कहानी- असंतुलित रथ की हमसफ़...

कहानी- असंतुलित रथ की हमसफ़र 4 (Story Series- Asantulit Rath Ki Humsafar 4)

हर बीतते दिन के साथ रवीश की बांहों का घेरा कसता ही चला जा रहा था. दीपा को लेकर वह ज़रूरत से ज़्यादा पजेसिव होता जा रहा था. वह उसे हर समय अपने आस-पास ही देखना चाहता था. किसी दूसरे पुरुष से उसका शिष्टाचारवश भी बात करना उसे बर्दाश्त न होता. दीपा की समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह उसका प्यार है या असुरक्षा की भावना. उसे अपनी स्थिति ख़ूबसूरत पिंजरे में क़ैद पक्षी की तरह महसूस होने लगी थी.

 

… प्लेटफार्म पर नीचे उतरने के बाद दीपा ने कहा, ‘‘हमारे बरेली में ज़्यादातर रिक्शे ही चलते हैं, लेकिन अब तुम बेरोज़गार नहीं रहे, इसलिए हम टैक्सी से घर चलेगें. उसे बुक कर लो.’’
‘‘मैं तुम्हारे घर चल रहा हूं?’’ रवीश का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा.
‘‘नहीं’’ दीपा ने सिर हिलाया.
‘‘क्या?’’ रवीश का उत्साह झाग-सा बैठ गया.
‘‘मुझे अपने घर ले चलने की तैयारी करो.’’ दीपा पलकों को नीचा करते हुए मुस्कराई.
‘‘ओह, तुमने तो मेरी जान ही निकाल दी थी.’’ रवीश ने अपने बैग के साथ दीपा का सूटकेस उठाया और गेट की ओर दौड़ पड़ा. मानो डर रहा हो कि दीपा कहीं अपना इरादा न बदल दे.
रवीश से मिलने के बाद प्रखर भैया तो रिश्ते के लिए राजी हो गए, लेकिन मां के मन में कुछ हिचकिचाहट थी. उनका कहना था कि एक दिन की मुलाक़ात में किसी आदमी के बारे में इतना बड़ा फ़ैसला लेना ठीक नहीं होगा.
‘‘थ्रू आउट फर्स्ट क्लास, गोल्ड मेडिलिस्ट, पी.एच.डी., डिग्री काॅलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर, इससे अच्छा लड़का कहां मिलेगा?’’ दीपा ने मम्मी के गले में हाथ डाला, फिर इठलाते हुए बोली, ‘‘रवीश एक ही मुलाक़ात में अपनी शराफ़त का परिचय दे चुका है और मेरे लिए इतना ही काफ़ी है.’’
दीपा की इच्छा देख मम्मी भी मान गईं. यह तय हुआ कि प्रखर भैया और हेमा भाभी, रवीश के साथ उसके घर जाएंगे. अगर उसके मम्मी-पापा इस रिश्ते के लिए राजी हुए तो शादी कर दी जाएगी.
उच्च-शिक्षित बहू के नाम पर रवीश ने अपने मम्मी-पापा को राजी कर लिया. प्रखर ने इधर-उधर से भी रवीश के बारे में पूछताछ की. संतुष्ट होने पर धूमधाम से उनकी शादी हो गई.
दीपा ने जितना सोचा था रवीश उससे कहीं ज़्यादा प्यार करता था उससे. दीपा की हर दिन होली और हर रात दीवाली हो गई थी. रवीश के प्यार में डूबी वह अपनी क़िस्मत पर इतराती रहती. धीरे-धीरे छह माह कब बीत गए पता ही नहीं चला. एक दिन अख़बार में बलरामपुर के पड़ोसी जिले गोंडा के एक विद्यालय में प्रवक्ता की रिक्ति निकली थी. दोनों शहरों के बीच केवल 40 कि.मी. की दूरी थी.
दीपा ने वहां आवेदन भरने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की, तो रवीश उसकी पलकें चूमते हुए बोला, ‘‘अभी तो हमारा हनीमून पीरिएड भी ख़त्म नहीं हुआ है. ये पल दोबारा नहीं आएंगे, इन्हें भरपूर जी लो, नौकरी के लिए तो पूरा जीवन पड़ा है.’’

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ख़ुशी से भर दीपा किसी बेल की तरह लिपट गई थी रवीश के चौड़े सीने से. रवीश ने भी उसे अपनी बांहों के घेरे में भर लिया था. किंतु दीपा की यह ख़ुशी ज़्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी. हर बीतते दिन के साथ रवीश की बांहों का घेरा कसता ही चला जा रहा था. दीपा को लेकर वह ज़रूरत से ज़्यादा पजेसिव होता जा रहा था. वह उसे हर समय अपने आस-पास ही देखना चाहता था. किसी दूसरे पुरुष से उसका शिष्टाचारवश भी बात करना उसे बर्दाश्त न होता.
दीपा की समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह उसका प्यार है या असुरक्षा की भावना. उसे अपनी स्थिति ख़ूबसूरत पिंजरे में क़ैद पक्षी की तरह महसूस होने लगी थी. इस बीच बीमारी के कारण मां भी साथ छोड़ कर चली गई थीं. तब वह बरेली गई थी, लेकिन चाह कर भी किसी को कुछ बता नहीं पाई. बताती भी क्या? कि रवीश उसे इतना प्यार करता है कि अपनी जान से भी ज़्यादा महफूज़ रखना चाहता है? किंतु यह तो कोई अपराध न था…

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…


संजीव जायसवाल ‘संजय’

 

 

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