कहानी- सुपर किड 4 (Story Series- Super Kid 4)

“देखिए रोहन जी, बच्चे बड़ों के उपदेशों  से एक प्रतिशत भी सीखेंगे या नहीं इसका दावा हम नहीं कर सकते, परंतु बड़ों के आचार-व्यवहार को वे अस्सी प्रतिशत तक स्वयं ग्रहण कर लेते हैं व व्यवहार में ढाल लेते हैं. किसी भी कार्य में बच्चे की रूचि जगाने के लिए पहले उसमें उसकी आस्था व विश्‍वास पैदा करना ज़रूरी है…. रूचि वह स्वयं लेने लगेगा. बशर्ते आप स्वयं उस कार्य-व्यवहार की खिलाफत न कर रहें हो तब…” डॉ. प्रवीण बड़े धैर्य के साथ रोहन व रिया को समझाइश देते जा रहे थे.

“हम कुछ समझे नहीं भाई साहब….”

“देखिए रोहन जी, आपके बच्चे के मेन्टल एबीलीटी टेस्ट से तो साबित होता है कि उसका आय.क्यू सामान्य से भी अधिक ही है, बल्कि मैं कहूंगा कि दक्ष का मस्तिष्क तो ‘जीनियस’ की श्रेणी में आता है. बात दिशाहीन होकर बिगड़ने की भी नहीं है. आपको तो ख़ुश होना चाहिए कि इस आधुनिक युग में जहां बच्चे को बिगड़ने का आमंत्रत्र देते अनेकों साधन पैदा हो गए हैं ऐसे में भी आपका बच्चा उन प्रलोभनों से न आकर्षित है न प्रभावित.”

“फिर पढ़ाई से क्यों विमुख हो गया वह?” रोहन के चेहरे पर चिंतामिश्रित आश्‍चर्य उभर आया.

“तनाव!” डॉ. प्रवीण ने स्पष्ट करते हुए कहा “क्या आप जानते हैं कि आपका बच्चा पिछले कुछ समय से किस मानसिक तनाव से गुज़र रहा है?”

“लेकिन क्यों? हमने तो उस पर किसी भी प्रकार की ज़िम्मेदारी नहीं डाली है, न घर की न बाहर की… कोई भी काम उससे नहीं करवाते हम… पूरी तरह पढ़ने के लिए फ्री है वह…” रिया ने सफ़ाई दी.

“यही तो रिया जी… आपने पूरी तरह पढ़ाई के लिए फ्री करके अनायास ही उसे जता डाला कि अब तो रिज़ल्ट वही आना चाहिए जो आप चाहते हैं.”

“तो इसमें ग़लत क्या है?” रिया अब भी असमंजस में थी.

“देखिए…. आपका दक्ष आम बच्चों से कुछ अलग है. थोड़ा ज़्यादा संवेदनशील, विचारशील और साथ ही अंतर्मुखी भी है… आप लोगों के विचार-व्यवहार पर अत्यधिक सोचने वाला…. शायद आपको इस बात का अनुमान भी नहीं होगा पर आपके द्वारा आपस में किए गए परिसंवादों का उस पर गहरा प्रभाव पड़ता रहा है.” डॉ. प्रवीण ने गहरी सांस लेते हुए कहा.

डॉ. प्रवीण ने गौर से देखा, रिया व रोहन दोनों के ही चेहरे पर अनमने से भावों का उतार-चढ़ाव जारी था. मन-ही-मन उन्हें हंसी आ गई. सोचा बड़ा कठिन व चुनौतीपूर्ण काम है बड़ों को अपनी ग़लती का एहसास कराना. बच्चों की तरह बड़े लोग आसानी से अपनी कमियों को स्वीकार नहीं पाते. पूर्णता के इसी दंभ के बूते पर ही तो वे बच्चों पर शासन करते हैं, भला इसमें कोई सेंघ लगाए यह कैसे बर्दाश्त करेंगे. तभी नौकर ट्रे में गर्मागर्म कॉफी ले आया.

