कहानी- मुझे सब था पता मैं ह...

कहानी- मुझे सब था पता मैं हूं मां 3 (Story Series- Mujhe Sab Tha Pata Main Hu Maa 3)

दुनिया में कदम-कदम पर नाइंसाफ़ियां हैं, नाकामियां हैं. तू मेरी सफल बेटी है. मन की प्रतिरोधक क्षमता को इतना बढ़ाने की कोशिश करना कि नाकामियां तेरे विकास की प्रेरणा बन जाएं और हो सके तो अब संवाद की इस रस्सी को थाम लेना और फिर कभी न छोड़ना. ज़िंदगी में कभी भी कोई भी समस्या आए तो सबसे पहले अपनी मां को बताना.

मेरा उत्साह बढ़ा और मैं तुझे नई कहानियों में गढ़कर ये समझाने में लग गई कि स्पर्धा के लिए अतिरिक्त मेहनत की ज़रूरत होती है, इसलिए अध्यापिकाएं उन बच्चों का चुनाव करती हैं, जो अच्छे अंकों द्वारा श्रम के प्रति अपनी संजीदगी प्रमाणित कर चुके होते हैं. आह! लेकिन बच्चा वो पौधा होता है, जिसे कब कितना खाद-पानी चाहिए, अभिभावकों को पता नहीं होता. बस, प्रयोग करके ही सीखा जा सकता है. मेरा ये प्रयोग भी असफल होने लगा. तूने कुछ समय तक तो मेहनत की, पर अपेक्षित फल न मिलने पर तू ज़्यादा निराश हो गई. तुझे अध्ययन से ही नहीं, मेरी कहानियों से, मेरे समझाने से भी चिढ़ हो गई और तूने कहीं चुनाव के लिए असफल होने पर अपना दर्द मेरे साथ बांटना बंद कर दिया. अब तेरा दर्द मुझे तेरे चिड़चिड़े बोलों या सोते समय तेरे गालों पर सूखे आंसुओं से पता चलता. तेरी सहेलियों से अपने अनुमानों के सच होने का पता चलता, तो मैं भीतर तक आहत हो जाती. शिक्षा व्यवस्था के दिए विशेषण ‘औसत’ के तीर ने तेरे मासूम दिल की श्रम की इच्छाशक्ति को, तेरे आत्मविश्‍वास को कुचल दिया था, जानती थी.

तालियों की गड़गड़ाहट में खो जाने का, किसी शाम का सितारा होने का तेरा अरमान पूरा करने के मेरे पास दो ही सही रास्ते बचे थे. तेरे लिए स्वस्थ स्पर्धाओं के अधिक से अधिक अवसर खोजना और तेरे भीतर की अभिरुचि का पता लगाना, इसीलिए मैंने तेरे लिए तरह-तरह के हॉबी कोर्स जॉइन कराना और स्कूल से इतर प्रतियोगिताओं के अवसर ढू़ंढना शुरू किया, लेकिन जब वो उपलब्धियां भी तेरे भीतर श्रम की निरंतरता की प्रेरणा न जगा पाईं, तो मेरी ममता की चिंता बढ़ गई. तूने उन्हें स्कूल में दिखाकर अध्यापिकाओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश की. मैं तेरे स्कूल में महत्व पाने के प्यासे अबोध मन को समझा नहीं पा रही थी कि इससे उन्हें क्या और क्यों फ़र्क़ पड़ता. यदि किसी बच्चे ने स्कूल के बाहर कोई पुरस्कार जीता है, तो वे उसे देखकर शाबाशी देने के अलावा और कह या कर भी क्या सकती थीं.

एक बात और तुझे बताना ज़रूरी है कि बिना तेरी जानकारी में आने दिए मैंने तेरे स्कूल जाकर, दूसरे अभिभावकों से बात करके, स्कूल काउंसलर से मिलकर ये पक्का किया था कि स्कूल के पक्षपाती वातावरण को लेकर तेरी शिकायतों में सच्चाई तो नहीं है या तुझे कोई वास्तविक समस्या तो नहीं है, जिससे तेरा मन अध्ययन में नहीं लगता. जब मैं आश्‍वस्त हो गई, तब मैंने तुझमें असफलताओं पर कुंठित होने की बजाय उन्हें प्रेरणा बनाने और छोटी उपलब्धियों पर ख़ुश रहने का नज़रिया विकसित करने के लिए पौराणिक कथाओं का सहारा लिया.

