कहानी- गुनहगार 1 (Story Se...

कहानी- गुनहगार 1 (Story Series- Gunahgaar 1)

मन के संशय को मिटाने की कोई सूरत खोज ही रहे थे कि आकाश ने खिड़की की ओर इशारा करते हुए धीरे-से पुकारा, “धरा, इधर देखो वह खिड़की बंद करना भूल गई है.” मैंने जल्दी से खिड़की के पास पहुंचकर अंदर नज़रें जमा दीं.

मगर उस जानलेवा दृश्य को देखने के बाद मेरी स्थिति ऐसी हो गई मानो शरीर का एक-एक बूंद ख़ून किसी ने निचोड़ लिया हो. अंदर शीशे के सामने खड़ी होकर चेहरे पर ढेर सारा पाउडर लगा मेघना ज़ोर-ज़ोर से हंस रही थी और बुदबुदाती जा रही थी, “मैं मम्मी से ज़्यादा गोरी… उनसे भी ज़्यादा सुंदर! अब मम्मी मुझे ज़रूर प्यार करेंगी.” मुझे ब्रह्माण्ड घूमता हुआ प्रतीत हो रहा था.

”मेघना की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है डॉक्टर. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि उसे क्या हो गया है?” शहर के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. निरुपमा के केबिन में मैं लगभग गिड़गिड़ा उठी.

“मेरी बेटी को अच्छा कर दो नीरू…” नीरू यानी कि निरुपमा, मेरी बचपन की सहेली, शहर की सफल सायकियाट्रिस्ट और मेरी हमदर्द.

मेरी ओर प्यार से देखते हुए निरुपमा ने कहा, “धैर्य रखो धरा, रोज़ इससे भी पेचीदा केस मेरे पास आते हैं. पहले तुम शांत हो जाओ. फिर विस्तार से सारी बात बताओ.” पानी का ग्लास मेरे हाथों में थमाते हुए उसकी आंखों में जो यक़ीन मैंने देखा, उससे ख़ुद को काफ़ी संभली हुई स्थिति में पाकर मैं थोड़ा सामान्य हुई.

“कुछ अजीब होती जा रही है हमारी मेघना. बात करो, तो काट खाने को दौड़ती है. कभी अपने पापा की ज़रूरी फ़ाइल फाड़ देती है, तो कभी मेरी क़ीमती साड़ियों पर जान-बूझकर इंक गिरा देती है. समझ में नहीं आता कि वह ऐसा क्यों करती है? मुझसे या आकाश से ऐसा व्यवहार करती है, जैसे हम लोग उसके दुश्मन हों.”

“हूं… क्या उम्र है अभी उसकी?” निरुपमा ने बीच में मुझे रोका.

“चौदह साल.” मैंने उत्तर दिया.

“मगर बहुत गंभीर और शांत रहती है. अपने हमउम्र साथियों के बीच वह ऐसी लगती है जैसे उनसे बहुत बड़ी हो. हम तरस गए हैं उसके बचपने को. न कभी कोई शरारत करती है, न कोई मांग, न प्यार जताती है, न नाराज़गी… बस हर व़क़्त ऐसी हरकतें करती है, जिससे मुझे और आकाश को परेशानी हो और इस परेशानी देने के प्रयोजन के पीछे ही मानो उसकी असली ख़ुशी हो. बहुत ख़ुश तो वो कभी होती ही नहीं. उसकी हर इच्छा ज़ाहिर करने से पहले ही आकाश उसकी हर ज़रूरत को पूरा करते रहते हैं, लेकिन उस पर तो जैसे कोई असर ही नहीं होता…” लगातार कहते हुए मैं हांफने लगी, तो नीरू ने फिर से मुझे पानी पीने का इशारा किया. पानी पीकर अब मैं थोड़ा शांत हो गई, क्योंकि मन का थोड़ा गुबार जो निकल गया था.

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“इन सब बातों से परेशान होकर मैं अक्सर टूट जाती हूं. लेकिन हर बार आकाश मुझे ये भरोसा दिलाते रहते हैं कि जो बच्चे बचपन में अधिक परेशान करते हैं, वो बड़े होकर उतने ही समझदार बनते हैं. मगर कल रात की घटना ने तो उन्हें भी सकते में डाल दिया. हम लोगों ने तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा, फिर हमारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है नीरू? किस बात की सज़ा मिल रही है हमें.” और मैं बिलख पड़ी. काफ़ी देर तक मेरा रोना नहीं थमा, तो निरुपमा कुर्सी से उठकर मेरे क़रीब आकर बोली, “चुप हो जाओ धरा, हिम्मत हारने से तो समस्या सुलझने के बजाए और उलझती है. कल रात क्या हुआ था?” जवाब देते व़क़्त बड़ी मुश्किल से मैंने अपनी रुलाई रोकी. भरी आंखों और बोझिल आवाज़ से मैंने बीती रात का वाकया सुना दिया.

थोड़ी देर के लिए माहौल एकदम शांत-सा हो गया. तूफ़ान के गुज़र जाने के बाद की शांति व्याप्त हो गई थी. निरुपमा के माथे पर बल पड़ गए, फिर भी संयत और दृढ़ स्वर में उसने शांति भंग की, “कल तीन बजे मेघना को लेकर मेरे पास आना. और हां, उसे इस बात की बिल्कुल भनक भी मत लगने देना कि तुम उसे मेरे पास क्यों ला रही हो? इसके बाद निरुपमा ने मुझे दो-तीन बातें और समझाईं. चलते व़क़्त मुझे हिम्मत बंधाते हुए बोली, “विश्‍वास रखो, सब ठीक हो जाएगा.” केबिन से निकलकर मैं कार में आकर बैठ गई. कार घर की ओर चल पड़ी और मेरा मन पीछे भागने लगा.

कल रात आकाश से बातें कर रही थी कि ‘खट्’ की आवाज़ ने हम पति-पत्नी दोनों को चौंका दिया. “अरे, मेघना ने अपने कमरे का दरवाज़ा क्यों बंद कर लिया. बंद कमरे में तो वो कभी सोती नहीं.” कहते हुए आकाश मेघना के कमरे की ओर बढ़े. मैं भी घबरा-सी गई. ‘क्या करूं? खटखटाने पर जाने कैसे रिएक्ट करेगी मेघना?’ मन के संशय को मिटाने की कोई सूरत खोज ही रहे थे कि आकाश ने खिड़की की ओर इशारा करते हुए धीरे-से पुकारा, “धरा, इधर देखो वह खिड़की बंद करना भूल गई है.” मैंने जल्दी से खिड़की के पास पहुंचकर अंदर नज़रें जमा दीं.

मगर उस जानलेवा दृश्य को देखने के बाद मेरी स्थिति ऐसी हो गई मानो शरीर का एक-एक बूंद ख़ून किसी ने निचोड़ लिया हो. अंदर शीशे के सामने खड़ी होकर चेहरे पर ढेर सारा पाउडर लगा मेघना ज़ोर-ज़ोर से हंस रही थी और बुदबुदाती जा रही थी, “मैं मम्मी से ज़्यादा गोरी… उनसे भी ज़्यादा सुंदर! अब मम्मी मुझे ज़रूर प्यार करेंगी.” मुझे ब्रह्माण्ड घूमता हुआ प्रतीत हो रहा था. मुझे एक ओर करके आकाश ने अंदर झांका तो वह भी कांप उठे. मेघना बिल्कुल पागलों की तरह व्यवहार कर रही थी. मैं गश खाकर गिरने ही वाली थी कि आकाश ने मुझे सहारा दिया और कमरे में ले आए.

– वर्षा सोनी

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