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कहानी- आए तुम याद मुझे 2 (Story Series- Aaye Tum Yaad Mujhe 2)

“मुझे ये पुरानी परंपराएं पसंद नहीं. ये सारी रस्में, रीति-रिवाज़ हम नारियों को ग़ुलाम बनाए रखने की साजिश थीं, पर आज की मुक्त नारी इन सब बेड़ियों को तोड़कर बिंदास जीवन जी सकने में सक्षम है. मैं एक फ्रेंड के साथ रिलेशनशिप में थी, पर ब्रेकअप हो गया.” वो ऐसे लापरवाही से बोली, जैसे ब्रेकअप की नहीं, मोबाइल फोन बदलने की बात कर रही हो. वैसे मैं आजकल की जीवनशैली से अनभिज्ञ तो नहीं हूं, पर ये क्रश, लिव इन, डेटिंग, ब्रेकअप जैसी चीज़ें  अजनबी ही लगती हैं. हमारे समय में तो लव मैरिज ही रोमांचकारी लगती थी.

उर्वशी की कोई नियमित दिनचर्या नहीं थी. कभी देर रात आना, तो कभी दो-तीन दिन न आना. मैं अपनी ओर से रिज़र्व रहता या औपचारिक-सी बातें ही करता, हालांकि मेरी इच्छा उससे ढेरों बातें करने की होतीं. दरअसल, वो ख़ुद बहुमुखी प्रतिभा की धनी कलाकार तो थी ही, उसकी शख़्सियत भी बेहद दिलचस्प थी. पिछले हफ़्ते वो कुछ उलझन में थी. उसे चाय पर विज्ञापन बनाना था, जो युवाओं को आकृष्ट कर सके. मैंने उसे आइडिया बताया, तो वो चहक उठी.

अगले दिन उसने बताया कि हम आपके आइडिया पर विज्ञापन बना रहे हैं. इसके बाद जब उसे समय मिलता, तो हम साथ बिताते. ज़्यादातर वो ही मेरे फ्लैट में आती, जाने क्यों मुझे उसके घर जाने में हिचक-सी होती थी.

एक दिन विवाह की बात पर वो हंसते हुए बोली, “मुझे ये पुरानी परंपराएं पसंद नहीं. ये सारी रस्में, रीति-रिवाज़ हम नारियों को ग़ुलाम बनाए रखने की साजिश थीं, पर आज की मुक्त नारी इन सब बेड़ियों को तोड़कर बिंदास जीवन जी सकने में सक्षम है. मैं एक फ्रेंड के साथ रिलेशनशिप में थी, पर ब्रेकअप हो गया.” वो ऐसे लापरवाही से बोली, जैसे ब्रेकअप की नहीं, मोबाइल फोन बदलने की बात कर रही हो. वैसे मैं आजकल की जीवनशैली से अनभिज्ञ तो नहीं हूं, पर ये क्रश, लिव इन, डेटिंग, ब्रेकअप जैसी चीज़ें  अजनबी ही लगती हैं. हमारे समय में तो लव मैरिज ही रोमांचकारी लगती थी.

हालांकि मेरी और उसकी आयु में क़रीब पच्चीस वर्ष का अंतर होगा, परंतु मैं एक अजीब आकर्षण-सा महसूस करने लगा था. कभी ख़ुद से पूछता, क्या वो भी ऐसा ही सोचती होगी? वैसे मैं अभी भी स्मार्ट ही हूं और एक दिन उर्वशी भी यूं ही बोली थी कि मैं अभी पचास का भी नहीं लगता हूं. उसका व्यक्तित्व, चुंबकीय आकर्षण, बिंदास अंदाज़, आधुनिक जीवनशैली मुझे सम्मोहित करते ही, उसकी रोमांचकारी बातें भी लुभातीं. उर्वशी न किसी औपचारिक संबोधन का प्रयोग करती, न नाम से बुलाती, न अंकल वगैरह कहती. मैं उससे दूर होने से भी डरने लगा था, पर ऐसा भी नहीं कि मैं उसे अपना बनाना चाहता था. मैं ख़ुद नहीं जानता था कि मैं क्या चाहता था. शायद इसका कारण यही था कि मैं न तो बख़ूबी समझ पाया था कि वो क्या चाहती है और इस ख़्वाब के टूटने से डरता था, इसलिए इतने रिश्ते से ही ख़ुश था.