यह भी पढ़ेबड़े होते बच्चों को ज़रूर बताएं ये बातें (Important Things Growing Children Should Know)

किशोर वय की आंधी, तथाकथित प्यार ने इस उम्र की दहलीज़ पर कदम रखते ही तेरे जीवन में भी दस्तक दी. मैं भी इस आंधी के ख़तरों से परिचित मां की तरह चौकन्नी हो गई. ये वो कठिन घड़ी है, जो हर पीढ़ी के अभिभावकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती रही. वो किशोरवय के शारीरिक और भावनात्मक आकर्षण की अनिवार्यता को पहचानते हैं, इसीलिए दोस्ताना माहौल बनाकर उसे सही मार्गदर्शन देने की कोशिश करते हैं, लेकिन जैसे ही किशोर आज़ादी की अपनी परिभाषा बताते हैं, उनकी आंखों में पहाड़ की चोटी पर खड़े उस अबोध इंसान का बिंब उभरने लगता है, जिसे अंदाज़ा नहीं है कि एक कदम फिसला और कितनी गहरी घाटी में गिर सकता है. हम जानते हैं कि न तो बच्चा इतना छोटा है कि उसे गोद में उठाकर वापस ले आया जाए और न इतना बड़ा कि उसे इन ख़तरों के बारे में समझाया जा सके. तो बस इतना चाहने लगते हैं कि एक रस्सी उसकी कमर में बांधकर पकड़ लें, ताकि वो फिसले तो उसे संभाल सकें. वो रस्सी है सतर्कता की, हर समय उसकी हर हरकत पर नज़र रखने की और इन सबसे बढ़कर संवाद की. और इन्हीं चीज़ों से किशोर सबसे ज़्यादा चिढ़ते हैं.

मैं कतई नहीं कहती कि मैंने उस दौरान जो किया, वो पूरी तरह सही था. पर बेटा, इतना ज़रूर यकीन दिलाना चाहूंगी कि मक़सद केवल तुझे गिरने पर संभाल लेना था, लेकिन प्यार में चोट खाने पर भी तूने संवाद की रस्सी को नहीं थामा. तूने उसे चिढ़ाने के लिए किसी और का साथ लिया, वो कोई और तुझे ब्लैकमेल करने लगा. तूने मुझे कुछ नहीं बताया, तो मेरे पास केवल सतर्कता की रस्सी बची, जिसने तेरी नज़र में मुझे जेलर बना दिया.

कोई बड़ी उपलब्धि पाने के लिए ज़रूरी योजनाबद्ध परिश्रम की चाह विकसित करने का अंतिम उपाय है प्रताड़ना. ईश्‍वर का लाख-लाख धन्यवाद है कि दिल पर पत्थर रखकर डरते-डरते अपनाया ये उपाय कामयाब हो गया.

लेकिन बेटा, ये तो एक नई यात्रा की, नए संघर्षों की शुरुआत है. दुनिया में कदम-कदम पर नाइंसाफ़ियां हैं, नाकामियां हैं. तू मेरी सफल बेटी है. मन की प्रतिरोधक क्षमता को इतना बढ़ाने की कोशिश करना कि नाकामियां तेरे विकास की प्रेरणा बन जाएं और हो सके तो अब संवाद की इस रस्सी को थाम लेना और फिर कभी न छोड़ना. ज़िंदगी में कभी भी कोई भी समस्या आए तो सबसे पहले अपनी मां को बताना. मैं तुझे यक़ीन दिलाती हूं कि तुझे उपदेश नहीं दूंगी. जब तेरी गढ़ने की उम्र थी, तब तुझे तेरी ग़लतियां बताती थी. अब तेरी बढ़ने की उम्र है, तो मां तेरा सहारा बनेगी. यक़ीन रखना कि मां तुझे बहुत प्यार करती है और हमेशा करती रहेगी. चाहे तू सारी दुनिया की नज़र में निरर्थक हो जाए, सारी अध्यापिकाओं की नज़र में नाक़ाबिल हो जाए, सारे समाज की नज़रों में ग़लत हो जाए, पर मां के लिए हमेशा अनमोल रहेगी. वो तुझे संवारने की कोशिश कभी नहीं छोड़ेगी. जब डॉक्टर ने पहली बार तुझे मेरी गोद में दिया था और मैंने तुझे बड़ी सावधानी से पकड़कर सीने से लगाया था, मन से मां तुझे वैसे ही पकड़े रहेगी. तेरी हंसी पर निछावर होती रहेगी, तेरे दर्द से परेशान, तेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित होती रहेगी…

यह भी पढ़ेइसलिए सिखाएं बच्चों को हेल्दी कॉम्पटीशन (Why Healthy Competition Is Good For Kids)

कुछ ही पलों में झर-झर बहते आंसुओं को संभालती आकांक्षा वीडियो कॉल करके कैमरे पर मां के आंसू पोछे जा रही थी – अब रोने के नहीं, गर्वित होने के दिन हैं, मेरी सफल मां!

bhavana prakash

भावना प्रकाश

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES