"आओ, बहुत दिनों के बाद आई हो." उसने कहा तो उसे खांसी आ गई. वह कुछ देर लगातार खांसता रहा, उस खोखली खांसी के पीछे मालती ने उसके छलनी हो चुके फेफड़ों को अनुभव किया और सोचा कि वह बस कुछ ही समय का मेहमान है और जब एक दिन वह मर जाएगा, तो इस दुकान का क्या होगा?
पान की दुकान के बूढ़े मालिक ने देखा, तो उसकी चुंधियाई हुई आंखों में चमक आ गई. उसने अपने कपड़ों को ज़रा सा झाड़ा, उनकी सिलवटों को साफ़ किया और ठीक से बैठ गया.
मालती की चाल में थकावट थी. पान की दुकान के पास आकर वह कुछ क्षणों के लिए रुकी और फिर सीढ़ियां चढ़कर दुकान के अन्दर चली गई.
"आओ, बहुत दिनों के बाद आई हो." दुकानदार ने कहा, तो उसे हल्की सी खांसी आई. वह कुछ देर लगातार खांसता रहा. खांसते हुए वह मालती के चेहरे की उदासी को भी देख रहा था और सुंदरता को भी. मालती के साधारण से नक्शीं वाले चेहरे में विचित्र सा आकर्षण था, जो उदासी के कारण और भी बढ़ गया लगता था. उस समय दुकानदार की आंखों में तरस भी था और ललचाई हुई भूख भी.
मालती उसकी ओर यद्यपि देख नहीं रही थी, पर उसकी दृष्टि को अनुभव कर रही थी. उसके प्रश्न का उसने कोई उत्तर नहीं दिया और चुपचाप कुर्सी पर बैठ गई.
आख़िर जब दुकानदार की खांसी रुकी, तो उसने फिर कहा, "कहो, क्या सेवा कर सकता हूं? आज तो बहुत उदास दिख रही हो."
मालती हल्का सा मुस्कराई, "यहां आकर ख़ुश कौन हुआ है? आदमी की बदक़िस्मती है, जो उसे यहां लाती है.'
"कैसी बातें करती हो, अच्छे-बुरे दिन आदमी पर आते ही हैं. आज चेहरे पर उदासी लेकर आई हो, तो कल ख़ुशी लेकर भी आओगी."
मालती ने बिना कुछ कहे हाथ में पकड़ा डिब्बा सामने मेज पर रख कर खोला. उसमें एक हार जगमगा रहा था. वह सोने का हार था, जिसमें सफ़ेद और हरे मोती जड़े हुए थे.
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दुकानदार ने हार को एक नज़र देखा और फिर मालती की ओर मुंह उठा कर कहा, "कितने रुपए चाहिए?"
"सात सौ."
"सात सौ." दुकानदार के मुंह से निकला.
"हर बार इसकी क़ीमत बढ़ाती ही जाती हो. पिछली बार छह सौ में रख गई थी, उससे पहले पांच सौ में और सबसे पहले सिर्फ़ तीन सौ में ही."
"अगली बार आऊंगी, तो पूरा एक हज़ार मांगूंगी." मालती ने उसकी आंखों में झांक कर कहा.
"आख़िर भरोसे की भी तो कोई क़ीमत होती है."
"बस, भरोसे ही की क़ीमत है, वरना इस हार के तो मैं तीन सौ भी न दूं." उसने अपनत्व जताते हुए कहा.
"अगली बार हज़ार मांगोगी, तो हज़ार भी दूंगा. तुम्हारी बात कब टाली है मैंने."
मालती मुस्कुराई तो, बूढ़े की आंखें और भी चमक उठीं. वे उस मुस्कराहट को जैसे पी जाना चाहती थीं.
