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कहानी- उपहार (Short Story- Uphaar)

मुझे सुखद आश्चर्य हुआ, "पूजा कहानियां लिखती है? वो तो‌ मोबाइल फोन लिए बैठे रहती है…"
"अरे मां, उसी में तो लिखती हैं भाभी.. और जब कभी मेरा या भइया का लैपटॉप मिल जाता है, उसमें लिखने लगती हैं… उसका बड़ा स्क्रीन होता है ना, आराम रहता है."

"आप लोग भी ना, ये गहने-कपड़े के चक्कर में पड़े हैं… माँ, आज शाम को भाभी के पहले सिंधारे पर आप उन्हें झोला भर किताबें दे दो, ख़ूब ख़ुश हो जाएंगी. पता है पापा, उनको कविताएं, कहानियां पढ़ना और लिखना दोनों बहुत पसंद है… देखा नहीं दिनभर कविताएं, कहानियां लिखती रहती हैं…" इस दुकान से उस दुकान घूमते हुए नेहा ने अचानक ये सुझाव दिया.
मुझे सुखद आश्चर्य हुआ, "पूजा कहानियां लिखती है? वो तो‌ मोबाइल फोन लिए बैठे रहती है…"
"अरे मां, उसी में तो लिखती हैं भाभी.. और जब कभी मेरा या भइया का लैपटॉप मिल जाता है, उसमें लिखने लगती हैं… उसका बड़ा स्क्रीन होता है ना, आराम रहता है."

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ये सब सुनकर ये भी मुस्कुरा दिए, "वैसे बात तो सही कह रही है बिटिया! तुम्हारी चेन, लॉकेट से ज़्यादा ख़ुशी तो उसे किताबें देखकर होगी… अरे बेटा, तुम्हारी मां को भी साहित्य में बड़ी रुचि थी… मुझे याद है कैसे छुप-छुपकर किताबें पढ़ती थी…"
अनजाने में ही सही, लेकिन इनकी बातों से मेरे घाव तो हरे हो ही गए थे. कितना शौक था मुझे, तभी तो मायके से मुंशी प्रेमचंदजी, शरतचंद्रजी की कितनी किताबें लाई थी… ससुराल में ये सब किसी को पसंद नहीं आया. धूल फांकती किताबें ना जाने कब रद्दी वाले के ठेले पर पहुंच गईं, पता ही नहीं चला… आज बहू की रुचि जानकर पांव अपने आप सामनेवाली दुकान की ओर बढ़ गए.
"आज तुम्हारा पहला सिंधारा है पूजा," मैंने टीका लगाते हुए उसका मुंह मीठा कराया, "हमारी ओर से ये सब तुम्हारे लिए…"
साड़ी, मिठाई के साथ उस खास 'उपहार' को देखकर उसकी आंखें फैल गईं.
"मां, लैपटॉप!" पूजा डबडबाई आंखें लिए मेरे पैर छूते हुए बोली, "मुझे बहुत ज़रूरत थी मां इसकी… आपको इतने प्यारे उपहार के लिए थैंक्स कैसे कहूं, बताइए?"

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"बहुत आसान है पूजा," मैं उसके गाल थपथपाते हुए बोली, "क़िस्से-कहानियों में हम सास लोग बहुत बदनाम हैं. एक कहानी किसी सास की तारीफ़ करते हुए लिख देना, मुझे तुम्हारा थैंक्स मिल जाएगा!"

- श्रुति सिंघल

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