"चार अक्षर क्या पढ़ लिए सातवें आसमान पर पहुंच गई. तुम्हारी इन्हीं हरकतों से विजय चिढ़ता होगा. अरे रंग-रूप नहीं है, तो कम से कम गुणों से ही पति को रिझा लेतीं, अब नौकरी करेगी, अकेली रहेगी. औरत हो, औरत की तरह रहो." सचमुच वह भूल गई थी कि वह एक औरत है. अब तक वह स्वयं को मां, बहन, बेटी और पत्नी समझती रही थी. अब वह औरत की तरह ही रह कर दिखाएगी.
खिड़की से आकर हवा के झोंके ने छुआ, तो उसकी आंख खुल गई, पर उठने का मन नहीं हुआ. आंखें बंद किए वह अंदर से आने वाली आवाज़ें सुनती रही. महरी का ज़ोर-शोर से बर्तन धोना और सटाक-सटाक झाडू चलाना... साथ में अम्मा के साथ आत्मीयता से बातें करते जाना. नाइन का दाल पीसते हुए किसी के घर की गोपनीय बातें बताना, बीच-बीच में "जिज्जी देखो, और महीन पीसें..." कहना. ताज़े धुले आंगन की सौंधी महक और चाय की महक का गड्डमड्ड होना... धीरे से स्मृतियों की बयार चली. एक भूली-भटकी सी याद आई. कभी इन्हीं क्षणों में अम्मा उसे उठने और काम में लग जाने की चेतावनी देती रहती थी. वह उठ कर अलसाई सी कभी सीढ़ियों पर, कभी देहरी पर बैठ कर जम्हाइयां लेती रहती थी. आज वही अम्मा महरी के किसी प्रश्न के उत्तर में बता रही थीं, "रात बड़ी देर में सोई है..."
नल बंद हो गया तो स्टोव की आवाज़ आने लगी. 'लगता है गैस ख़त्म हो गई.' उसने सोचा. वैसे कुछ भी सोचने का मन नहीं हो रहा था, फिर भी जाने कहां-कहां की बातें याद आ रही थीं, जिन्हें वह बार-बार दिमाग़ से ठेलने की कोशिश कर रही थी.
सूरज की किरणें कमरे में झांकी और हठी सेविका की तरह उसके सिरहाने पसर गई, तो उसे उठना ही पड़ा.
बाहर आई तो सब काम हो चुका था. नहाई-धोई चारू आंगन में खेल रही थी. मां मुहल्ले में बायना भेज रही थीं. इसका मतलब सब जगह उसके आने की पुष्टि हो चुकी है. अब आज से ही मिलने आने वालों का तांता लग जाएगा. सबके मुंह पर एक ही सवाल होगा, "कितने दिन को आई है?"
"नीरू, जल्दी तैयार होकर आओ नाश्ता तैयार है." अम्मा ने रसोई से आवाज़ लगाई.
अम्मा ने चुन-चुनकर उसकी पसंद की चीज़ें बनाई थीं, यह बात अलग है कि वे चीज़ें अब उसे अच्छी नहीं लगतीं. दूध वाले से ज़्यादा दूध देने को कह दिया. मिठाई और फलों से फ्रिज भर लिया. आइसक्रीम जमा दी, गुलाब जामुन, मठरी आदि बनाने के लिए बिन्नू की बहू और नीता को तरह-तरह के निर्देश दिए. मुझे फलां-फलां चाची, ताई, भाभी से मिल आने के लिए कहा. साथ में यह भी कहा कि ढंग से बन-संवर कर जाऊं, ऐसे ही मुंह उठा के न चल दूं.
रात से अब तक लगातार उसके पराए हो जाने के कारण बस न चलने का रोना रोती रहीं. जाने क्यों उसे अम्मा का सारा कार्य व्यवहार किसी कूटनीति का अंश लगता है. लगता है जो कुछ वे कर रही हैं, उसे जता भी देना चाहती हैं कि यह सब तुम्हारे लिए विशेष रूप से किया जा रहा है. इसमें उनकी इच्छा और दिखावे का अनुपात कितना-कितना होता है, ठीक-ठीक पता नहीं लग पाता. उनकी कोई भी भावना उसे भिगो नहीं पाती. लगता है अम्मा उसकी अपेक्षा महरी, नाइन आदि के अधिक नज़दीक हैं. उनसे इस आत्मीयता से बातें करती हैं कि देख कर ईर्ष्या होती है.