घर पहुंच कर मालती को लगा, जैसे कोई पीछे रह गया था और वह अकेली ही आई थी. उसके दिल में दर्द था, किसी प्रिय वस्तु को खो देने का दर्द. जीवन में वह बहुत कुछ खो चुकी थी. बस, एक हार बच रहा था, जो उसे बहुत प्रिय था. पर आज वह उसे भी दे आई थी. आज से पहले भी वह उसे पांच बार गिरवी रख चुकी थी, जो हर बार कुछ एक महीनों के बाद उसके पास वापस आ जाता था. पर इस बार पता नहीं कब आए, उसने सोचा शायद न ही आए. वे दिन अब नहीं रहे.
जैसे उन दिनों को देखने के लिए मालती ने पीछे की ओर नज़र दौड़ाई- दस, बारह, पन्द्रह साल पीछे की ओर... इस घर में रहते हुए पन्द्रह साल बीत गए थे. लगता था, जैसे अभी कल की बात हो. कभी यह भी लगता था, जैसे पन्द्रह, बीस, पच्चीस साल पहले की बात हो.

मालती इस घर में आई थी, तो किसी ने कहा था, "मालती, तुम आई हो, तो आज यह घर भरा-भरा सा लगता है." मालती को भी घर भरा-भरा सा लगा था. बस, यही थोड़ा सा सामान था तब भी, पर आज मालती को यह घर खाली-खाली सा लग रहा था, क्योंकि कोई यहां से चला गया था. वह व्यक्ति जो कहीं दूर से उसे लाया था और उसके साथ साल भर इस घर में रहा था. आख़िर किसी दूसरी स्त्री के चक्कर में पड़ कर चलता बना था. मालती उसकी प्रतीक्षा करती रही थी और अंत में मर्द की जात को कोसती हुई चुप हो गई थी. वह व्यक्ति फिर कभी लौट कर नहीं आया.
मालती के पास जो थोड़ी सी पूंजी थी, वह ख़त्म होने लगी थी. हाथ खींच कर ख़र्च करने पर भी वह पूंजी ख़त्म होने से रह नहीं पाई थी. और फिर एक दिन मालती अपना हार लिए पान की दुकान के मालिक के साथ सौदा कर रही थी. यह तेरह साल पहले की बात थी. वह दुकानदार तब भी आज जैसा ही बूढ़ा लगता था. उसने तीन सौ में हार गिरवी रख लिया था. बेचने पर वह हार पांच-छह सौ में बिक भी सकता था, पर
मालती उसे बेचना नहीं चाहती थी, किसी क़ीमत पर भी बेचना नहीं चाहती थी. उस हार के साथ उसकी कितनी भावनाएं जुड़ी हुई थीं. वह हार उसने कितने अरमानों से बनवाया था.
फिर कुछ महीनों में जब वे तीन सौ रुपए भी ख़त्म होने को आए थे और मालती को भविष्य अन्धकारमय दिखने लगा था, तो उसने किसी की दो आंखों को अपनी ओर देखते हुए पाया था. वैसे तो और भी बहुत सी आंखों को वह अपनी ओर देखते हुए पाती थी, पर उन दो आंखों में उसे कुछ और ही बात दिखाई दी थी. उसने सोचा था कि भविष्य के अन्धकार में वे आंखें उसे शायद प्रकाश दे सकेंगी, और फिर, कुछ ही दिनों के बाद उसका भविष्य प्रकाशित हो उठा था. मालती उस व्यक्ति के साथ जीवन के दिन काटने लगी थी.
फिर एक दिन मालती उस व्यक्ति के साथ पान की दुकान पर पहुंची थी, और उस व्यक्ति ने ब्याज की रकम के साथ तीन सौ रुपए चुकाकर हार छुड़ा लिया था. जब उसने हार मालती के गले में पहनाया था, तो मालती की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था.
