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कहानी- आख़री सवाल 1 (Story Series- Aakhari Sawal 1)

क्या न करे? दुनिया… समाज… परिवार… अपनी अस्मिता…अपनी भावनाएं किस-किस से ल़ड़े मानसी और कैसे? कहते हैं, प्रभात का आगमन जीवन के हर अंधेरे को मिटा देता है, सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश होता है, पर क्या मानसी के जीवन में प्रभात का प्रथम आगमन एक नव जीवन की शुरुआत थी?

नहाने के बाद गीले बालों को तौलिए से पोंछकर मानसी ने ड्रेसिंग टेबल पर रखी सिंदूर की डिबिया उठायी. फिर न जाने क्या सोचकर वापस रख दी. आज सुबह से ही उसके मन में हलचल-सी मची हुई थी. उसने आदमकद आईने में अपना अक्स देखा तो आंखों में कुछ सवाल नज़र आए. क्या वो प्रभात के वापस आने पर ख़ुश है? चिरप्रतीक्षित और अभिलाषित चीज़ पाने की ख़ुशी इन आंखों में क्यों नहीं झलकती? क्यों छाया है एक वीरान सन्नाटा? जिसकी प्रतीक्षा में जीवन के पंद्रह बहुमूल्य साल यूं ही गंवा दिए, उसके आने की आहट मन को एक मधुर सिहरन से क्यों नहीं भर देती? क्यों आज वेदना और कुढ़न का आवरण मन पर छाया हुआ है?

मानसी ने दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा. घड़ी की टिक-टिक के साथ समय सरकता जा रहा था… कुछ ही देर में प्रभात यहां पहुंच रहे होंगे. घर में सब कितने उत्साहित हैं. मानो गड़ा ख़ज़ाना मिल गया हो… और मैं? मेरी मनोदशा से किसी को क्या लेना देना…? मानसी ने सोचा.

मानसी के मन में चल रहे बवंडर से अनजान परिवार के लोग प्रभात के स्वागत की तैयारियों में व्यस्त हैं. ऊपर अपने कमरे में अकेली बैठी मानसी ने गौर से आईने में अपना चेहरा निहारा. बालों में स़फेदी कहीं-कहीं से झांकने लगी है. चेहरे में अब वो लावण्य कहां रहा, जो कभी उसे गर्व से भर दिया करता था. गोरा भरा-भरा चेहरा अब सांवला और लंबोतरा-सा लगने लगा है. पिछले वर्ष ही तो पैंतीस वर्ष पूरे किए हैं उसने. क्या उम्र के इस पड़ाव में कोई उस साथी के साथ को सार्थक मान सकता है, जिसने जीवन की शुरुआत में ही दामन छुड़ा लिया हो. जीवन की उमंगें अब मृतप्राय हो चुकी हैं. वैसे भी जीवन की कठोर पाषाणी राह में नितांत एकाकी चलना… टूट कर गिरना… फिर उठना… अपनी हिम्मत से मंज़िल तक पहुंचना, क्या सब के नसीब में होता है..? पर मानसी ने कभी कठिनाइयों में आंसू नहीं बहाए. जीवन की हर विसंगति से लड़ी है वो, तभी तो आज एक मुक़ाम पर है और आज, जीवन के इस मोड़ पर प्रभात का आगमन? मानसी का मन क्षुब्ध हो गया. क्या करे…

क्या न करे? दुनिया… समाज… परिवार… अपनी अस्मिता…अपनी भावनाएं किस-किस से ल़ड़े मानसी और कैसे? कहते हैं, प्रभात का आगमन जीवन के हर अंधेरे को मिटा देता है, सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश होता है, पर क्या मानसी के जीवन में प्रभात का प्रथम आगमन एक नव जीवन की शुरुआत थी?

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मानसी ने फिर से घड़ी की ओर देखा, “चार बजकर तीस मिनट… यानी आधे घंटे में प्रभात यहां होगा. हे ईश्‍वर! मुझे शक्ति दे… ख़ुद से लड़ने की शक्ति… ज़माने से लड़ने की शक्ति… सही निर्णय लेने की शक्ति… अपनी अस्मिता की रक्षा करने की शक्ति…” उसने कांपते हाथों से एक बार फिर सिंदूर की डिबिया उठायी और फिर वापस रख दी. दोनों हथेलियों में चेहरा छिपाकर वो फूट-फूट कर रो पड़ी. न चाहते हुए भी मन विगत की ओर भागा चला जा रहा था.

कितनी गहमागहमी और ख़ुशी का माहौल था मानसी के विवाह के दिन. पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी मानसी सबकी लाड़ली थी. इंटर पास करते ही पिता ने प्रभात के साथ उसका विवाह तय कर दिया था.

“लड़का इंजीनियर है… लाखों में एक… मेरी मानसी के तो भाग खुल गए…” पिता कहते नहीं थकते थे. पर विवाह की रात ही मानसी की पुष्पित आशाओं पर तुषारापात हो गया, जब प्रभात ने सपाट स्वर में उससे कहा, “ये शादी मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ हुई है. वैसे मैं जानता हूं… इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं, फिर भी न चाहते हुए भी मुझे अपने माता-पिता की इच्छा के आगे झुकना पड़ा. अगर मां ने आत्महत्या की धमकी नहीं दी होती तो….”

अवाक मानसी के पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गयी. प्रेम, मनुहार और समर्पण के स्वप्न में खोई मादक आंखों से आंसू बहने लगे. पल भर में सब कुछ बदल गया. उसने भीगी पलकें उठाकर देखा, प्रभात सोफे पर अधलेटा लगातार सिगरेट फूंके जा रहा था. मन की बेचैनी चेहरे पर स्पष्ट थी. मानसी ने धीरे से अपने आंसू पोंछ लिए. ‘कोई बात नहीं, भले ही इनकी मर्ज़ी से शादी नहीं हुई हो, मैं अपने प्रेम से इन्हें वश में कर लूंगी…’ सोचते-सोचते कब उसकी आंख लग गयी, पता ही नहीं चला.

सुबह आंखें खुलीं तो देखा प्रभात कमरे में नहीं थे. संकोचवश वो किसी से कुछ पूछ भी नहीं पायी. पर उसे लगा जैसे घर में एक अजीब-सा सन्नाटा छाया हुआ है. लगता ही नहीं जैसे कल ही नववधू इस घर में आयी हो. घर के हर सदस्य के चेहरे पर एक अजीब-सी चुप्पी थी. पर शाम को मानसी को हर एक प्रश्‍न का जवाब मिल गया, जब उसने अपनी बड़ी ननद को अपनी मां से ये कहते हुए सुना कि प्रभात इस शादी के कारण घर छोड़कर चला गया.

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उसकी सास बैठी रो रही थी और बड़ी ननद बिलखते हुए कह रही थी, “मां, मैंने कहा था न… प्रभात की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कुछ मत करो… वही हुआ जिसका डर था. प्रभात तो बचपन से ही ज़िद्दी है, पर किसी ने मेरी बात नहीं मानी. लाख रोकने पर भी वो चला गया…देखना अब वो शायद ही कभी लौटकर घर आए. न जाने बेचारी मानसी का क्या होगा….?”

डॉ. निरूपमा राय

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