कहानी- बाजूबंद ४ (Story Series- ...

कहानी- बाजूबंद ४ (Story Series- Bajuband 4)

 

“देखो कल की पिक्स पर कितने लाइक्स और कमेंट्स आए हैं!” मैं मुस्कुरा दी. खींची गई फोटोज़ उसी दिन फेसबुक पर अपलोड करना राकेश का प्रिय शग़ल रहा है. इस विचार के साथ ही कुछ स्मृतियां फिर से दिमाग़ में कौंध गईं. मूड ख़राब हो इससे पूर्व ही मैं बाथरूम में घुस गई. दो बार आंखेें धो लेने पर भी स्मृतियां आंखों से बाहर निकलने का नाम नहीं ले रही थीं.

 

 

 

 

 

इस घर में ब्याहकर आने के बाद से राकेश के व्यक्तित्व की एक महत्वपूर्ण ख़ूबी बड़प्पन शनेैः शनेैः मेरे व्यक्तित्व का भी एक अंग बनती चली गई थी. आरंभ में सास की टोका-टाकी, सुमन की ईर्ष्या, कामचोरी मुझे खिजाते थे. निःसंतान होने का दुख रूलाता था. फिर मुझे लगने लगा कोई बदलनेवाला नहीं है. मेरे वश में कुछ है, तो वह है ख़ुद को बदलना. मैंने सब ओर से ध्यान हटाकर ख़ुद को शोधकार्य में डुबो डाला. डिग्री हासिल कर अध्यापन में तल्लीन हो गई. अब मुझे कोई चीज़ परेशान नहीं करती थी.
सवेरे आंख खुली, तो राकेश को प्रफुल्लित मूड में पाया.
“देखो कल की पिक्स पर कितने लाइक्स और कमेंट्स आए हैं!” मैं मुस्कुरा दी. खींची गई फोटोज़ उसी दिन फेसबुक पर अपलोड करना राकेश का प्रिय शग़ल रहा है. इस विचार के साथ ही कुछ स्मृतियां फिर से दिमाग़ में कौंध गईं. मूड ख़राब हो इससे पूर्व ही मैं बाथरूम में घुस गई. दो बार आंखेें धो लेने पर भी स्मृतियां आंखों से बाहर निकलने का नाम नहीं ले रही थीं.

 

 

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उस दिन भी फेसबुक ऑन किया, तो गूगल द्वारा अपलोड आठ वर्ष पूर्व की स्मृतियां ताज़ा हो उठी थीं. मां-बाउजी के लखनऊ प्रवास की प्यारी-सी तस्वीरें बाउजी को दिखाने मैं उनके कक्ष में चली गई थी. मांजी के जाने के बाद बाउजी बहुत गुमसुम रहने लगे थे. तस्वीरें देखकर उनका मन बहल जाता था.
“यह आपके सिरहाने काग़ज़ कैसा बाउजी?”
“पिछली बार ग्वालियर गया, तो बैंक के अकांउटेंट से लॉकर हैंडलिंग की जेरोक्स ले आया था.”
मैं उनका मंतव्य समझ गई थी.
“भूल जाइए न बाउजी उस बाजूबंद को. एक निर्जीव चीज़ से क्यों इतना मोह?”
“मोह उससे नहीं तेरी मांजी से है. उस दिन भी वे एक ही बात बोलकर हमेशा के लिए ख़ामोश हो गई थीं.”
“क्या?”
“उन्होंने कहा था मुझे अच्छे से याद है बाजूबंद मैंने लॉकर में ही रखा था. जिस बाजूबंद में मेरी प्राण के प्राण बसे थे उसे तो मैं खोजकर ही दम लूंगा.”
काग़ज़ पर सरसरी निगाह दौड़ाते मेरी नज़रें एक तारीख़ पर अटक गई थीं. 12 मार्च 2009? आज की तारीख़?
“उस दिन तो आप यहां लखनऊ में थे. मैं आपको उस दिन की ही तो तस्वीरें दिखा रही हूं. फिर उस दिन आप ग्वालियर में लॉकर कैसे ऑपरेट कर सकते हैं?” बोलने के साथ ही मुझे एहसास हुआ कि अनजाने ही मैंने देवरजी को कठघरे में खड़ा कर दिया था.
“कुछ डेट्स गड़बड़ हो गई दिखती हैं.” कहकर मैं वहां से खिसक ली थी.
लेकिन आज सुकेश भैया की आत्मस्वीकृति के बाद मुझे विश्‍वास हो गया था कि यह अवश्य उसी दिन हुआ होगा. सुकेश भैया ने मुझ पर विश्‍वास कर सब स्वीकार किया है. यदि मैं राकेश को सच्चाई बता दूं, तो सुकेश भैया हमेशा के लिए उनकी नज़रों से गिर जाएंगे. शायद वे उन्हें घर से बेदख़ल कर दें, पर उससे होगा क्या? ख़ुद टूट जाएंगे, दुखी रहने लगेंगे. तब क्या मैं ख़ुश रह पाऊंगी? वैसे भी इस घर को जोड़े रखने का श्रेय राकेश ने मुझे दिया है. लेकिन राकेश को बाजूबंद के बारे में बताऊंगी क्या?.. कुछ सोचना होगा.
आंखें पोंछते मैं बाथरूम से बाहर निकली, तो राकेश के हाथ में वही लाल मखमली डिब्बा देख मेरे प्राण सूख गए.

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

संगीता माथुर

 

 

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