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कहानी- खोया हुआ-सा कुछ 3 (Story Series- Khoya Hua-Sa Kuch 3)

“कैसी हो पीहू…?” मैंने मुस्कुराकर कहा, “बहुत अच्छी… बहुत ख़ुश!”

“पीहू… क्या कभी माफ़ कर सकोगी मुझे…?” मैंने व्यंग्य से कहा, “माफ़ी… किस बात की माफ़ी समीरजी…? आपको जो सही लगा, सो आपने किया. उससे किसी पर क्या गुज़री इससे आपको क्या? छो़ड़ो वह सब… आप अपनी सुनायें. जहां तक मुझे याद है, आप तो एक बहुत अच्छी कंपनी में थे. फिर वह छोड़कर पेंटर कैसे बन गए?”

“हम तो समीरजी की एग्ज़बीशन भी देखकर आ गए हैं. पीहू तुम्हें चलना चाहिए था मेरे साथ, कितनी सुंदर पेंटिंग थी उनकी. मैं मिला समीरजी से, पर वह भी अजीब इंसान लगे मुझे. जानती हो, यह महाशय पहले किसी बड़ी कंपनी में काम करते थे, फिर अचानक सब कुछ छोड़कर पेंटर हो गए. और पता है अब तक शादी नहीं की है. लोग कहते हैं कि किसी से बहुत प्यार करते थे, पर उसे पा न सके, बस उसकी याद में कभी शादी न करने का फैसला ले बैठे…”

नील अपनी ही रौ में पता नहीं क्या-क्या कहे जा रहे थे, पर मेरा मन तो उन्हीं चंद शब्दों में अटक गया था, ‘शादी नहीं की… तो क्या अब तक समीर मुझे भूला नहीं पाया…?’

नील मेरे मन की बेचैनी भांपते हुए बोले, “पीहू, क्या हुआ. तुम कुछ परेशान-सी लग रही हो?”

“कुछ नहीं, बस ज़रा थकावट लग रही है.” यह कह कर मैं बात को टाल गई. अगली दोपहर नील का फ़ोन आया, “पीहू, आज शाम मेरा एक मित्र आएगा. ज़रा अच्छी-सी तैयारी कर लेना.” मेरा मन तो अब तक समीर में ही उलझा हुआ था. कितने सवाल थे, जो पूछने थे, मन हुआ एक बार जाकर मिल आऊं उससे. फिर लगा जाकर भी क्या हासिल होगा? मैं बेमन से घर का काम करने में लग गई.

शाम होने पर मैं नील के आने का इंतज़ार करने लगी. तभी फ़ोन बजा. फ़ोन नील का था, “पीहू, मुझे कुछ काम आ गया है, थोड़ी देर हो जाएगी. मेरा मित्र आए तो तुम उसका ख़याल रखना.” मैं झल्ला गई. जान न पहचान बस कह दिया कि ख़याल रखना. ठीक 6 बजे दरवाज़े की घंटी बजी. दरवाज़ा खोलते ही मैं सामने खड़े इंसान को देखकर चौंक पड़ी, “समीर… तुम यहां?” मुझे देखते ही समीर के हाथ में फंसे रजनीगंधा के फूल कांप उठे, “पीहू…!”

कुछ पल हम दोनों बिना कुछ कहे यूं ही खड़े रह गए. मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करूं? मेरी परेशानी भांपकर उसने कहा, “मुझे यहां नीलजी ने बुलाया है. यह उन्हीं का घर है न?”

मैंने उसे अंदर आने का रास्ता देते हुए कहा, “हां… उन्हीं का घर है और मैं उनकी पत्नी…!”

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मैंने मुस्कुराकर कहा, “बहुत अच्छी… बहुत ख़ुश!”

“पीहू… क्या कभी माफ़ कर सकोगी मुझे…?”

मैंने व्यंग्य से कहा, “माफ़ी… किस बात की माफ़ी समीरजी…? आपको जो सही लगा, सो आपने किया. उससे किसी पर क्या गुज़री इससे आपको क्या? छो़ड़ो वह सब… आप अपनी सुनायें. जहां तक मुझे याद है, आप तो एक बहुत अच्छी कंपनी में थे. फिर वह छोड़कर पेंटर कैसे बन गए?”

समीर व्यंग्य से हंसकर बोला, “व़क़्त के साथ बहुत कुछ छूट जाता है और बहुत कुछ छोड़ना पड़ जाता है. कोई थी जो मुझे पेंटर के रूप में देखना चाहती थी, पर एक दिन वही मुझसे रूठ कर, न जाने कहां चली गई, इसलिए उसके इस सपने को पूरा करके, उसे अपनी पेंटिंग के रंगों में बांधने की कोशिश करता रहता हूं.”

मैंने तड़पकर कहा, “इतना प्यार करते थे उससे, तो उसे जाने ही क्यों दिया?”

समीर सिर झुकाकर बोला, “अगर जानता कि मेरी एक पल की कमज़ोरी से यह हादसा घटित हो जाएगा, तो शायद…! जानती हो पीहू… उस दिन तुमसे दूर जाते व़क़्त एक-एक क़दम उठाते हुए ऐसा लग रहा था मानो, मेरे हाथों से कुछ बहुत ही अनमोल चीज़ छूटी जा रही है. छ: माह, जो सिंगापुर में गुज़ारे मैंने तुम्हारे बिना, ऐसे थे मानो छ: बरस बीत गए हों. तभी मुझे एहसास हुआ कि तुम मेरे जीवन का कितना अहम हिस्सा हो चुकी थी. वहां से लौटते हुए मैं निर्णय कर चुका था कि चाहे सारी दुनिया मेरे ख़िलाफ़ हो जाए, पर मैं तुम्हें अपना बना कर ही रहूंगा. आते ही तुम्हारे घर गया. पर जब तुम्हारी बहन ने बताया कि तुम्हारी…!” इतना कहकर समीर रुक गया.

फिर एक लंबी सांस लेकर बोला, “उस पल ऐसा लगा था पीहू मानो किसी ने मुझसे मेरे हिस्से की ज़मीन और आकाश दोनों छीन लिए हों. याद है पीहू, तुम ही कहती थी कि अपनी लापरवाही की बहुत बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ेगी मुझे, पर वह क़ीमत तुम होगी पीहू… यह तो मैंने सोचा भी नहीं था. तुम्हारा साथ मुझे जीने की वजह देता था, पर तुम्हारे चले जाने पर लगता था कि मैं तुम्हारे लिए मर जाऊं. हर पल, हर क्षण मैं तुम्हें अपने आस-पास देखना चाहता था. कैसा पागलपन था वह, जो मुमकिन नहीं था वही सब चाहता था मैं.

घरवाले समझा-समझाकर हार गए, पर मैं शादी के लिए तैयार न हुआ. फिर एक दिन मां ने कहा, “ठीक है समीर जाओ, जिसे तुम अपनाना चाहते हो, उसे ही हमारी बहू बनाकर ले आओ.” मां की बात सुनकर पहले मैं बहुत ज़ोर से हंसा और फिर उनके गले लगकर, बच्चों की तरह फूट-फूट कर रो पड़ा.

– कृतिका केशरी

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