कहानी- वट पूजा 4 (Story Series- Vat Puja 4)

“शिकायत तो इसी बात को लेकर है कि तुम साथ चलने की बजाय अलग-अलग रास्तों पर चलने में विश्‍वास करते हो, जबकि तुम्हारी मंज़िल एक ही है. तुम उसके साथ शरीर शेयर कर सकते हो, तो मन शेयर करने में क्या प्रॉब्लम है?” मनस्वी ने बहुत कटु होकर पूछा. “तुम मन की पूरी आज़ादी, पूरा स्पेस चाहते हो तो तन का भी बंधन क्यों स्वीकार किया?”

मनस्वी के प्रश्‍न पर अमर निरुत्तर रह गया.

अमर की भाभी मनस्वी से शंभवी और अमर के बीच फैली उदासी छिपी न रह सकी. उन्होंने कई बार चाहा कि हस्तक्षेप करें, पर पति-पत्नी के बीच कहना उन्हें ठीक न लगा. लेकिन जब उन्होंने देखा कि दोनों के बीच दूरियां ब़ढ़ती ही जा रही हैं, तो उनसे रहा न गया. एक दिन अमर को उन्होंने आड़े हाथों ले ही लिया.

“अमर, मेरी बात को ज़रा समझने की कोशिश करो. इस गुरूर में मत रहो कि तुम्हें शंभवी की ज़रूरत नहीं है या तुम्हें दूसरी कोई मिल जाएगी.

शंभवी जितना स्पेस तुम्हें शायद ही कोई और लड़की दे पाएगी. उसने तुम्हारी इग्नोरेंस, तुम्हारे ईगो को बहुत बर्दाश्त किया है. अपने जीवन में उसकी अहमियत महसूस करने के बाद भी तुम अपने ईगो के कारण हर क़दम पर उसकी उपस्थिति को बुरी तरह नकारते रहे. उसने तुम्हें पूरा स्पेस दिया. लेकिन उसके एडजस्टमेंट को सराहने की बजाय तुमने उसके अस्तित्व को, उसके रिश्ते को ही एक शून्य बना डाला. इस शून्य में भटकते हुए अगर उसकी टूटी हुई डोरी कहीं और बंध गई तो शंभवी को दोष मत देना. अगर ऐसा कभी हुआ तो मैं शंभवी का ही साथ दूंगी. लेकिन ऐसा हो इसके पहले संभल जाओ.” मनस्वी ने तीखी नज़रों से अमर की ओर देखते हुए कठोर स्वर में कहा.

“मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि आज अचानक आपको हो क्या गया है? मैं आज़ादी में विश्‍वास रखता हूं और उसे भी अपना मनचाहा करने से कभी रोका नहीं है मैंने. तब आख़िर शिकायत किस बात की है?” अमर भौंचक्का-सा होकर बोला.

“शिकायत तो इसी बात को लेकर है कि तुम साथ चलने की बजाय अलग-अलग रास्तों पर चलने में विश्‍वास करते हो, जबकि तुम्हारी मंज़िल एक ही है. तुम उसके साथ शरीर शेयर कर सकते हो, तो मन शेयर करने में क्या प्रॉब्लम है?” मनस्वी ने बहुत कटु होकर पूछा. “तुम मन की पूरी आज़ादी, पूरा स्पेस चाहते हो तो तन का भी बंधन क्यों स्वीकार किया?”

मनस्वी के प्रश्‍न पर अमर निरुत्तर रह गया.

“परसों वट पूर्णिमा है. शंभवी को मार्केट ले जाकर उसे अपनी पसंद की साड़ी दिलाओ. यूं होंठ तिरछे करके हंसने की ज़रूरत नहीं है. ये रीति-रिवाज़, तीज-त्योहार रिश्तों को पास लाने के लिए ही बनाए गए हैं और हो सके तो अपने लिए भी शंभवी की पसंद से कुछ ले लेना. तुमको भी अच्छा लगेगा.” और पलभर को अमर के हाथ पर अपने हाथ का दबाव देकर मनस्वी अमर के केबिन से बाहर निकल गई.

अब शंभवी को भी समझाना ज़रूरी है, यह सोच मनस्वी शंभवी से मिलने निकल पड़ी.

“मैं जानती हूं बरगद की पूजा करने या भूखे रहने से कभी भी किसी आदमी की न तो जान बचाई जा सकती है और न ही उसकी उम्र को लंबा किया जा सकता है. लेकिन देखा जाए तो ये छोटी-छोटी बातें हमें एक-दूसरे से जोड़ने में कितनी अहम् भूमिका निभाती हैं. बरगद की पूजा करके तुम अमर की उम्र भले ही न बढ़ा पाओ, पर अपने और उसके रिश्ते को बरगद की तरह मज़बूत करने की पॉज़ीटिव सोच तो अपने अंदर विकसित कर ही सकती हो न. इन रीति-रिवाज़ों को निभाने के पीछे  मूल भावना बस यही होती है कि हम आपस में एक-दूसरे के प्रति जुड़ाव महसूस करते रहें.” मनस्वी ने चाय का एक लंबा घूंट भरते हुए कहा.

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“अमर को अपने स्पेस के सिवा और किसी बात से कोई मतलब ही नहीं है भाभी. तो फिर मैं अपने भीतर उस रिश्ते के लिए पॉज़ीटिव सोच विकसित करके अपने आपको तकलीफ़ क्यों दूं?” शंभवी दर्दभरे स्वर में बोली.

उसके कंधे पर हाथ रखते हुए मनस्वी ने प्यार से समझाया, “मैं तुम दोनों के बीच दख़लअंदाज़ी नहीं करना चाहती थी, इसलिए अब तक चुप रही, पर अब नहीं. वो स्पेस चाहता था तो तुमने भी उसे जोड़े रखने की कोई कोशिश नहीं की. अब मैं चाहती हूं, तुम उसे जोड़ो. बरगद की पूजा करते समय मैं चाहती हूं कि तुम उसकी मज़बूती और छांव की इच्छा पैदा करो. जहां इच्छाएं होती हैं, वहीं पर उन्हें पूरा करने के लिए मनुष्य प्रयत्न करता है.”

और शंभवी की आंखों के सामने पार्क के कोने में लगा वो विशाल बरगद का पेड़ और उसकी सुकून भरी छांव तैर गई. तब शंभवी को महसूस हुआ कि सच में उसे भी इस छांव की कितनी ज़रूरत है.

“आप पूजा करने कितने बजे जाएंगी? मैं आपके साथ ही चलूंगी.” शंभवी ने चाय का खाली कप टेबल पर रखते हुए मनस्वी से पूछा. और शाम को एडीटर महोदय से अमोल के बारे में निवेदन करके शंभवी अमर के साथ मार्केट चली गई. अपने लिए पीली रंग की  साड़ी लेने और अमर के लिए एक शर्ट ख़रीदने.

•abhilasha

     अभिलाषा

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