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"और सुनाओ, सब लोग कैसे हैं वहां... तुम्हारी सास, विजय.. विजय कब आ रहे हैं?" अम्मा ने पूछा.
"देखो, कब छुट्टी मिलती है." उसने टालने की कोशिश की,
"नीता तुम बहुत मोटी होती जा रही हो, डाइटिंग किया करो,"
"क्या करूं दीदी, जब भी डाइटिंग की सोचती हूं अम्मा कुछ न कुछ बना कर रख देती हैं. मुश्किल से गुलाब जामुन ख़त्म हो पाए थे कि तुम आ गई. अब दिवाली बीत जाए तब डाइटिंग शुरू करूंगी,"
एक भरा-पूरा संयुक्त परिवार नाश्ता कर रहा था. छुटका राजू कहीं भागने की योजना में मशगूल था. चाय पीती अम्मा के चेहरे पर दो ब्याह निबटा देने का संतोष दमक रहा था, तो बिनू का वही चेहरा भविष्य के सपनों और प्रणय की लालिमा से रंगा था.
नीता की स्वप्निल कोरी आंखें उसमें और भाभी में, अपने सपनों का साम्य तलाश रही थीं. एक वह ही थी जो खाली डिब्बे की तरह अपना रीता मन लिए बैठी थी. उसका इरादा जानकर इनकी ख़ुशियां कायम रह पाएंगी? इतनी ही ख़ातिरदारी होती रहेगी उसकी? चारु का हाथोंहाय घूमना बरक़रार रह पाएगा? पर वह भी क्या करें? कब तक घुटती रहे? कब तक ख़ुद को मारती रहे.
"कहां खो गई दीदी? लगता है जीजाजी की याद आ गईं." भाभी ने छेड़ा. वह मुस्कुराकर रह गई.
"दीदी, यह पहले ही बता दो, कितने दिन के लिए आई हो, ताकि हम तुम्हारे जाने के बाद की स्थिति की तैयारी पहले से कर लें यानी तय कर लें कि अम्मा किस स्थान पर आंखों पर पल्ला रख कर सुबकेंगी."
"भाभी... अगर में कभी न जाऊ तो..."
एकाएक जैसे पार्श्व संगीत बदल गया हो या रात के सन्नाटे में झनाक की आवाज़ के साथ कोई बर्तन गिर गया हो. सब स्तब्ध, अवाक् होकर उसका मुंह ताकने लगे. पांच मिनट तक सब उसकी बात समझने की कोशिश करते रहे फिर अम्मा बोली, "हम समझे नहीं बिल्लो."
"तो कोशिश करो समझने की, मैं अब और वहां नहीं रह सकती." वह उठकर चली आई.
शाम तक यह ख़बर ज़रूर पापा और बिन्नू तक पहुंच चुकी होगी, क्योंकि खाने के समय माहौल भारी था. चारु की बाल सुलभ हरकतें भी किसी को खुल कर हंसा नहीं पा रही थी. नीता की कोशिश ज़ारी थी, पर हार कर वह भी चुप हो गई.
अगले ही दिन से दिन बहुत बड़े और उबाऊ लगने लगे थे. अम्मा का पूजा-पाठ बढ़ गया, मानो वे भगवान को ख़ुश करके समस्या का कोई सुखद हल निकलवा लेंगी. बिजू की बहू का अधिकतर समय कमरे में बीतने लगा. अकेली नीता हर समय बिखरे सूत्र समेटने की कोशिश में लगी रहती थी.
पंद्रह-बीस दिन निकल गए इसी तरह, सबको एक क्षीण सी आशा थी कि शायद डाकिया ही कोई ख़ुशख़बरी दे जाए. डाकिया आता, पत्र लाता, पर उनमें एक भी पत्र विजय का न होता. वह प्रतीक्षा भी नहीं कर रही थी. जिन हालातों में वह आई थी उनमें किसी पत्र की आशा करना ही व्यर्थ था. विजय की नज़र में पुरुष कभी कोई ग़लती नहीं करता, अगर कभी सिद्ध भी हो जाए कि वे ग़लत थे, तो माफ़ी मांगना उन्हें अपनी शान के ख़िलाफ़ लगता है.

उस दिन डाक आने के समय वह बाहर ही खड़ी थी, डाकिया आया और चला गया अंदर आई तो अम्मा जैसे कमर कसे बैठी थीं, "आज भी पत्र नहीं आया?
"नहीं."
"लेकिन क्यों? कुछ तो बताओ. बात क्या है?"
वह बिना बोले कमरे में चली आई. पीछे से काफ़ी देर तक अम्मा की बड़बड़ाहट सुनाई देती रही, "ज़्यादा पढ़-लिख कर दिमाग़ ख़राब हो गया है. बाप की बिगाड़ी हुई है... लड-झगड़ कर चली आई. मुहल्ले में किस-किस का मुंह बंद करेंगे..." यानी चिंता उसको लेकर नहीं, मुहल्ले वालों को लेकर है.
पलंग पर लेट कर उसने कमरे में नज़र घुमाई, यह कमरा कभी उसका अपना था. यहां उसका एकछत्र साम्राज्य था. पलंग पर बिखरी किताबें, खुटियों पर लटके कपड़े, सब कुछ अस्त-व्यस्त होता था.
किताबें खिसका कर वह लेटने की जगह बना लेती थी. अक्सर उसकी अनुपस्थिति में अम्मा उन्हें सिलसिलेवार रख जाती थी. पर दो दिन बाद सब ज्यों का त्यों. आज वही कमरा मोती सा दमक रहा था, नीता की ख़ूबसूरती का कुछ अंश मानो कमरे में जुड़ गया हो. करीने से लगा सामान, मेज पर सौंदर्य प्रसाधन की शीशियां, तरह-तरह के क्लिप, चिमटियां, फीते... उसके अस्तित्व को मानों रगड़-रगड़ कर मिटा दिया गया था.
उसकी शादी को तीन वर्ष हुए हैं. इस बीच वह कई बार यहां आ चुकी थी, पर दो-चार दिन के आने और कई दिन टिके रहने में फ़र्क़ होता है. हर बार औपचारिकता बढ़ती गई. इस बार तो लगता है जैसे सब कुछ वह पारदर्शी सी देख रही हो. कितना कितना दूर हो गए सब उससे. लगता है जैसे वह किसी सुविधा संपन्न होटल में ठहरी हो, जहां अपनत्व के सिवा सब कुछ मिलता है. अपनत्व तो शादी से पहले ही खो गया था, उसका सांवला रंग और अम्मा का सीमित बजट, शादी में रुकावट बने हुए थे. उसकी शादी एक बड़ा भार बन गई थी अम्मा के लिए. वे सोचतीं, कौन-सा दिन होगा जब वह जाएगी और वे बिन्नू की शादी करेंगी.
उसने सोचने का प्रयत्न किया कि विजय उसके अपने क्यों नहीं हो सके? कहीं उसी के पूर्वाग्रह तो आड़े नहीं आए. शायद विजय के सामंती संस्कारों ने उसे तोड़ा है. उनकी पत्नी की परिभाषा अलग है, वह उसमें फिट नहीं होती. उसकी भी पति की अलग परिभाषा है. उसने एक ऐसे पति का स्वप्न देखा था, जो उसका सहचर और मित्र हो. जिसके साथ वह हर भावना की साझेदारी कर सके. लेकिन पति मिला प्रतिद्वंद्वी जिसकी नज़र में उसका न अलग व्यक्तित्व होना चाहिए, न महत्वाकांक्षा,
लगता है जैसे दो ही दिन पहले की बात हो. विजय का दक्षिण भारतीय दोस्त आया था. उसने बड़े मन से खाना बनाया, दोस्त ने भी स्वाद ले लेकर खाया और ख़ूब तारीफ़ की. फिर एकाएक पूछ बैठा, "अच्छा भाभी आप दोनों की अरेंज मैरिज हुई थी या...."
"नहीं यार, लव मैरिज थी. यह बात अलग है कि शादी में दोनों के मां-पिता और रिश्तेदार शामिल हुए थे."
"फिर तो कोई बात नहीं वरना मैं कहता कि तुम बड़े लकी हो, जो भाभी जैसी लड़की मिली."
"ये भी कम लकी नहीं, जो बैठे बैठाए कमाऊं दूल्हा मिल गया वरना यू नो हमारी तरफ़ सांवले रंग को लेकर... जरा सब्ज़ी देना तो..."
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खाते-खाते लगा मानो खाने के साथ किसी ने रेत मिला दिया हो. उसी किरकते खाने को वह दांत पीस-पीस कर खाती रही.
एलबम दिखाने बैठे.
"यार, बड़े अच्छे पोज़ लिए हैं बेटी के, सब तुमने खींचें हैं?"
"नहीं, सब तो नहीं कुछ भाई ने खींचे हैं."
उससे रहा नहीं गया, "कौन से चारु के फोटो? ये तो मैंने खींचें थे, तुम भूल गए क्या?"
"क्या? वाह! आपने फोटोग्राफी सीखी है."
"नहीं, बस यों ही. दरअसल फोटोग्राफी और साहित्य प्रेम मुझे विरासत में मिला है फादर से."
"हां भई, इनके फादर तो 'जैक ऑफ ऑल' हैं, पर ये यह भूल जाती हैं कि साथ में मास्टर ऑफ 'नन' भी हैं."
दोस्त के जाते ही घमासान युद्ध छिड़ गया था, "बीच में मेरी बात काटने की क्या ज़रूरत थी?"
"तो तुम्हें इतना बड़ा झूठ बोलने की क्या ज़रूरत थी कि हमारी लव मैरिज हुई है."
"तुम इस लायक ही कहां हो कि किसी को तुमसे लव करने की नौबत आए,"
"तो क्या फ़र्क़ पड़ गया, शादी तो हुई ना."
"एहसान मानो कि मां-पिता का बोझ उतर गया. नहीं तो कुंवारी बैठी होती अभी तक."
उसे दंशित करने का कोई भी मौक़ा विजय हाथ से नहीं जाने देते थे. उसके हर काम में कमी निकालना, तिल का ताड़ बना देना उनका प्रिय शग़ल था और कदम-कदम पर अपमानित करना आए दिन का खेल.
उसे अपने आप पर तरस आने लगा. शुरू से वह सिर्फ़ प्रयोग की वस्तु बनी रही है. मां-पिता की पहली संतान का प्रयोग, समय से पहले आ जाने के कारण जिसे उन्होंने लज्जित होते हुए पाला. जल्दी-जल्दी तीन भाई-बहन और आ गए, तो वह समय से पहले ही बड़ी बना दी गई. बचपन में ही किशोरी बन गई. किशोरी बन भी नहीं पाई थी कि युवा मान ली गई और यौवन आया ही था कि बुढ़ापा आ गया.
सिर पर अम्मा के हाथों का स्पर्श उसे आर्द्र कर गया. उसे याद नहीं कि कभी मां ने उसके बाल सहलाए हों. पिलाजी का स्पर्श वह बख़ूबी पहचानती है, पर अब तो वे भी तटस्थ, मूक दर्शक बने हुए हैं. आर्द्रता धीरे-धीरे अंदर तक जा रही थी कि एकाएक वह सतर्क हो गई.
"बिट्टो, कहो तो क्या बात है? शायद हम कोई हल निकाल लें."
"कुछ नहीं."
"ऐसे कब तक चलेगा?
"बस कुछ दिन और, मैने दो-चार जगह नौकरी के लिए फार्म भरे हैं."
"क्या तुम नौकरी..?"
"क्यों? क्या हुआ? मैं अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हूं."
"इसी घमंड ने तो लड़कियों के दिमाग़ ख़राब कर रखे हैं. इतना आसान नहीं होता अकेले रहना. बिना पति के पत्नी भीड़ में भी अकेली होती है समझी."
अब तक मेरे सिर से उनका हाथ हट चुका था. एकाएक वे पैंतरा बदल कर बोलीं, "देखो, साफ़ सी बात है. हमें अभी नीता का ब्याह करना है, छोटे को पढ़ाना है. फिर हमारा क्या भरोसा, आज हैं कल नहीं, तब तुम किसके सहारे रहोगी, तुम्हारे सामने लड़की है. इस तरह रूठ कर चल देने का लड़कपन तुम्हें शोभा नहीं देता. मियां-बीवी की लड़ाई भी कोई लड़ाई है? जाकर माफ़ी मांग लो, कहो तो हम भी चलें, तुम्हें छोड़ आएं, विजय को भी समझा देंगे."
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"लेकिन अम्मा जब हमारे मन नहीं मिलते, तो साथ रहने से क्या फ़ायदा?"
