बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं. हम जो शब्द, जो भाव, जो प्रतिक्रियाएं उनके सामने रखते हैं, वही धीरे-धीरे उनका स्वभाव बन जाता है. इसलिए जब किसी बच्चे के सामने उसके माता-पिता, दादा-दादी या किसी क़रीबी रिश्तेदार के बारे में नकारात्मक बातें कही जाती हैं तो उसका असर केवल उस पल तक सीमित नहीं रहता, वह असर उसके व्यक्तित्व की नींव में उतर जाता है.
घर की खिड़की से धूप आती है, आंगन में बच्चे खेल रहे हैं और भीतर बैठा कोई बड़ा अंजाने में ऐसे शब्द बोल देता है, जो बच्चे के मन में हमेशा के लिए घर बना लेते हैं. हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि बच्चे केवल हमारी बातों को नहीं सुनते, वे हमारी भावनाओं को पीते हैं, बिल्कुल बिना छाने. इसलिए उनके सामने कुछ ग़लत कहने से बचें और निम्न बातों का भी ख़्याल रखें.
शब्द सिर्फ़ आवाज़ नहीं होते
हम बड़े अक्सर यह सोचकर निश्चिंत हो जाते हैं कि बच्चा है, समझता नहीं होगा. जबकि सच्चाई यह है कि बच्चा बहुत कुछ समझता है, शायद हमसे भी ज़्यादा फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि वह अपनी समझ को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता.
जब मां, पिता के बारे में कटु शब्द कहती है या पिता मां को लेकर तंज कसता है, तब बच्चा भीतर ही भीतर ख़ुद को दो हिस्सों में बंटता हुआ महसूस करता है. क्योंकि मां भी उसकी है और पिता भी. किसी एक के ख़िलाफ़ बोला गया शब्द, उसे अपने ही अस्तित्व के ख़िलाफ़ लगा हुआ शब्द लगता है.
रिश्तों का अपमान, बच्चे का अपमान
बच्चे अपने माता-पिता को अपनी पहचान का हिस्सा मानते हैं. वे यह नहीं जानते कि वयस्कों के बीच मतभेद क्या होते हैं, अहंकार क्या होता है या वैचारिक टकराव किसे कहते हैं. वे बस इतना जानते हैं कि ये मेरे अपने हैं.
ऐसे में जब उन्हीं अपने लोगों के बारे में अपमानजनक बातें कही जाती हैं तो बच्चे का आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. उसे लगता है कि अगर मेरे अपने ही इतने बुरे हैं तो मैं कैसा हूं? यही से शुरू होती है आत्म संदेह की वह यात्रा, जो आगे चलकर भय, असुरक्षा और चुप्पी में बदल जाती है.
तलाक से ज़्यादा तकलीफ़देह है शब्दों का ज़हर
अक्सर माना जाता है कि तलाक़ बच्चों को सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुंचाता है. लेकिन मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि तलाक़ से ज़्यादा नुक़सानदायक होता है माता-पिता का एक-दूसरे के ख़िलाफ़ ज़हर उगलना.
दो अलग हो चुके माता-पिता अगर बच्चे के सामने एक-दूसरे के लिए सम्मान बनाए रखें तो बच्चा ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है. लेकिन अगर हर मुलाक़ात में एक पक्ष दूसरे को दोषी ठहराए तो बच्चा मानसिक रूप से दो पाटों के बीच पिसने लगता है.
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बच्चा जज नहीं है
हम कई बार बच्चों को अनजाने में जज की कुर्सी पर बैठा देते हैं. उनसे पूछते हैं कि तुम्हारे पापा ने क्या कहा? मम्मी वहां क्या करती हैं?
यह सवाल नहीं होते, ये बोझ होते हैं. बच्चा न तो सच्चाई का भार उठा सकता है और न ही पक्ष चुन सकता है. जब उससे ऐसा करने की उम्मीद की जाती है तो वह या तो झूठ बोलना सीखता है या चुप रहना. दोनों ही स्थितियां उसके मानसिक विकास के लिए ख़तरनाक हैं.
घर पहला स्कूल है
बच्चा रिश्तों का पहला पाठ घर में ही पढ़ता है. वह वहीं सीखता है कि असहमति कैसे जताई जाती है, ग़ुस्सा कैसे व्यक्त किया जाता है और मतभेदों को कैसे सुलझाया जाता है.
अगर घर में संवाद की जगह आरोप हों, समझ की जगह ताने हों और स्नेह की जगह कटाक्ष तो बच्चा भी वही भाषा सीखता है. फिर हम बड़े होकर उससे सभ्यता, सहिष्णुता और संस्कारों की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
सम्मान एक सीखी हुई आदत है
बच्चों को सम्मान सिखाया नहीं जाता, दिखाया जाता है. जब वे देखते हैं कि मां पिता से मतभेद के बावजूद सम्मान से बात कर रही है या पिता मां की असहमति को शांति से सुन रहा है तो वही दृश्य उनके भीतर संस्कार बनकर उतरता है. याद रखिए, बच्चा आपकी सलाह नहीं, आपका व्यवहार अपनाता है.
चुप रहना भी एक उत्तर होता है
हर बात का जवाब देना ज़रूरी नहीं होता, ख़ासकर बच्चों के सामने. अगर किसी रिश्ते में कड़वाहट है तो उसे बच्चों की आंखों से दूर रखिए. जरूरी नहीं कि हर भाव बाहर आए. कई बार बच्चों के सामने चुप रह जाना, बहुत कुछ सही दिशा में बचा लेता है.
हम अपने घाव बच्चों से नहीं भर सकते
हम बड़े जब आहत होते हैं तो सहारे की तलाश करते हैं. लेकिन यह सहारा अगर बच्चों को बना लिया जाए तो यह उनके बचपन के साथ अन्याय है. बच्चे हमारे भावनात्मक सहायक नहीं हैं. वे हमारी ज़िम्मेदारी हैं.
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एक बेहतर पीढ़ी की नींव
अगर हमें एक संवेदनशील, आत्मविश्वासी और संतुलित पीढ़ी चाहिए तो हमें अपने शब्दों की जिम्मेदारी लेनी होगी. बच्चों के सामने रिश्तों को लेकर संयम, सम्मान और संतुलन दिखाना होगा. क्योंकि बच्चे वही बनते हैं, जो वे रोज़ देखते और सुनते हैं.
अंत में बस इतना कहना है...
अगली बार जब किसी अपने के बारे में ग़लत कहने का मन करे और बच्चा पास बैठा हो तो एक पल रुक जाइए. शायद वही रुकना, किसी बच्चे का बचपन बचा लें. क्योंकि बच्चों के सामने रिश्तों की भाषा बिगड़ती है तो ज़िंदगी की भाषा भी बिगड़ जाती है. मैं तो यही कहूंगी कि थोड़ा ठहरिए, थोड़ा सोचिए और ज़िंदगी को बेहतर शब्द दीजिए.
- स्नेहा सिंह

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