कहानी- प्यार को प्यार ही रह...

कहानी- प्यार को प्यार ही रहने दो 1 (Story Series- Pyar Ko Pyar Hi Rahne Do 1)

अरे, यह तो श्याम है! मेरी हल्की-सी चीख निकल गई, दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं. अकारण ऐसा लगा जैसे मैं चोरी करते पकड़ी गई होऊं. देखा पति गहरी नींद में सो रहे थे. मेरे नाम के साथ मेरा सरनेम विवाह के बाद बदलकर मिश्रा लिखा था, उसके बाद भी वह मुझे पहचान गया था.
उसके नाम पर मेरी दृष्टि जम-सी गई. जवाब देने के लिए जैसे ही एक्सेप्ट पर क्लिक करने लगी, मन के अंदर से आवाज़ आई, सोच लो पहले, क्या ठीक रहेगा? उसका नाम देखकर तो तुम्हें इतना अपराधबोध हो रहा है, उससे संपर्क रखने के बाद क्या होगा! तुम्हारी सुखी गृहस्थी है, वह भी शायद इसी स्थिति से गुज़र रहा होगा. कोई फ़ायदा नहीं है दोबारा अतीत की गहराइयों में गोते लगाने से.

रात को नींद नहीं आ रही थी. बेचैनी में करवटें बदलकर थक गई, तो उठकर लैपटॉप खोलकर बैठ गई. अचानक मेरी दृष्टि मैसेज रिक्वेस्ट पर चली गई. किस अनजान का है, देखने के लिए मैंने क्लिक किया, लिखा था- ‘यदि मैं ग़लत नहीं हूं, तो आप पाखी त्रिपाठी हैं न? आपकी प्रोफाइल फोटो देखकर कुछ-कुछ चेहरा पहचान में आ रहा है. वही जो चालीस साल पहले मुंबई में रहती थीं. आपकी बहन का नाम गीता था और भाई का नाम गौतम? मैं श्याम गुप्ता हूं. आपके पिताजी के मित्र का बेटा. यदि आपको याद हो, तो मैं एक बार अपने माता-पिता के साथ आपके घर आया था और हम साथ-साथ मुंबई में घूमने गए थे. मेरी प्रार्थना है कि यदि आप मुझे पहचान गई हैं, तो जवाब अवश्य दीजिएगा.’
अरे, यह तो श्याम है! मेरी हल्की-सी चीख निकल गई, दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं. अकारण ऐसा लगा जैसे मैं चोरी करते पकड़ी गई होऊं. देखा पति गहरी नींद में सो रहे थे. मेरे नाम के साथ मेरा सरनेम विवाह के बाद बदलकर मिश्रा लिखा था, उसके बाद भी वह मुझे पहचान गया था.

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उसके नाम पर मेरी दृष्टि जम-सी गई. जवाब देने के लिए जैसे ही एक्सेप्ट पर क्लिक करने लगी, मन के अंदर से आवाज़ आई, सोच लो पहले, क्या ठीक रहेगा? उसका नाम देखकर तो तुम्हें इतना अपराधबोध हो रहा है, उससे संपर्क रखने के बाद क्या होगा! तुम्हारी सुखी गृहस्थी है, वह भी शायद इसी स्थिति से गुज़र रहा होगा. कोई फ़ायदा नहीं है दोबारा अतीत की गहराइयों में गोते लगाने से. विवाह के बाद यह रिश्ता! मानसिक उलझन को क्यों न्यौता देना…? मैं थोड़ी देर के लिए सोच में पड़ गई.
आरंभ से ही मैं दिल और दिमाग़ के मामले में बहुत संतुलित रही हूं. मैंने अपनी उंगली क्लिक पर से हटा ली. लैपटॉप बंद किया और बिस्तर पर आकर लेट गई. तुम्हें इतना लंबा-चौड़ा परिचय देने की आवश्यकता क्यों पड़ गई श्याम! समय की मोटी चादर के ऊपर धूल की इतनी परतें जम जाने के बाद भी तुम्हारा नाम ही काफ़ी है, मुझे तुम्हारी याद दिलाने के लिए. इसका मतलब तो यह हुआ कि तुम्हें मेरे प्यार पर कभी विश्‍वास ही नहीं रहा है. तो क्या यह टेलीपैथी थी, जो रात को दो बजे उठकर मैं अकारण ही लैपटॉप खोलकर बैठ गई, मैं मन ही मन बुदबुदाई. शायद पहले तो नींद आ भी जाती, लेकिन अब तो उसके स्थान पर खुली आंखों के सामने चालीस साल पहले के दृश्य एक-एक करके घने बादलों में बिजली की तरह चमकने लगे. 17 साल की रही होऊंगी मैं, तब मेरे पिताजी के एक मित्र भोपाल से अपने परिवार सहित मुंबई में हमारे घर अपने बेटे श्याम का इंजीनियरिंग में एडमिशन कराने आए थे.
उनके तीन बच्चों में दो बेटियां और थीं. जब तक हॉस्टल में जगह नहीं मिली, वह हमारे घर में ही रहा. उसके बाद भी जिस दिन भी छुट्टी होती थी, वह हमारे घर आ जाता था. वह पहली बार मुंबई आया था, इसलिए मैं, मेरी छोटी बहन और भाई रोज़ ही कहीं न कहीं उसे घुमाने ले जाते थे. हम सब का साथ उसे बहुत अच्छा लगता, हमें भी उसके आने से घूमने का बहाना मिल जाता था.
श्याम बहुत कम बोलता था, लेकिन कभी-कभी ख़ामोशी भी ज़ुबां से अधिक बोल देती है. उसने कब मुझे अपनी आंखों से ही मूक प्रेम निवेदन कर दिया, पता भी नहीं चला और मैंने भी मौन स्वीकृति देने में देर नहीं की, क्योंकि उसका कम बोलना ही मुझे उसकी ओर बहुत आकर्षित करता था.

        सुधा कसेरा

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