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कहानी- तुम्हारी थोड़ी-सी बेसफ़ाई 4 (Story Series-Tumahri Thodi Si Besafai 4)

दीदी पहले से ही भन्नाई हुई थीं, मुझे घूरते हुए बोलीं, “ऐसा है राघव, टाइम नहीं इतना मेरे पास. और वैसे भी जिनका चेहरा चमकता रहता है ना, उनका घर नहीं चमकता.”

बात जिसके लिए कही गई थी, उसने तो सुनी नहीं. वो तीनों बच्चों को खाना खिला रही थी. लेकिन ये बात मेरे दिल में हल्का-सा सुराख कर गई थी.

 

 

 

… “चिंटू, अपने टॉयज समेट कर रखा करो यार.” बच्चे के खिलौने समेटते हुए मैं झुंझला जाता था.
“एक मिनट पापा, ये लो समेट दिए.” वो झट से एक बड़े कार्टन में सारे भरकर मुस्कुरा देता था और मैं थोड़ा और झुंझला जाता था.
“ये तरीका है खिलौने रखने का? छोटी-बड़ी कारें, बस, ट्रैक, टेडी बीयर.. सब एक साथ एक डिब्बे में?”
कौन कहेगा ये खिलौने का डिब्बा है, डस्टबिन की तरह भरा रहता था. और ये चिंटू की मेज़? किताबें हमेशा एक टुकड़ा ज़मीन के लिए लड़ती दिखीं एक-दूसरे को धकेलती हुई. पेन-पेंसिल का डिब्बा भी ग़ज़ब जादुई था. पता नहीं किस-किस कोने में कूद कर जा बैठता था. कभी बिस्तर पर, कभी ज़मीन पर. ना चाहते हुए भी मन बचपन में लौटने लगता था. मुझे अपना कमरा याद आने लगता था.
एक रैक पर करीने से लगी हुई गाड़ियां, ऊपर छोटी, नीचे बड़ी. सबसे नीचे कवर में रखे टेडी बीयर, एकदम साफ़-सुथरे.
हर तरह की किताब की जगह निश्‍चित थी. यहां स्कूल वाली, यहां कॉमिक्स, मजाल है एक किताब कभी इधर से उधर हुई हो? के्रयॉन्स, पेंसिल्स, सब एक ख़ास जगह. मेरा कमरा ऐसा रहता था जैसे स्टेशनरी की दुकान! चिंटू का कमरा देखते ही एकदम से मन खिन्न होने लगता था, इसमें ये करे भी तो क्या करे? बच्चा देखकर सीखता है ना. और ये बच्चा क्या देखता है कि आई कार्ड तो फ्रिज में रखा जाता है. सब इसी तरह चल रहा था और शायद ऐसे ही चलता भी रहता, अगर दीदी-जीजाजी का ट्रांसफ़र हमारे शहर में ना होता. वो यहीं शिफ्ट हो गई थीं, पास में ही.

 

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“वाह दीदी! बड़ी जल्दी आपने घर सेट भी कर लिया.” मैंने बड़ी ललचाई नज़रों से घर का कोना-कोना देखा. ऐसा लग रहा था जैसे मां इस घर को सजाकर गई थीं. दीदी एकदम थकी-हारी मेरे बगल में आकर बैठ गईं, “क्या करें, कल से स्कूल है बच्चों का. तुम्हारे जीजाजी का ऑफिस है, सेट तो करना ही था. चिंटू कहीं ट्यूशन जाता है या टीचर घर आते हैं? हमें भी बच्चों के लिए लगवाना है.”
नीलू ने हैरत से दीदी की ओर देखा, “इतने छोटे क्लास में ट्यूटर की क्या ज़रूरत दीदी? अभी तो मैं ही पढ़ाती हूं.”
दीदी सकपका गई थीं. हल्की-सी नाराज़ भी हो गई थीं. उनको कोई टोक दे, ये उनको कभी बर्दाश्त नहीं था. मैंने बात घुमा दी, “आप टेंशन ना लो दीदी, ट्यूटर ढूंढ़ लिया जाएगा. आप रिलैक्स करो! पार्लर हो आओ. वो क्या होता है हां, फेशियल करवा लो, थोड़ी चमक जाओ.”
दीदी पहले से ही भन्नाई हुई थीं, मुझे घूरते हुए बोलीं, “ऐसा है राघव, टाइम नहीं इतना मेरे पास. और वैसे भी जिनका चेहरा चमकता रहता है ना, उनका घर नहीं चमकता.”
बात जिसके लिए कही गई थी, उसने तो सुनी नहीं. वो तीनों बच्चों को खाना खिला रही थी. लेकिन ये बात मेरे दिल में हल्का-सा सुराख कर गई थी.
जब किसी किताब में कोई लाइन हाईलाइट कर दी जाती है, तो किताब खुलते ही बस उसी पर नज़र अटक जाती है. ठीक इसी तरह मेरी गृहस्थी की एक कमी, जो दीदी ने हाईलाइट कर दी थी, मेरी नज़र वहीं अटकी हुई थी.

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

 

Lucky Rajiv

लकी राजीव

 

 

 

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