याद आते हैं मुझे पुराने सर्दी के दिन
जब महिलाएं नहीं दिखती थीं
दोपहर में ऊन कांटों के बिन.
बिछी होती थी घरों के बाहर
धूप में चारपाइयां
जिन पर बैठी होती थी स्त्रियां
पकड़ हाथों में सलाइयां
अब सोचती हूं अक्सर
क्योंकर हुआ है यह परिवर्तन?
घरों से बाहर निकलने वाली
स्त्रियों की संख्या है बढ़ी
या सोशल मीडिया मोबाइल की
गिरफ्त में है वो फंसी?
मॉडर्न कहलाने की चाह में
फेसबुक इंस्टा पर इनके
रील्स की है भरमार
पुरानी कला, संस्कृति व परंपरा से
नहीं वो पहले जैसा लगाव
पहले आंखों के कैमरे में ही
समेट लिए जाते थे स्वेटरो के डिज़ाइन
क्योंकि उपलब्ध नहीं था
यूट्यूब या कैमरे वाले मोबाइल
रेडीमेड सर्दियों के वस्त्रों से
भरा होता है अब हर बाज़ार
पर अपनेपन और प्यार का
उनमें है अभाव
घर के बड़े बूढों के बनाए स्वेटरों की
बात ही थी ख़ास
कंपकपाती सर्दी में भी मिल जाता था
गर्माहट का एहसास
रेडीमेड वस्त्रों का अब ज़्यादा है प्रचलन
क्या कम क़ीमत ही है इसका मुख्य कारण?
या पसंदीदा परिधान पहन साइज चेक कर
दूर कर लेते हैं हर कन्फ्यूजन?
आज स्पेशल ऑर्डर पर हैंडमेड चीज़ें है
बनाई और बनवाई जाती
किन्तु विडम्बना यह कि
समय जो लगता हैं
उसकी बहुधा सही क़ीमत
नहीं लगाई जाती
शायद यही कारण है
लुप्त होते जा रहे हैं
हैंडमेड वाले सर्दी के परिधान
जिनसे मिलता था
प्राकृतिक गर्माहट व
अपनों का प्यार भरा आशीर्वाद...
- आशा किरण

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