अभी दो महीने भी नहीं बीते थे कि वह व्यक्ति मालती को छोड़कर चला गया था या कहना चाहिए कि मालती को उससे छुटकारा मिल गया था. उसने जिस प्रकार मालती के लिए हार का सौदा किया था, उसी प्रकार वह मालती का भी सौदा करना चाहता था. मालती की ख़ुशक़िस्मती थी कि वह उसके जाल में पूरी तरह फंसने के पहले ही बच गई थी, वरना पता नहीं उसका क्या हाल होता. और मालती ने मर्द की जात पर बार-बार थूका था.
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कुछ महीनों के बाद मालती दोबारा पान की दुकान पर गई और हार के चार सौ रुपए मांगे. दुकानदार किसी भी हालत में तीन सौ से ज़्यादा देने को तैयार नहीं था. पर फिर अचानक उसने अपनी बूढ़ी आंखों से मालती को कुछ इस प्रकार देखा था कि अन्त में हार रख लिया था और चार सौ रुपए मालती के हाथ में थमाते हुए कहा था, "आज तो नहीं, पर कभी तुम्हें इसकी कद्र होगी. किसी भी दूसरी जगह तुम इसके दो सौ से ज़्यादा नहीं पा सकती."
घर पहुंच कर मालती उन चार सौ रुपयों का हिसाब लगाने लगी थी कि आख़िर उनसे कब तक गुज़ारा होगा और जब एक दिन वे रुपए ख़त्म हो जाएंगे, तो क्या होगा? आख़िर उसका भविष्य क्या है? यह लम्बा जीवन किस तरह से कटेगा?
वह कई दिन तक सोचती रही थी. उस मंझधार में उसे कहीं किनारा दिखाई नहीं दे रहा था, न ही कोई चप्पू दिखाई दे रहा था, जिससे वह अपनी नाव को मंझधार में से निकाल सकती.
आख़िर उसे एक तरीक़ा सुझा था, पर उसके बारे में वह कई दिनों तक फ़ैसला नहीं कर पाई थी. उसका मन डगमगाता रहा था, बार-बार उलझन में फंसता रहा था. पर अन्त में वह अडिग कदमों पर खड़ी हो गई थी.
कुछ ही अर्से बाद मालती किसी दूसरे व्यक्ति के साथ दूसरी बार पान की दुकान पर गई और उस व्यक्ति ने ब्याज की रकम के साथ हार के चार सौ रुपए चुकाए थे और मालती उसके हाथों से हार पहन कर बेहद ख़ुश हुई थी.
उस दिन जब दुकानदार ने मालती के साथ उस व्यक्ति को देखा था तो उसकी आंखें आश्चर्य से भर गई थीं. वह हैरान था कि मालती ने भला ऐसे व्यक्ति को क्यों चुना था. वह व्यक्ति इतना कुरूप था कि देखकर घिन होती थी.
हां, मालती को भी उसे देखकर घिन होती थी. वह कुरूप भी था और 'मर्द की जात' भी था. वह कुछ ही दिन मालती के साथ रहा था. एक दिन मालती ने उसे किसी आवारा कुत्ते की तरह हमेशा के लिए ठुकरा दिया था.

इस बार मालती को अजीब सा अनुभव हुआ था. उसके मन में ख़ुशी भी थी और ग्लानि का भाव भी था, संतोष भी था और पश्चात्ताप भी था. वह कई दिन तक बेचैन सी रही थी. पर फिर उसने सोचा था, इसके सिवा और चारा ही क्या है? इस संसार में जीना कोई आसान काम तो नहीं है.
तब से मालती एक छोटा सा, अपने आप में सिमटा हुआ जीवन बिताती आ रही थी. उसके जीवन में कोई नहीं था. जो भी आया कुछ समय के बाद चला गया और जो नहीं आया, उसके लिए वह आज तक तरसती रही थी. जीवन की शून्यता में एक बच्चा आ जाता, तो उसे किसी बात की कमी न रहती. तब जीने को दिल चाहता, पर उसकी कोख तो जैसे हमेशा के लिए बांझ थी, और अब तो यह जीवन कई बार इतना वीरान सा लगता था कि वह कभी सोचती कि इससे तो मौत ही अच्छी है.
