कहानी- हैप्पीवाला न्यू ईयर ...

कहानी- हैप्पीवाला न्यू ईयर 3 (Story Series- Happywala New Year 3)

दीवारों की रौनक़ लौट आई थी, घर के हर कोने में एक उजास-सा फैला प्रतीत होता था. नए साल का आगमन करने को तीनों ही लालायित थे.

“हैप्पी न्यू ईयर मम्मी-पापा.” काव्या एक साथ दोनों से लिपटते हुए बोली. वह दोनों का साथ चाहती थी, दोनों को साथ-साथ चाहती थी.

“आज नया साल सच में ख़ुश है.”

केशव ने असमंजस से काव्या को देखा, तो वह बोली, “सीधी-सी बात है पापा, हम बोलते हैं हैप्पी न्यू ईयर, यानी ख़ुश नया साल, तो बस इस बार हमारे घर में वह सचमुच ख़ुश है.”

उसकी बात सुन उर्मि मुस्कुरा दी, पर केशव खिलखिलाकर हंस पड़े. उनकी खिलखिलाहट सचमुच हैप्पीवाली थी.

“रात बहुत हो गई है. सो जाओ बेटा.” उर्मि काव्या का सामना नहीं कर पा रही थी.

अपराधबोध घेर रहा है क्या उसे? एक बेटी और पापा के बीच दूरियां बनाने के लिए क्या वह ख़ुद को ज़िम्मेदार समझ रही है.

“बातें करो मम्मी. मैं चीज़ों को समझने लायक हो चुकी हूं. मुझे लगता है कि हमारी असुरक्षा का भाव ही हमसे सब कुछ करवाता है. पापा और आपके बीच दूरी रही, इसलिए आपने मुझे अपने क़रीब रखा और मैं उनसे दूर होती रही. ‘जैसा चल रहा है, चलने दो’ के साथ ज़िंदगी कब तक काटोगे आप लोग. ये जीने का सही ढंग नहीं है. एक हैप्पी फैमिली मुझे भी चाहिए. दोनों के साथ, दोनों के प्यार के साथ.” काव्या के गालों से बहते आंसू उर्मि को व्यथित कर गए.

“कोशिश करने की शुरुआत तुम्हें ही करनी होगी, काव्या. मुझे व़क्त लगेगा. हम बड़ों के ईगो हमारी उम्र बढ़ने के साथ-साथ विशाल बरगद के पेड़ की तरह हो जाते हैं. पत्ते तोड़ते हुए, टहनियों को काटते हुए, जड़ तक पहुंचने में समय लगता है. तुम एक कदम आगे बढ़ाओ. नहीं रोकूंगी इस बार.”

साढ़े ग्यारह बज चुके थे. दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई, तो दोनों ने अपने को संभाला.

“मां-बेटी की जोड़ी अभी तक जाग रही है. कोई साजिश चल रही है क्या मेरे ख़िलाफ़?” केशव ने ताना मारा.

“आप कुछ लेंगे पापा?” काव्या ने बहुत ही प्यार व सहजता से पूछा.

केशव ने हैरानी से उसकी ओर देखा. नन्हीं काव्या का चेहरा उनकी आंखों के सामने घूम गया. तुतलाती ज़ुबान में पापा कहकर उनसे चिपट जाती थी, तो कितना सुकून मिलता था. बड़े होने के साथ उसके लहज़े में नश्तर ही महसूस होते थे. बिना कुछ कहे वह अपने कमरे की ओर बढ़ गए.

केशव को इन दिनों लग रहा था कि काव्या का उनके प्रति व्यवहार काफ़ी बदल गया है. उर्मि में भी कुछ अलग-सा महसूस हो रहा था. काव्या उनसे बात करने की पहल कर रही थी और उर्मि उन्हें टोक नहीं रही थी. उसे अच्छा लग रहा था. वह घर पर ज़्यादा समय बिताने लगे थे और उन दोनों के बीच कोई तीसरा है या आउटसाइडर है, ऐसा कम लगने लगा था. जैसा चल रहा है, चलने दो कि जगह बदलाव व नए सिरे से ज़िंदगी जीने की बात मन को छूने लगी थी. काव्या के साथ मज़ाक और बातें एक सिलसिला बन गया था. उर्मि हैरान थी कि केशव का हर बात में रिएक्ट करना और कड़वाहट के शब्द कहना कहां गायब हो गया है. उन दोनों के बीच के ईगो और मतभेदों पर से कोहरे की चादर धीरे-धीरे ही सही, पर हटने लगी थी.

संवाद, चाहे बेमतलब के ही क्यों न हों, जुड़ाव का उद्धम बिंदु होते हैं. अपनेपन का बहाव लहरों के बीच से होते हुए दो किनारों को मिलने को मजबूर कर ही देता है.

“बेटा, तुम घर का डेकोर बदलने की बात कर रही थीं न, तो चलो मार्केट सर्वे कर लेते हैं. कुछ नए ट्रेंड्स का पता चल जाएगा. तुम्हें जो अच्छा लगे, वही करवा लेना. तुम साथ चलोगी उर्मि?” केशव ने थोड़ा झिझकते हुए पूछा था. उनकी आंखों में प्रश्‍न, संशय, उम्मीद और प्यार की मिश्रित-सी नमी दिखाई दी उर्मि को.

दीवारों की रौनक़ लौट आई थी, घर के हर कोने में एक उजास-सा फैला प्रतीत होता था. नए साल का आगमन करने को तीनों ही लालायित थे.

“हैप्पी न्यू ईयर मम्मी-पापा.” काव्या एक साथ दोनों से लिपटते हुए बोली. वह दोनों का साथ चाहती थी, दोनों को साथ-साथ चाहती थी.

“आज नया साल सच में ख़ुश है.”

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केशव ने असमंजस से काव्या को देखा, तो वह बोली, “सीधी-सी बात है पापा, हम बोलते हैं हैप्पी न्यू ईयर, यानी ख़ुश नया साल, तो बस इस बार हमारे घर में वह सचमुच ख़ुश है.”

उसकी बात सुन उर्मि मुस्कुरा दी, पर केशव खिलखिलाकर हंस पड़े. उनकी खिलखिलाहट सचमुच हैप्पीवाली थी.

तभी खिड़की के कांच को पार करती धूप की एक किरण फ़र्श पर आकर बिछ गई. तीनों जनवरी की सुबह की उस पहली किरण को छूने, उसकी तपिश को ओढ़ने उसकी ओर लपके. काव्या समझ गई कि रिश्तों में पसरा ठंडापन भी ऊष्मा तलाशने को आतुर है.

हैप्पीवाला न्यू ईयर, जो बांहें फैलाए खड़ा था. केशव ने अचानक काव्या और उर्मि को अपनी बांहों में समेट लिया. पहली किरण की तपिश में अपनेपन की गर्माहट सिमट आई थी.

Suman Bajpai

     सुमन बाजपेयी

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