी के साथ बोला, ''क्यों? तुम ही तो कहती हो कि एक लेखक जो जीता है वही लिखता है, अब तुम जो लिख रही हो वही जी भी लो."
पारुल कुछ पल ठिठकी. कमरे में केवल उनके सांसों की हल्की खनक थी. वह महसूस कर रही थी कि उसके लेख में वह जो सोंधापन दर्शाती थी, वह असल जीवन से बहुत अलग था.
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धीरे-धीरे उसने अपनी कॉपी खोली. कलम उठाई और पन्ने के आख़िरी कोने में लिखा, कहानियों और लेखों में चूल्हा हमेशा सोंधापन देता है. पर असल ज़िंदगी में वही चूल्हा सबसे पहले सच दिखाता है. महक केवल यादों में बची रहती है. धुआं और गर्माहट असल में हमें झकझोर देते हैं!
पारुल ने कलम रख दी. इस बार उसका लेख पूरा हो चुका था और शायद, उसका भ्रम भी.

पूर्ति खरे

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