
शर्म से मेरी आंखें झुक गई थीं. हुआ क्या था और मुझे लगा क्या था? जिस एक घटना की वजह से विनय ने मेरे लिए इतना बड़ा सपना देखा, मुझे एक नई दिशा दिखाई, उसी घटना का दूसरा पहलू देखते हुए मुझे नकारात्मकता घेरती रही. कहते हैं न, कान वही सुनते हैं जो सुनना चाहते हैं.
दिसंबर के कुछ दिन उसी तरह बीत चुके थे, जैसे पिछले दो महीने बीते थे... उदास, बेरौनक़. बाहर रहो, तो घर जाकर अकेले बैठने का मन करता था, घर के भीतर रहो, तो वहां होनेवाली बातें और भी ज़्यादा डराने लगती थीं. पापा-मम्मी तो समझाते ही थे, उनके अलावा बुआ भी आई हुई थीं. उनके पास गिनी-चुनी एक ही बात रहती थी, “क्या गुंजन, नौकरी चली गई तो क्या? लड़कियों का तो ब्याह हो जाए बस, आदमी कमाता रहे. जीवन चलता रहता है.”
“ऐसा नहीं होता है बुआ, पढ़ाई-लिखाई, नौकरी सबके लिए उतनी ही ज़रूरी है, चाहे लड़का हो या लड़की.” कहने को तो मैं कह जाती थी, लेकिन पता था, इनको ये सब समझ आएगा नहीं. मैं ख़ुद ही टॉपिक बदलकर बचने की कोशिश करने लगती थी. घर में किसी की ओर से भी वो जवाब नहीं आता था, जो मुझे सुनना था. कोई ये क्यों नहीं कहता कि फिर से लग जाएगी नौकरी, कोशिश करती रहो... सबके पास एक ही बात, क्या हुआ जो चली गई? क्या यही बात भइया की नौकरी जाने पर कही जा सकती थी? भइया की याद आते ही मन और ख़राब हो गया. बजाय इसके कि मुझे बैंगलुरू बुलाकर वहां नौकरी की उम्मीद बंधाएं, अपने किसी परिचित की डिटेल मम्मी-पापा के पास भेज रहे हैं, मेरे रिश्ते के लिए. मम्मी तो फोटो देखकर ही उसको अपना दामाद मान चुकी थीं, जैसे उस दिन अपनी मुस्कान छुपाते हुए कहने भी लगीं, “विनय से आमने-सामने मिल लेना, आ रहा है लखनऊ.”
“हैं? कौन विनय? कौन आ रहा है लखनऊ? अच्छा वो लड़का, जिसके बारे में भइया ने आप लोगों को बताया था.. मम्मी, अभी मुझे किसी ने नहीं मिलना.” मैंने लैपटॉप अपने चेहरे के आगे रख लिया था. मम्मी उसको बंद करते हुए बोलीं, “एक बार मिलने से शादी तो तय नहीं हो जाएगी. ज़्यादा मत ऐंठा करो.”
मुझे पता था, ये मिलना कोई सामान्य मिलना तो होगा नहीं. दुनियाभर का ड्रामा खेला जाएगा. उसको घर पर बुलाया जाएगा. घर को सजाया-चमकाया जाएगा. बीस तरह के पकवान बनेंगे. मेरे लिए कपड़े फाइनल होंगे कि मैं क्या पहनूंगी. इन सबसे बचने का एक ही तरीक़ा था, “ठीक है, मिल लूंगी.. लेकिन यहां घर पर नहीं, बाहर.” मम्मी तो मानने ही वाली थीं, लेकिन बुआ भी तो थीं. तुरंत भड़क गईं, बस फिर क्या था. एक शर्त इधर से, एक उधर से, अंत में ये तय हुआ कि लड़का यानी विनय पहले घर पर आएगा, उसके तुरंत बाद हम लोग बाहर चले जाएंगे.”
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इतवार की सुबह इतनी चुस्त तो कभी होती नहीं थी, जितनी थी. हालांकि विनय के साथ केवल चाय-नाश्ता ही होना था, तो उतना सिरदर्द नहीं था. थोड़ी ही सफ़ाई हुई, थोड़ा ही हल्ला मचा. पापा ने अपने पास बुलाकर बस इतना कहा, “देखो गुंजन, विनय से तुम्हारी जो भी बात हो, बस इतना ध्यान रखना कि वो तुम्हारे भाई के साथ काम भी करता है.”
हां तो मैं कौन सा भद्दा मज़ाक करने वाली थी उसके साथ? पापा से शुरू हुआ हिदायत का सिलसिला मम्मी और बुआ तक बढ़ता चला गया, जब तक मैंने खीजकर रोक नहीं दिया, “अरे ठीक है! दो लोग मिलकर बात करेंगे, इसमें इतना टेंशन क्यों लेना है? क्या वो लड़का भी इतना परेशान होगा?”
मम्मी ने राज़ खोला, “नहीं, उसको तो पता भी नहीं है कि वो यहां क्यों आ रहा है? तुम्हारे भाई ने कुछ सामान भेजा है, वही देने आ रहा है.” ये तो नया ट्विस्ट था कहानी में! मैं तो दंग रह गई थी. जब वो लड़का सच्चाई जानता ही नहीं है, तो मैं कैसे उसके साथ बाहर जाकर बात करूंगी और क्या बात करूंगी? इससे पहले कि इस बारे में और ज़्यादा बात होती, डोरबेल बज चुकी थी.