चालीस की उम्र को पहुंचने पर मालती थक गई थी. बुढ़ापा कितनी जल्दी आ गया था. फिर, एक ऐसा अकेलापन था, एक ऐसी शून्यता थी कि जीवन उस कुएं के समान था, जिसका पानी सूख गया हो और उसकी गहराई में अंधेरा ही अंधेरा हो.
सात सौ रुपए काफ़ी बड़ी रकम थी. मालती सोचती कि गिरवी रखे हार की मियाद पूरी होने तक कोई न कोई और व्यक्ति मिल ही जाएगा, जो उसके साथ पान की दुकान पर जाकर हार छुड़ा देगा. वैसे, अब वे दिन नहीं रहे थे. क्या पता, कब कोई व्यक्ति मिले? हो सकता है, न ही मिले. इस उम्र में कौन होगा, जो उसकी ख़ातिर आंखें मूंद कर सात सौ रुपये ख़र्च कर देगा? जिसकी आंखें हैं, वह सात सौ में देखभाल कर अच्छा माल ख़रीदेगा,
समय बीतता रहा और वह रकम कम होती गई. आख़िर एक दिन मालती खाली हाथ लिए बैठ गई. ऐसी हालत होने के पहले तो हर बार हार छुड़ा लिया जाता था. पर इस बार?
मियाद के कुछ ही दिन बाकी रह गए थे कि मालती बोझिल कदम उठाती हुई इस बार अकेली ही पान की दुकान पर गई. उसे देखकर दुकानदार की चुन्धियाई हुई आंखों में चमक आई.
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"आओ, बहुत दिनों के बाद आई हो." उसने कहा तो उसे खांसी आ गई. वह कुछ देर लगातार खांसता रहा, उस खोखली खांसी के पीछे मालती ने उसके छलनी हो चुके फेफड़ों को अनुभव किया और सोचा कि वह बस कुछ ही समय का मेहमान है और जब एक दिन वह मर जाएगा, तो इस दुकान का क्या होगा?
खांसी रुकने पर दुकानदार ने फिर पूछा, "कहो, क्या सेवा कर सकता हूं? इस बार तो अकेली ही आई हो." वह तिजोरी में से उसका हार निकालने लगा.
हार निकाल कर जब वह मालती के सामने आया, तो मालती ने एक नज़र हार को देखा, जो हमेशा की तरह जगमगा रहा था. फिर उसने एक नज़र दुकानदार की ओर देखा, जिसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी. आख़िर उसने कहा, "मैं इसे छुड़ाने नहीं आई. और रुपए मांगने भी नहीं आई."
"तो?"
मालती कुछ देर चुप बनी दुकानदार की ओर देखती रही. फिर उसने कहा, "मैं इसे पहनना चाहती हूं." वह एक क्षण के लिए रुकी.
"अगर तुम चाहो, तो मुझे पहना सकते हो." दुकानदार की आखें एकदम खुल गई और उसके मुंह से निकला, "सचमुच?"
"हां, सचमुच" मालती ने धीमे से कहा. दुकानदार ने हार को कांपते हुए दोनों हाथों में पकड़ा और तब दो कदम आगे बढ़ कर उसी प्रकार कांपते हुए हाथों से उसे मालती के गले में डाल दिया.
तभी उसे खांसी आई और उसने खांसते हुए ही कहा, "एक उम्र ही बीत गई है तुम्हारे इंतज़ार में. मुझे पता था, एक दिन तुम आओगी, ज़रूर आओगी. इतने बरसों से बस इसी इंतज़ार में जी रहा था."
तभी उसने बड़ी नरमी से मालती का हाथ पकड़ा और उसे दुकान के पिछले कमरे में ले गया, जहां उसका घर था.
- सुखबीर
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