"मन क्या होता है. दोनों के काम अलग-अलग हैं. उन्हें कमा कर लाना है, तुम्हें घर चलाना है, इसमें मन कहां टकराते हैं. सच पूछो तो मियां-बीवी २४ में से कुल आठ घंटे साथ रहते हैं, उसी समय में पति को ख़ुश रखना चाहिए."
"अम्मा, अब ज़माना बदल गया है. ये तब की बातें हैं जब ख़ुश रखने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ पत्नी की होती थी. तब पत्नियां होती थीं अंगूठाछाप..."
"चार अक्षर क्या पढ़ लिए सातवें आसमान पर पहुंच गई. तुम्हारी इन्हीं हरकतों से विजय चिढ़ता होगा. अरे रंग-रूप नहीं है, तो कम से कम गुणों से ही पति को रिझा लेतीं, अब नौकरी करेगी, अकेली रहेगी. औरत हो, औरत की तरह रहो."
सचमुच वह भूल गई थी कि वह एक औरत है. अब तक वह स्वयं को मां, बहन, बेटी और पत्नी समझती रही थी. अब वह औरत की तरह ही रह कर दिखाएगी.
संबंधों में बंध कर औरत कमज़ोर हो जाती है. सारे संबंध भूल कर वह अपना अस्तित्व बनाएगी. नहीं जाएगी वह विजय के पास, वह अपने पैरों पर खड़ी होगी. अपनी बेटी को पालेगी और पुरुष के बगैर भी रह कर दिखाएगी. नहीं जाएगी वह विजय के पास. नहीं... नहीं..? तो फिर कहां?
इस व्यवहार के सहारे यहां भी कब तक रह पाएगी. इन सबसे ऊपर अम्मा के ताने, वे उसे यों ही नहीं छोड़ देंगी. बेहतर है कि उनके किसी नए उपाय सोचने के पहले वह चल पड़े. उसे चल ही पड़ना चाहिए. जब ताने ही सुनने हैं, तो यहां क्यों, वहां क्यों नहीं. वह विजय के साथ रह कर ही अपने पैरों पर खड़ी होगी, संघर्ष करेगी, अपने अधिकारों के लिए लड़ेगी, साथ ही नौकरी भी करेगी, या तो विजय को सुधरना पड़ेगा या कोई ठोस निर्णय लेना पड़ेगा.
सुबह उसने जब शाम की गाड़ी से वापस जाने का फ़ैसला सुनाया तो सब चौंक गए. अम्मा का चेहरा गुलाब की तरह खिल गया. उत्तेजना में' उनके हाथ की चाय छलक गई, "इत्ती जल्दी. इत्ती जल्दी तैयारी कैसे होगी. बेटी को यों खाली हाथ थोड़े ही जाने देंगे." फिर पापा को संबोधित कर बोलीं, "सुनो, विदाई की साड़ी और चारु के कपड़े लेते आओ. बहू थोड़ी मठरी और बेसन के लड्डू बना दो. अचार भी रख देना. छोटेऽऽ कहां गया? मिठाई का डिब्बा ले आना."
पापा और बिनू के चेहरे का तनाव हट गया. उन्होंने राहत की सांस ली. नीता ज़रूर कुछ उखड़ी उखड़ी नज़र आई.
अप्रत्याशित रूप से तीन बजे दोपहर में जब उसने अपना सामान बरांडे में निकालकर रखा तो सब हडबड़ा कर अपने-अपने कमरों से निकल आए. अम्मा पल्ले से हाथ पोंछती हुई रसोई से बाहर आई, "अरे इत्ती जल्दी और ये सामान नहीं रखा?"
"मैं कुछ नहीं ले जाऊंगी. छोटे, तुम रिक्शा ला दो बस." उसने दृढ़ता से कहा तो सब सकते में आ गए. पापा और बिनू स्टेशन साथ चलने के लिए तैयार होने लगे तो उसने उन्हें भी बलपूर्वक रोक दिया.
रिक्शा आ गया, वह चारु को लेकर बिना किसी की ओर देखे रिक्शे में बैठ गई. छोटे भी ज़बरदस्ती साथ बैठ गया. रिक्शा चला तो आंखें धुंधला गई, गले में एक गोला सा अटक गया, पता नहीं मायका छूटने के दुख से या विजय के तानों की आशंका से.

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