कहानी- पैरों की डोर 1 (Story Ser...

कहानी- पैरों की डोर 1 (Story Series- Pairon Ki Dor 1)

By Usha Gupta in

रेनू अपने दिमाग पर बहुत जोर दे रही थी. उसे युवती का चेहरा भी जाना-पहचाना लग रहा है. अक्सर उसे अपने पढ़ाए सभी बच्चों के नाम भी याद रहते थे, लेकिन बढ़ती उम्र के असर के कारण इस युवती का नाम भूल रही थी. वह दिमाग पर बहुत जोर डालने के बावजूद भी उसे पहचान नहीं पाई.

 

 

 

रेनू आज बहुत खुश थी. बात ही कुछ ऐसी थी. पूरे बीस वर्ष तक जूनियर हाई स्कूल में अध्यापिका की नौकरी करने के बाद अब उसे प्रधानाध्यापिका बनने का अवसर मिला था. यह बात अलग थी कि प्रमोशन के साथ उसे दूसरी जगह जाना था, जो उसके निवास से करीब चालीस किलोमीटर दूर था. इस बार रेनू ने प्रमोशन को खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया. इससे पहले दो बार उसे प्रमोशन का मौका मिला, लेकिन अपनी पारिवारिक परिस्थिति के कारण वह घर से दूर नहीं जा पाई, जिसका उसे बड़ा मलाल था.
पत्र मिलते ही वह दूसरे दिन नई तैनाती पर पहुंच गई. उसके साथ की दूसरी मैडम ने वहां पर उसके रहने की व्यवस्था कर दी थी. वहां पहुंच कर सबसे पहले उसने स्कूल में कार्यभार ग्रहण किया और उसके बाद बैंक में हस्ताक्षर प्रमाणित करने के लिए चल पड़ी.
बैंक पहुंचकर उसने सामने काउंटर पर बैठी एक जवान युवती से पूछा, “मुझे अपने हस्ताक्षर प्रमाणित कराने हैं. बैंक मैनेजर होंगे क्या?”
उस युवती ने एक नजर उनके चेहरे पर डाली और अपनी सीट से उठकर सामने आ गयी. उसने झुक उनके पैर छुए और बोली, “मैडम चरण स्पर्श. कैसी हैं आप? आज सालों बाद आप से मुलाकात हो रही है. बता नहीं सकती मुझे आपको यहां देखकर कितनी खुशी हो रही है.”
“मैं अच्छी हूं तुम कैसी हो?”
“बहुत अच्छी हूं. आप की कृपा से मैं आज यहां तक पहुंच गई. घर पर अंकल ठीक है.”

यह भी पढ़ें: हाउसवाइफ के लिए 10 बेस्ट करियर (10 Best Careers For Housewives)

“सब अच्छे हैं.”
“चलिए मैं आपको बैंक मैनेजर से मिला देती हूं .”
इतना कहकर वह उनके साथ मैनेजर के केबिन तक आई और बोली, “मैडम आप अपना काम यहां पर कर लीजिए. मैं अपने काउंटर पर चलती हूं ग्राहक इंतजार कर रहे हैं.”
रेनू को समझ नहीं आ रहा था कि वह कौन है? वैसे मास्टरगिरी का एक फायदा यह तो है कि हर जगह पर उन्हें कोई न कोई चेला मिल ही जाता है, जिससे उन्हें काम करने में सरलता हो जाती है. वह युवती अपने काउंटर पर आकर फिर से अपने काम पर जुट गयी.
रेनू अपने दिमाग पर बहुत जोर दे रही थी. उसे युवती का चेहरा भी जाना-पहचाना लग रहा है. अक्सर उसे अपने पढ़ाए सभी बच्चों के नाम भी याद रहते थे, लेकिन बढ़ती उम्र के असर के कारण इस युवती का नाम भूल रही थी. वह दिमाग पर बहुत जोर डालने के बावजूद भी उसे पहचान नहीं पाई.
रेनू ने बैंक में अपना काम निपटाया. उसके बाद वह उस युवती के पास आयी और बोली, “धन्यवाद तुम्हारे कारण मेरा काम आसान हो गया.”
“ऐसा मत कहिए मैडम यह तो मेरा फर्ज था. आज आपके कारण तो मैं यहां पर हूं.” वह बोली तो रेनू का सिर गर्व से ऊंचा हो गया. वह बोली, “माफ करना मेरी याददाश्त कुछ कमजोर हो गई है. मैं तुम्हें पहचान नहीं पायी.”
वह युवती जरा-सा मुस्कुराई और बोली, “मुझे लग रहा था कि शायद आप मुझे पहचान नहीं रही है. मैडम मैं सोनी हूं.”
“कौन सोनी?”

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

Dr. K. Rani
डॉ. के. रानी

 

 

 

यह भी पढ़ें: झूठ बोलने पर बच्चे को डांटने-धमकाने की नहीं, समझाने की ज़रूरत है… (How To Deal With Your Kids Lying)

 

 

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

×