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वाक़ई कुछ अनाम रिश्ते होते हैं, जो हमें बांधते नहीं, बल्कि आज़ाद करते हैं, जिनसे हमारा अधूरापन तो पूरा होता ही है, कल्पनाशक्ति, सृजनशीलता, बौद्धिक क्षमता, मानसिक उर्वरता को नए आयाम मिलते हैं. जाने कितने वर्षों बाद आज फिर कमरे में अंधेरा कर सोफे पर लेटकर ईयरफोन लगाया और मेरा प्रिय गाना गूंजने लगा. आये तुम याद मुझे, गाने लगी हर धड़कन, ख़ुशबू लाई पवन… महका चंदन… किसी जादुई एहसास से मैं युवावस्था में पहुंच गया, जब मैं यह गाना निशा के लिए गाता था और आज? कह नहीं सकता. सोच रहा हूं तन और मन दोनों की अपनी आवश्यकताएं, आकांक्षाएं और मांग होती हैं. तन को तो समझाया और बहलाया जा सकता है या मांग पूरी की जा सकती है, लेकिन मन? मन हमें कितना बेबस कर देता है, अब अनुभव हुआ. मन को बहलाना-भरमाना आसान नहीं होता. आज मैं अपने ही मन से हार रहा हूं. जाने क्यों वो छवि देखने लगा, जिसे कब का भूल चुका या भुला चुका था. कई बार मन में राख के नीचे दबे अंगारे को कोई जाने-अनजाने हवा दे देता है. वो मरहम न बन सके, पर पुरानी चोट ताज़ा कर देता है. ऐसे ही उर्वशी मेरे मन की सुप्त कामनाओं को जाने-अनजाने जगाने लगी थी.

मैंने पुनर्विवाह के बारे में सोचा नहीं था, इसलिए नहीं कि भारतीय समाज और परिवेश में संभव नहीं या साथी की आवश्यकता नहीं थी, पर साथी तो हो. मुझे नहीं लगता था कि कोई निशा की जगह ले पाएगी, क्योंकि पच्चीस-तीस वर्ष साथ रहकर बने पति-पत्नी के रिश्ते का स्थान कोई ले ही नहीं सकता.

दीर्घकाल के संवाद, तालमेल, नोक-झोंक, कहे-अनकहे वादे, पारस्परिक समझ, कहा-सुनी, सामंजस्य, दैहिक संबंध, अंतरंगता, साथ बिताए लंबे जीवन से बने संबंध वृद्धावस्था में प्रेम का आधार होते हैं. वानप्रस्थ बेला में एक-दूसरे के साथ रहने, बातें करने, सुख-दुख बांटने का अलौकिक आनंद युवावस्था में नहीं समझा जा सकता. इस उम्र में किसी को पत्नी बनाकर मकान में लाया जा सकता है, पर घर या दिल में नहीं. ऐसा रिश्ता बहुत औपचारिक-सा लगता है,  जैसे- हॉस्टल में किसी रूममेट के साथ रह रहे हों, इसलिए मैंने पुनर्विवाह नहीं किया था.

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उर्वशी कॉफी बना चुकी होगी, यह सोचकर उसके घर पहुंचा. कॉफी का मग उठाकर मैंने कहा, “आज बहुत ख़ुश लग रही हो?”

“वजह जानकर आप मुझसे ज़्यादा ख़ुश हो जाएंगे.” उर्वशी के रहस्यभरे वाक्य से मेरी धड़कनें बढ़ने लगीं कि वो क्या बताने वाली है.

Anoop Srivastava

   अनूप श्रीवास्तव

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