कहानी- हैप्पीवाला न्यू ईयर ...

कहानी- हैप्पीवाला न्यू ईयर 2 (Story Series- Happywala New Year 2)

“आज आप रिश्ते को बिल्कुल ही अलग तरह से परिभाषित कर रही हो. मुझे लगता है कि पापा भी तो आपके या मेरे साथ जो बॉन्डिंग होनी चाहिए, उसे मिस करते होंगे. उन्हें वह फीलिंग नहीं आती, तभी तो दोस्तों का साथ ढूंढ़ते हैं. जहां तक मैंने समझा है, आप हमेशा उन्हें ही कठघरे में खड़ा करती आई हो. आपको लगता है कि वे हमेशा ग़लत होते हैं. वे बुरे पति और पिता हैं. आपने जिस तरह की छवि मेरे सामने पेश की, मैंने उसी तरह उनसे व्यवहार किया. न ही उन्हें अपने समीप आने दिया, न ही उनके क़रीब जाने की कोशिश की.” काव्या पूरी तरह से असमंजस में थी.

काव्या पर उसने सारा ध्यान केंद्रित कर दिया और केशव से उम्मीद करना छोड़ दिया. समझौता करना नियति मान लेना उसकी बड़ी भूल थी. उसे कुछ तो प्रयास करने चाहिए थे. अपने हक़ की लड़ाई लड़नी चाहिए थी. काव्या के अधिकार के लिए केशव से सवाल-जवाब करने चाहिए थे. केशव ने जैसा कहा, वह करती रही और अब जब उसकी यह आदत कठोरता की ज़मीन पर खड़ी हो चुकी है. वह उसके बदलने की उम्मीद नहीं कर सकती.

ग़लती तो उसकी भी है, वह चमत्कार पर अब विश्‍वास नहीं करती है. अब इतने वर्षों बाद उसे नहीं लगता कि वह केशव से अलग होने की बात सोच भी सकती है. बस, काव्या को लेकर परेशान रहती है. उसकी छोटी-छोटी ख़ुशियों पर भी सेंध लगाने से नहीं चूकता केशव. अच्छी बात तो यह है कि वह दोनों एक-दूसरे के साथ जीते हुए ख़ुश रहती हैं और सपनों व उत्साह में पंख जोड़ती ही जाती हैं. केशव का जब मन करता है, तो कुछ पल उनके साथ जी लेता है, पर ऐसा विरले ही होता है.

कभी-कभी उर्मि को लगता है कि वह अपने को बेवजह धुंध की चादर में लपेटकर रखता है. सूरज की एक किरण को अपने तक नहीं आने देता. बचपन में जब काव्या ‘पापा’ कहकर उसकी बांहों में झूलती थी, तो वह कितना दुलारता था उसे. उसके नन्हें हाथों को चूम लेता था और घोड़ा भी बन जाता था. प्यार और स्नेह तो उसकी आंखों में दिखता था, पर उन्मुक्तता तब भी नहीं होती थी. एक तरह का खिंचाव तब भी उसके चेहरे पर छाया रहता था, जैसे कि पत्थर हो जिसके किनारे पर कभी ग़लती से हरियाली की शाखाएं उग आती हों. केशव का स्वभाव ऐसा ही है, उर्मि के साथ-साथ, काव्या ने भी यह बात जान ली थी.

काव्या के कंधे थपथपाते हुए वह बोली, “ज़्यादा सोच मत. पापा को तो इस बार तुझे मनाना ही होगा. बेटी की तरह ज़िद कर या मनुहार, लेकिन निराश नहीं होना. तू भी तो पापा की बेटी की तरह उनसे व्यवहार नहीं करती है. जैसे मैंने सरेंडर कर दिया उनके सामने, तुझे नहीं करना है. अगर मैं हक़ जताती, उनसे प्यार से, नाराज़ होकर या रूठकर अपनी बात मनवाती, तो क्या वह मना कर पाते. तटस्थता चाहे कितनी पैनी क्यों न हो, अगर अपनेपन से तराशा जाए, तो चुभन ख़त्म हो जाती है. जैसा चल रहा है, चलने दो, यह सोच हमारी भी रही और उनकी भी.”

“आज आप कुछ अलग तरह से बोल रही हैं मम्मी. आप ही तो सदा मुझसे कहती रहीं कि पापा ऐसे ही हैं, उनसे उलझना बेकार है. इसलिए पापा जैसा रिलेशन मैं उनके साथ कभी डेवलप ही नहीं कर पाई. आज आप रिश्ते को बिल्कुल ही अलग तरह से परिभाषित कर रही हो. मुझे लगता है कि पापा भी तो आपके या मेरे साथ जो बॉन्डिंग होनी चाहिए, उसे मिस करते होंगे. उन्हें वह फीलिंग नहीं आती, तभी तो दोस्तों का साथ ढूंढ़ते हैं. जहां तक मैंने समझा है, आप हमेशा उन्हें ही कठघरे में खड़ा करती आई हो. आपको लगता है कि वे हमेशा ग़लत होते हैं. वे बुरे पति और पिता हैं. आपने जिस तरह की छवि मेरे सामने पेश की, मैंने उसी तरह उनसे व्यवहार किया. न ही उन्हें अपने समीप आने दिया, न ही उनके क़रीब जाने की कोशिश की.” काव्या पूरी तरह से असमंजस में थी.

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वह भी दूसरे बच्चों की तरह अपने पापा के साथ एक सहज रिश्ता चाहती थी. सामान्य रिश्ता-बचपन में ज़िद करने, उनके साथ खेलने, उनके साथ घूमने जाने, उनके साथ अपनी बातें शेयर करने और बड़े होने के बाद, उनके सुरक्षित साथ का रिश्ता, लेकिन हर बार उसे यही लगा कि जैसा मां कहती हैं, वैसा ही करना चाहिए. ग़लती तो उससे भी हुई है. बड़े होने के बाद, तो वह ख़ुद भी सही-ग़लत, अच्छा-बुरा तय कर सकती थी. उसके मन में पापा के प्रति असीम प्यार उमड़ आया.

“पापा, अकेलापन महसूस करते होंगे न मम्मी? हम दोनों तो एक टीम बनाकर रहते हैं. कितनी बार उन्हें नज़रअंदाज़ कर देते हैं. अब समझ में आ रहा है कि वह हमेशा इतनी बुरी तरह से रिएक्ट क्यों करते हैं. उनकी झुंझलाहट, उनका अकेलापन कड़वाहट बनकर बाहर निकलती रही है. मम्मी, आप कोशिश नहीं करना चाहोगी अपने रिश्ते में एक ताज़गी लाने की? कुछ हैप्पी इफेक्ट डालने की?” काव्या के सवाल से चौंक उठी उर्मि.

‘कर पाएगी क्या वह?’ जैसे वह अपने आपसे ही पूछ रही थी. उर्मि को लगा सीलन दीवारों पर ही नहीं, उसके और केशव के रिश्ते में भी पूरी तरह से उतर चुकी है. न जाने कितनी पेंट की कोटिंग करवानी पड़ें. उसमें लंबा समय भी लग सकता है.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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