कहानी- घुटन 4 (Story Series- Ghutan 4)

“वो नहीं आएगी अमित. शायद ग़लती मेरी ही है. अपनी लाइफ़स्टाइल में इतनी खो गयी थी मैं कि यह भी न जान पाई कि मेरी बेटी का अस्तित्व कब, कहां और कैसे मेरी वजह से दबता जा रहा है. दुनिया के लिए एक आदर्श बन गयी मैं, लेकिन अपनी बेटी के लिए आदर्श मां न बन सकी. शायद मैंने महसूस भी नहीं किया होगा कि मेरी बेटी को भी अपनी पहचान बनानी है, मेरी आवाज़ के बगैर. वह सिर्फ़ मेरी बेटी के रूप में नहीं, निशा के रूप में भी पहचानी जानी चाहिए और यह काम तुम्हें करना है. मैं तो शायद ही वापस आऊं, लेकिन तुम मुझे उसकी ख़बर देते रहना. अब मैं चलती हूं.”

 

“इसकी वजह भी आप ही हैं. बचपन से लेकर आज तक हर जगह आपने अपनी बेटी की भावनाओं को आहत किया है. जो इंसान अपनी बीवी के लिए थोड़ा व़क़्त नहीं निकाल पाता था, वह आपके लिए बड़ी-बड़ी पार्टी देने लगा. जो बच्चे अपनी मां से एक पल के लिए भी जुदा नहीं होते थे, आपके आते ही अपनी मां को याद ही नहीं करते. आपने सब कुछ तो छीन लिया है. पर अब और नहीं अमित. मुझे अपनी जगह चाहिए. अपना हक़, अपना अस्तित्व और अब कोई आनंदी मैं बर्दाश्त नहीं करूंगी.”

न तो अमित कुछ बोल पाये और ना ही आनंदी. दोनों एक-दूसरे को ताकते रहे.

अगली सुबह सब कुछ शांत था. टैक्सी आ चुकी?थी. आनंदी का सामान उसमें रखा जा रहा था. निशा अभी तक अपने कमरे में बंद थी. अमित भी उसे बुला-बुला कर हार चुका था. आनंदी सारी परिस्थिति समझ चुकी थी.

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“वो नहीं आएगी अमित. शायद ग़लती मेरी ही है. अपनी लाइफ़स्टाइल में इतनी खो गयी थी मैं कि यह भी न जान पाई कि मेरी बेटी का अस्तित्व कब, कहां और कैसे मेरी वजह से दबता जा रहा है. दुनिया के लिए एक आदर्श बन गयी मैं, लेकिन अपनी बेटी के लिए आदर्श मां न बन सकी. शायद मैंने महसूस भी नहीं किया होगा कि मेरी बेटी को भी अपनी पहचान बनानी है, मेरी आवाज़ के बगैर. वह सिर्फ़ मेरी बेटी के रूप में नहीं, निशा के रूप में भी पहचानी जानी चाहिए और यह काम तुम्हें करना है. मैं तो शायद ही वापस आऊं, लेकिन तुम मुझे उसकी ख़बर देते रहना. अब मैं चलती हूं.” आनंदी कुछ पल के लिए रुकी और फिर चल दी. निशा खिड़की से उन्हें जाते हुए देख तो रही थी, लेकिन उन्हें रोक नहीं पायी.

अगला दिन नयी उमंग से भरा था. अब कुछ भी बोर नहीं करता था. घर हो या बाहर,  निशा को दुनिया में अपनी पहचान महसूस होने लगी थी. आख़िर दिल में बसा इतने सालों का सारा गुबार बाहर जो निकल गया था. अब वह घुटन के एहसास से मुक्त जो थी.

– अंकुर सक्सेना

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