कहानी- पुनश्‍च 2 (Story Series- Punashcha 2)

सुलोचना को लगने लगा कि घर में किसी को भी उसकी परवाह नहीं है. दो दिन पहले की घटना के बाद तो उसकी इस धारणा की पुष्टि भी हो गई. रविवार का दिन था, रवि तथा बच्चे सब एक साथ ड्रॉईंगरूम में बैठे बात कर रहे थे. दोपहर को खाने के बाद कुछ देर आराम करने के पश्‍चात जब अपने कमरे से निकली तो ड्रॉईंगरूम से सबकी मिली-जुली आवाज़ें आ रही थीं, बीच-बीच में अपना नाम आने से उसे उत्सुकता हुई कि आख़िर सब उसके सम्बन्ध में क्या बात कर रहे हैं? यह जानने के लिए वह उसे जैसे ही ड्रॉईंगरूम की ओर बढ़ी कि उसे देखते ही कुणाल ने अपने हाथ में रखे काग़ज़ को अपने पीछे छुपा लिया.

कभी वह उनकी व्यस्तता को लेकर उलाहना भी देती तो वह उसे चुप कर देते, कहते, “सुलोचना, अभी तो मैं तन-मन से एकदम स्वस्थ और समर्थ हूं, ऐसे में अभी से रिटायर होकर घर बैठ जाऊंगा तो तुम्हीं दो दिनों में ही मुझसे बोर हो जाओगी. आज मैं व्यस्त हूं तो परिवार और समाज में मेरी इ़ज़्ज़त और पूछ है. जिस दिन भी व्यवसाय से निवृत्त होकर घर पर रहने लगूंगा नकारा हो जाऊंगा.

उनके तर्क के प्रविवाद में वह कहती, “मैं आपको रिटायर होने के लिए कब कह रही हूं? बस यह ज़रूर चाहती हूं कि अपनी व्यस्तताएं कुछ कम कर घर-परिवार के लिए भी कुछ समय निकालें.

जब पति के पास ही उसके लिए समय नहीं है तो बच्चों से कैसी उम्मीद? कभी-कभी ख़याल आता है कि इससे तो उसके अभाव के दिन अच्छे थे, जब वह परिवार की धुरी हुआ करती थी. पति और बच्चे छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए उसके ईर्द-गिर्द घूमा करते थे. अब तो लगता है कि किसी को भी उसकी ज़रूरत नहीं है. बस घर में वह ही एकमात्र ऐसी है, जिसके पास इतना समय रहता है कि काटने से भी नहीं कटता. हालांकि सुबह उठकर वह मॉर्निंग वॉक के लिए जाती है. थोड़ी बहुत माली के साथ बागबानी भी करती है. कहने को एक-दो क्लबों की सदस्यता भी उसके पास है, पर कहीं भी उसे मानसिक शांति नहीं मिलती. खाली बैठे-बैठे उसके स्वभाव में भी चिड़चिड़ाहट और तल्खी आ गई है. मन में रह-रहकर एक ही बात उठती है कि काश, जीवन को एक नए सिरे से जी पाती.

बच्चे अच्छे हैं, बहुएं भी संस्कारी और विवेकशील हैं, पर फिर भी उम्र का फ़ासला उनकी सोच में कुछ दूरियां ला ही देता है. उनका अब भी किचन में बच्चों की पसन्द का कुछ बनाने का मन करता है तो बहुएं तुरन्त टोक देती हैं. बहुएं क्या समझेंगी मां के हाथों बने खाने की महत्ता?

सुलोचना को लगने लगा कि घर में किसी को भी उसकी परवाह नहीं है. दो दिन पहले की घटना के बाद तो उसकी इस धारणा की पुष्टि भी हो गई. रविवार का दिन था, रवि तथा बच्चे सब एक साथ ड्रॉईंगरूम में बैठे बात कर रहे थे. दोपहर को खाने के बाद कुछ देर आराम करने के पश्‍चात जब अपने कमरे से निकली तो ड्रॉईंगरूम से सबकी मिली-जुली आवाज़ें आ रही थीं, बीच-बीच में अपना नाम आने से उसे उत्सुकता हुई कि आख़िर सब उसके सम्बन्ध में क्या बात कर रहे हैं? यह जानने के लिए वह उसे जैसे ही ड्रॉईंगरूम की ओर बढ़ी कि उसे देखते ही कुणाल ने अपने हाथ में रखे काग़ज़ को अपने पीछे छुपा लिया. सब कुछ देखते हुए भी अनदेखा करते हुए पूछा, “आज सब एक साथ बैठकर क्या बात कर रहे हो?”

उसके प्रश्‍न पर एक बार तो किसी को कोई उत्तर नहीं सूझा, पर तुरन्त ही कुणाल ने बात संभालते हुए कहा, “ऐसे ही हम लोग कोई बिज़नेस मैटर डिस्कस कर रहे थे. आईए, आप भी बैठिए.”

वह उन लोगों के पास आकर बैठ तो गई, पर उसे यह एहसास ज़रूर हो गया कि अब वह उन लोगों के लिए इतनी ग़ैर हो गई कि अपनी बात भी उसके साथ शेयर करने से वे कतराने लगे हैं. पांच-सात मिनट वहां पर बैठने की औपचारिकता पूरी करके वह भारी मन से पुन: अपने कमरे में आ गई. रात को सबके बुलाने पर भी वह खाने की टेबल पर नहीं गई. वह भी सबको जतलाना चाहती थी कि यदि उन लोगों को लिए उसकी कोई अहमियत नहीं है, तो उसमें भी इतना आत्मसम्मान है कि वह स्वयं को अपमानित नहीं होने दे. रात को रवि ने उसको मनाने की बहुत कोशिश पर वह बिना बात किए मुंह फेर कर लेट गयी.

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अपने विषय में सोचते-सोचते ही उसकी आंख लग गई. दूसरे दिन सवेरे-सवेरे अपने दरवाज़े पर ठक-ठक आवाज़ सुनकर उसकी आंख खुली तो देखा रवि वहां नहीं थे. शायद जल्दी ही सुबह सैर को निकल गए थे. दरवाज़े पर लगातार ठक-ठक की आवाज़ जारी थी. उसने तुरन्त अपनी नाइटी पर गाऊन डालकर दरवाज़ा खोला तो घर के सारे सदस्य एक स्वर में चिल्ला रहे थे, “ए वेरी हैप्पी फ़ि़फ़्टी एट्थ बर्थ डे टू यू”. एक-एक सदस्य उसे प्रणाम करता हुआ उसके हाथ में अपना अलग-अलग उपहार पकड़ाते हुए उसे जन्म दिवस की शुभकामनाएं दे रहा था. हताहत इतना सब कुछ हो जाने पर कुछ पल के लिए तो वे किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गयी थी.

Hansa Dasli Garg

     हंसा दसानी गर्ग

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