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कहानी- सज़ा 1 (Story Series- Saza 1)  

  मेरे जन्म को अभी कुछ समय बाकी है, लेकिन तुम तो ख़ुशी से बौराई हुई हो. कारण तुम्हारा पहली बार मातृत्व सुख प्राप्त करना नहीं है. वह सुख तो तुम तीन बार प्राप्त कर चुकी हो, लेकिन उसे तुम सुख मानती ही कहां हो? तीनों बार लड़की पैदा करके कौन मां स्वयं को सुखी मानने का नाटक कर सकती है? फिर हमारे यहां तो पुत्र न होने पर मां-बाप को मोक्ष प्राप्त नहीं होता, परलोक नहीं सुधरता. जब तक उनकी चिता को उनका पुत्र अग्नि न दे, उन्हें कैसे सद्गति प्राप्त होगी? उनकी आत्मा को कैसे शांति मिलेगी? यही तो सब कहते हैं और तुम भी तो कहती थीं. प्यारी मां, मुझे पता है मेरे जन्म को लेकर आपके मन में कितना उत्साह, रोमांच व उत्सुकता है. दरअसल, हर महिला की यही स्थिति होती है जब उसे मातृत्व का अथकनीय सुख प्राप्त होने की घड़ी नसीब होती है. विधाता के अद्भुत सृजन को देख वह गद्गद् होती रहती है. बेशक नौ महीनों का लंबा समय उसने काफ़ी तकली़फें सहकर बिताया होता है. उसे असहनीय प्रसव पीड़ा भी झेलनी पड़ती है, लेकिन परिणामस्वरूप विधाता की अनुपम, अद्भुत कृति पाकर वह सारी पीड़ा, दुख-तकलीफ़ पलभर में भूल जाती है. और फिर जब शिशु पुत्र हो तब तो उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहता. उसे लगता है उसके भाग्य खुल गए हैं. सारे जहान के सुख उसे प्राप्त हो गए हैं. हर ओर आनंद-ही-आनंद है. कहीं कोई दुख नहीं, मानो जीवन सार्थक हो गया पुत्र रत्न प्राप्त करके. मेरे जन्म को अभी कुछ समय बाकी है, लेकिन तुम तो ख़ुशी से बौराई हुई हो. कारण तुम्हारा पहली बार मातृत्व सुख प्राप्त करना नहीं है. वह सुख तो तुम तीन बार प्राप्त कर चुकी हो, लेकिन उसे तुम सुख मानती ही कहां हो? तीनों बार लड़की पैदा करके कौन मां स्वयं को सुखी मानने का नाटक कर सकती है? फिर हमारे यहां तो पुत्र न होने पर मां-बाप को मोक्ष प्राप्त नहीं होता, परलोक नहीं सुधरता. जब तक उनकी चिता को उनका पुत्र अग्नि न दे, उन्हें कैसे सद्गति प्राप्त होगी? उनकी आत्मा को कैसे शांति मिलेगी? यही तो सब कहते हैं और तुम भी तो कहती थीं. तभी तो तीन बेटियों के बाद पुत्र होने के मोह में तुमने एक-एक करके तीन कन्या भ्रूणों की हत्या करवा दी थी. पहली भ्रूण हत्या के बाद तुमने राहत की सांस ली थी, “चलो, छुटकारा मिला मुसीबत से.” बेटी को तुम भी तो मुसीबत ही समझती थीं. तुम्हारी सहेली तनूजा ने कहा भी था, “तेरी बेटियां कितनी गुणी, सुंदर और समझदार हैं. तुझे इनकी चिंता होनी ही नहीं चाहिए. आज के ज़माने में तीन बच्चे भी ज़्यादा हैं, फिर क्यों लड़के की चाह में परिवार असंतुलित कर रही है?” लेकिन तुम्हें उसकी बातें पसंद नहीं आई थीं. टका-सा जवाब दिया था, “अगर तेरे घर पुत्र न होता तो तुझे मेरी तकलीफ़ का अंदाज़ा होता. तेरे तो दोनों बेटे हैं, तुझे क्या पता कि लड़की की मां होना, वह भी तीन-तीन लड़कियों की, कितना तकलीफ़देह होता है. ममता का हिलोरे खाता सागर एकदम शांत होने लगता है. सारी रंगीन कल्पनाएं दम तोड़ने लगती हैं, जब एक के बाद एक लड़की पैदा होती है. लड़के की चाह में लंबा इंतज़ार करने के बाद जब लड़की गोद में आती है तो लगता है किसी ने ठग लिया है. नहीं, तू नहीं समझ सकती मेरी व्यथा को.” दूसरी भ्रूण हत्या करवाने के बाद तुम उदास हो गयी थीं. घर आकर पापा के कंधे पर सिर रखकर फफक पड़ी थीं, “कब तक हम लड़कियों की हत्याएं करवाते रहेंगे? क्या हम इतने बदक़िस्मत हैं कि एक बेटे का मुख नहीं देख सकते.” यह भी पढ़ेयौन शोषण: लड़के भी हैं उतने ही अनसेफ… (Child Abuse: Myths And Facts About Sexual Abuse Of Boys) पापा ने धीरज बंधाते हुए कहा था, “उस पर भरोसा रखो. उसके घर देर है, पर अंधेर नहीं. हमारे घर बेटा ज़रूर पैदा होगा.” बेटे की चाह में तुम इतनी बौरा गईं कि विवेक-बुद्धि ताक पर रख बाबाओं, ओझाओं से झाड़-फूंक, गंडे-तावीज़ बंधवाने लगीं. तीर्थयात्रा, पूजा-पाठ, मिन्नतें- मनौतियां सभी कुछ आजमा डाला तुमने. यहां तक कि किसी के कहने पर पुत्र होने की शर्तिया दवा भी मंगा कर खा ली. इस दवा को गाय के दूध के साथ गर्भ धारण करने के छह से आठ सप्ताह के भीतर खाने की हिदायत दी गयी थी. तुमने दिशा निर्देशों का पालन करते हुए दवा खा ली. कितनी भोली-नासमझ हो मां तुम भी. यह भी नहीं जानतीं कि बच्चे के लिंग का निर्धारण तो पहले दिन ही जब स्त्री-पुरुष के बीज मिलते हैं तभी हो जाता है. दवा खाने के बाद तुम काफ़ी तनावमुक्त हो गयी थीं, क्योंकि जिसने तुम्हें यह नुस्ख़ा बताया था, उसके अनुसार शर्तिया लड़का ही होता है. अब तुम दिन-रात, उठते-बैठते पुत्र पैदा होने के सपने ही देखती रहती थी. यहां तक कि बेटे के लिए कपड़े, खिलौने भी ख़रीदने शुरू कर दिए थे तुमने. तीनों बेटियां समझदार हो चुकी थीं. बड़ी पंद्रह की तथा दोनों छोटी भी तेरह व दस की हो गयी थीं. तुम्हारे बदलते व्यवहार से वे भी परेशान थीं. तुम अक्सर ही कह उठतीं, “जब तुम्हारा छोटा भाई आएगा तब ये करेंगे, वो करेंगे. उसके कपड़े-खिलौनों के लिए नई अलमारी ख़रीदेंगे. उसके नामकरण पर बड़ी पार्टी का आयोजन करेंगे. उसके जन्मदिन पर शहर की सबसे अच्छी बेकरी से बढ़िया केक बनवाएंगे...” छोटी बेटी कौतूहल की मुद्रा में सारी बातें सुनती, फिर पूछ बैठती, “मां, तुम हमारा जन्मदिन क्यों नहीं मनाती?” नरेंद्र कौर छाबड़ा

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