कहानी- मन्नत के सिक्के 2 (Story Series- Mannat ke sikke 2)

पलक ने दमयंतीजी से अपने कंधे पर तारा लगाने की पेशकश की. पलक के कंधे पर हिलते हाथों से साकेत की मदद से सितारे लगातीं दमयंतीजी की आंखों से आंसू छलके.
“तेरे दादा को बड़ा शौक़ था कि तेरे पापा फौज में भरती हों…” यह सुनकर पलक परिहास करते हुए बोली, “अरे, मेरी प्यारी दादी, दादाजी की इच्छा पापा ने नहीं, तो उनकी पोती ने पूरी कर दी. ऐसे में कम से कम आज तो पोती का सोग मत करो…” यह सुनकर प्यार से चपत लगाती दादी बोलीं, “चुप रह, कुछ भी बोलती है…” कहते हुए आंचल से बह आए आंसुओं के अस्तित्व को मिटाने लगीं.

समय बीतते, धीरे-धीरे अम्मा ने विधि का विधान मानकर पोती को स्वीकारा और एक बार फिर उन्होंने, ‘जो हुआ सो हुआ’ की तर्ज पर फिर से पोते के लिए आस भरी नज़रें बेटे-बहू पर टिकाईं. थोड़ी ज़िद-मनुहार भी की. पर अब की बार उनकी बेटे के सामने एक ना चली. ‘हम दो हमारे दो’ का नारा लिए साकेत-अमृता ने दो के बाद विराम लगा दिया.
अब जहां अम्मा छोटी पोती यानी पलक को ताने देकर, झिड़ककर अपने मन को मरहम लगातीं, तो वहीं अमृता और साकेत मन भर-भर दुलार पलक पर उड़ेलते. पलक के प्रति अम्मा की चिढ़ कब उनका व्यवहार बन गई, पता ही नहीं चला और पलक भी तो जैसे, दमयंतीजी के तानों को झेलने का कुदरती हुनर जन्म से साथ लाई थी.
साकेत-अमृता की लाडली पलक दादी से दो-दो हाथ करने को सदैव तत्पर रहती.
“अम्माजी उठिए, चाय पी लीजिए…” अमृता की आवाज़ पर सोती-जगती अम्मा उठ बैठीं. दो घंटे में देहरादून आ गया था. सुबह-सुबह होटल से सब एकेडमी पहुंचे. आज भारत के भावी सैनिक कैडेट से ऑफिसर की पदवी पानेवाले थे, उनमें से एक पलक भी थी.
“एक तो लड़की, दूसरे ऐसे तेवर, इसके चाल-चलन देख के डर लागे है…” सदा यह कहने वाली दमयंतीजी आज दम साधे अपनी पोती की सधी चाल और भावी सैनिक के स्वाभाविक तेवर को देख गदगद हुई जा रही थीं.

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परेड शुरू हो चुकी थी. बार-बार चश्मा पोंछती दमयंतीजी हर कैडेट में पलक को देखतीं. नपे-तुले क़दमताल और बैंड की मनमोहक ध्वनि के बीच सभी युवा देश के प्रहरी अंतिम पग पर पहुंच गए थे. अधिकारी घोषित होने के बाद सभी अपने-अपने पैरेंट्स को कंधे पर तारा लगाने का गौरव प्रदान करने लगे. पलक ने दमयंतीजी से अपने कंधे पर तारा लगाने की पेशकश की. पलक के कंधे पर हिलते हाथों से साकेत की मदद से सितारे लगातीं दमयंतीजी की आंखों से आंसू छलके.
“तेरे दादा को बड़ा शौक़ था कि तेरे पापा फौज में भरती हों…” यह सुनकर पलक परिहास करते हुए बोली, “अरे, मेरी प्यारी दादी, दादाजी की इच्छा पापा ने नहीं, तो उनकी पोती ने पूरी कर दी. ऐसे में कम से कम आज तो पोती का सोग मत करो…” यह सुनकर प्यार से चपत लगाती दादी बोलीं, “चुप रह, कुछ भी बोलती है…” कहते हुए आंचल से बह आए आंसुओं के अस्तित्व को मिटाने लगीं. एकेडमी दर्शन के बाद सब वापस होटल आ गए.

       मीनू त्रिपाठी

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