कहानी- बेवफा 3 (Story Serie...

कहानी- बेवफा 3 (Story Series- Bewafa 3)

“तुम्हारे घरवाले तुम दोनों के रिश्ते के बारे में जानते हैं?” मैंने ही पूछा था और आगे जोड़ दिया, “जानने के बाद क्या इसे स्वीकार कर पाएंगे?” 

“कतई नहीं.” मेरे सवाल का उसने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया.
“फिर इतना बड़ा जोखिम तुम लोग किस आधार पर ले रहे हो?” मैंने उसे कुरेदने का प्रयास किया.
“अभी सोचा नहीं.” फिर उसने संक्षिप्त-सा जवाब दिया.
“अरे, इतना बड़ा फ़ैसला ले लिया और कह रही हो अभी सोचा नहीं.”

मामला काफ़ी गंभीर था, लिहाज़ा मैं उनके संबंधों की गंभीरता पर सोचने लगा. मेरे लाख समझाने के बावजूद कुंडल अपने फ़ैसले पर आडिग रहा. दरअसल, उसने सारी योजना बहुत पहले ही बना डाली थी, सो मेरे समझाने का कुछ असर नहीं होने वाला था. ऐसे में उसकी बात मानना मेरी मजबूरी हो गई. मुझे भी लगा, अगर मैंने अब भी कुछ कहा, तो कुंडल उसका केवल नकारात्मक अर्थ ही निकालेगा. इसलिए मैं चुप कर गया और उसकी हां में हां मिलाने लगा.
मैं उस कस्बे में भी गया, जहां एमबीबीएस करने के बाद कुंडल प्रैक्टिस करता था. कस्बा क्या, एक देहाती बाज़ार था. जौनपुर मुख्यालय से 20-25 किलोमीटर दूर. थोड़े ही समय में कुंडल ने अपनी क़ाबिलियत की बदौलत वहां काफ़ी जान-पहचान बना ली थी. पूरा का पूरा बाज़ार उमड़ पड़ता था उसकी क्लिनिक में. सुबह-शाम मरीज़ों की लंबी भीड़ रहती थी. शाम को शबाना कुंडल के कमरे पर आ गई. कुंडल ने मुझसे मिलवाया और हम दोनों का परिचय करवाया. शबाना इतनी ख़ूबसूरत थी कि कोई भी देखते ही दिल दे बैठे. मेरे पास बैठ गई थी. बातचीत से लगा वह काफ़ी समझदार है. ब्यूटी विद ब्रेन.
वह काफ़ी सुलझी और गंभीर क़िस्म के विचारोंवाली लगी. उसने ही बताया कि बीजेडसी यानी बॉटनी जुलॉजी और केमिस्ट्री से बीएससी कर चुकी है और एमएससी में दाख़िला ले लिया है. एमएससी की पढ़ाई शुरू होनेवाली है.
“तुम्हारे घरवाले तुम दोनों के रिश्ते के बारे में जानते हैं?” मैंने ही पूछा था और आगे जोड़ दिया, “जानने के बाद क्या इसे स्वीकार कर पाएंगे?”
“कतई नहीं.” मेरे सवाल का उसने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया.
“फिर इतना बड़ा जोखिम तुम लोग किस आधार पर ले रहे हो?” मैंने उसे कुरेदने का प्रयास किया.
“अभी सोचा नहीं.” फिर उसने संक्षिप्त-सा जवाब दिया.
“अरे, इतना बड़ा फ़ैसला ले लिया और कह रही हो अभी सोचा नहीं.”
“मैं बालिग हूं. कुंडल भी वयस्क हैं, लिहाज़ा क़ानून हमारी मदद करेगा. हमें अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ रहने और जीवनसाथी चुनने की इजाज़त हमारा संविधान भी देता है.” शाबाना एक सांस में बोल गई.
मैं हंसने लगा. उस समय उनकी नादानी पर हंसने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता था.
“आप हंस रहे हैं?”

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“शबाना तुम तो समझने का प्रयास करो. यहां सवाल संविधान या क़ानून का है ही नहीं. यहां सवाल तो उस समाज का है, जिसमें तुम दोनों रहते हो. समाज की बात छोड़ भी दो, तो मुझे लगता है तुम दोनों के रिश्ते को तुम दोनों का परिवार ही नहीं क़बूल करेगा, ख़ासकर तुम्हारा परिवार तो यह कतई स्वीकार नहीं करेगा कि तुम किसी हिंदू लड़के से शादी करो.”
“मुझे परिवार की चिंता नहीं है. मैं जीवन में ख़ुश रहना चाहती हूं. अपने मनपसंद साथी के साथ ही सारा जीवन गुज़ारना चाहती हूं. मैं किसी के मामले में दख़ल नहीं देती, तो कोई मेरे मामले में दख़ल न दे.”
“तुम जितना आसान समझ रही हो, यह सब उतना आसान नहीं है, इसलिए अभी समय है. कोई भी क़दम काफ़ी सोच-समझकर उठाओ. तुम दोनों को भविष्य में आनेवाले ख़तरे को कतई नहीं भूलना चाहिए.”
बड़ी देर तक हमारे बीच चुप्पी ही रही…

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

Harigovind Vishwakarma
हरिगोविंद विश्वकर्मा

 

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