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”लीजिए रोहन जी, हॉट कॉफी विथ चॉकलेट…. मुझे दक्ष ने बताया कि ये आप दोनों का फेवरेट ड्रिंक है…. यू शूड प्राउड ऑफ़ योर चाइल्ड… ही इज वेरीमच केअररिंग अबाउट यू एण्ड योर चॉइस….. सचमुच बड़ा फ़िक्रमंद है वह आप दोनों के बारे में….” डॉ. प्रवीण ने मुस्कुराते हुए कहा. वे रिया व रोहन की मनःस्थिति को सामान्य करने का प्रयत्न कर रहे थे. उनका निशाना सही रहा… अपने प्रति बेटे के मन में इतनी चाह व फ़िक्र जानकर दोनों के चेहरे शिकन विहीन हो गए.

गर्म कॉफी के घूंट के साथ डॉ. प्रवीण ने पुनः बात शुरू की “दक्ष ने बताया कि पापा उसे केवल इंजीनियर बनते देखना चाहते हं… मम्मी चाहती है कि स्पोर्ट्स क्लब उसे इसीलिए जॉइन करवाया है ताकि वह सचिन की तरह ऊंचाई हासिल करे… नाम कमाए…. गिटार में शायद रोहनजी आप की रूचि थी, आप सीख नहीं पाए तो आपने सोचा दक्ष यह सपना पूरा करे. आध्यात्मिक प्रभाव उत्पन्न करने के लिए आप उसे योग, ध्यान आदि करने पर ज़ोर डालते हैं…. उसे शिविरों भेजते रहे हैं. पढ़ाई, खेल, संगीत, अध्यात्म…. सभी क्षेत्रों में आप अपने दक्ष को दक्ष देखना चाहते हैं, पर कभी सोचा है, मनुष्य कोई निर्जीव मशीन नहीं है जिसे आप हमेशा अपने हिसाब से संचालित कर सकें, यह तो एक संवेदनशील जीव है…. भावनाओं से भरा जीव, जिसकी अपनी स्वतंत्र सोच होती है… इच्छाएं, पसंद-नापसंद होती है. जब तक दक्ष बच्चा है उस पर दबाव डालकर आप अपनी इच्छाएं थोप सकते हैं, पर इस तरह क़ामयाबी हासिल नहीं की जा सकती, क्योंकि वह यह तरीका स्वाभाव व स्वाभाविकता दोनों के ही ख़िलाफ है. कल को जब दक्ष वयस्क होगा तब हो सकता है वह अपनी मानसिक स्वतंत्रता के खिलाफ बगावत कर बैठे…. बड़ी विस्फोटक स्थिति होगी वह…

“देखिए रोहन जी, बच्चे बड़ों के उपदेशों  से एक प्रतिशत भी सीखेंगे या नहीं इसका दावा हम नहीं कर सकते, परंतु बड़ों के आचार-व्यवहार को वे अस्सी प्रतिशत तक स्वयं ग्रहण कर लेते हैं व व्यवहार में ढाल लेते हैं. किसी भी कार्य में बच्चे की रूचि जगाने के लिए पहले उसमें उसकी आस्था व विश्‍वास पैदा करना ज़रूरी है…. रूचि वह स्वयं लेने लगेगा. बशर्ते आप स्वयं उस कार्य-व्यवहार की खिलाफत न कर रहें हो तब…..”

डॉ. प्रवीण बड़े धैर्य के साथ रोहन व रिया को समझाइश देते जा रहे थे, साथ ही उनके चेहरे पर आ-जा रहे भावों को बारिकी से पढ़ने का यत्न भी कर रहे थे. कुछ क्षण रुक कर डॉ. प्रवीण ने एकटक रोहन पर नज़रें गड़ा दें…59

 

स्निग्धा श्रीवास्तव

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