उसके आने के क़रीब बीस मिनट बाद मैं ड्रॉइंगरूम में दाख़िल हुई. “हेलो.” मुझे देखते ही वो मुस्कुरा कर बोला, जवाब देते हुए उसको ध्यान से देखा. हल्की दाढ़ी-मूंछें, काले फ्रेम का चश्मा, ब्लैक शर्ट, ब्लू जींस, चेहरे पर संजीदगी... कुल मिलाकर आकर्षक और प्रभावशाली व्यक्तित्व!
हम सब लोग इधर-उधर की सामान्य बातें कर रहे थे, वो बात अलग थी कि बीच-बीच में बुआ मेरी ओर देखतीं, फिर उसकी ओर, उसके बाद दोनों हाथ जोड़कर छत की ओर देखतीं. मेरे लिए हंसी रोकना मुश्किल हो रहा था, तब तक मम्मी ने चाय का प्याला विनय की ओर बढ़ाते हुए मुझसे कहा, “गुंजन! विनय पहली बार लखनऊ आया है, घुमा लाओ. उसको चिकनकारी का सामान लेना है. तुमको तो पूरा आइडिया है, कहां क्या मिलेगा.” अच्छा, ये तरीक़ा निकाला इन लोगों ने? मुझे ये नहीं समझ आया कि विनय ने सचमुच शॉपिंग की बात की भी थी क्या?
“बुआ, आप भी चलिए.. आपको एक कॉटन साड़ी लेनी थी न...” न चाहते हुए भी मैं अपने आपको ये कहने से रोक नहीं पाई. सबके चेहरे देखने लायक थे. मम्मी-पापा ने एक दूसरे को घूरा था. बुआ तुरंत अपना घुटना सहलाते हुए मना करने लगी थीं, बस विनय के भाव छुपे रह गए, वो फोन में कुछ देख रहा था.
कार में बैठते ही मैंने विनय से पूछा, “ये कार किसकी है?”
“मेरे रिलेटिव रहते हैं यहां, उनकी कार है. उन्हीं के घर रुका हूं.” मन में आया पूछ लूं, तो उनके साथ जाकर घूमते लखनऊ... ख़ैर! सामान्य बातें रास्ते में होती रहीं. दो-तीन जगह घूमने के बाद मुझे ऐसा लगा कि उसको कोई ख़ास शौक है नहीं पुरानी इमारतें देखने का. मैंने ख़ुद ही पूछ लिया, “सीधे शॉपिंग पर चलें.”
“हां, पहले कहीं कॉफी पी लेते हैं.” एक बात तो थी, उसके साथ बात करना बहुत सहज था. किसी भी मुद्दे पर बहुत आसानी से अपनी बात कहना तो उसका गुण था ही, सामने वाले को भी कहने का पूरा मौक़ा देता था. मेरी पढ़ाई-लिखाई, पुरानी जॉब के बारे में काफ़ी कुछ पूछने के बाद उसने अचानक पूछा, “आप हमेशा ही ग़ुस्से में रहती हैं या आज कुछ ख़ास है?”
“सॉरी, अगर आपको कुछ ख़राब लगा तो, मैं ग़ुस्से में नहीं हूं. कुछ कहा क्या मैंने ऐसा?” तब तक वेटर कॉफी के बड़े-बड़े मग के साथ एक काग़ज़ भी रख गया था, जिसमें नए साल पर होनेवाली पार्टी की जानकारी दी गई थी. मैंने पढ़ते हुए खीजकर कहा, “पता नहीं, न्यू ईयर के साथ हैप्पी क्यों जोड़ देते हैं, सबके लिए नया साल अच्छा हो, ज़रूरी तो नहीं.”
“यही, इसी ग़ुस्से की बात मैं कर रहा था. जब से मिला हूं, आपका मूड उखड़ा हुआ सा लग रहा है.” मैं एक पल के लिए झिझकी, उसके बाद सब कुछ बताती चली गई. कैसे ऑफिस में लोगों की छंटनी हुई, कैसे जॉब चली गई, हताशा ने आकर घेर लिया, कुछ भी अच्छा लगना बंद हो गया... सब कुछ बता दिया.
“ये सब लाइफ का पार्ट है गुंजन.”
उसके इतना कहते ही मुझे और खीज हुई, “कहना आसान है, जो झेलता है, वही समझता है... घर में भी यही एटीटयूड है सबका, नौकरी गई तो गई क्या हुआ? और भी बहुत कुछ है करने के लिए.” मेरा इशारा मेरी शादी की बातचीत की ओर था. यही तो हो रहा था घर में. इधर मैं नौकरी ढूंढ़ने के लिए परेशान हूं, उधर घर में सबको यह लग रहा था कि चलो शादी ही कर देते हैं. हालांकि यह सब विनय से मैं खुलकर कह नहीं पाई, क्योंकि उसको तो पता भी नहीं था कि हम दोनों मिल क्यों रहे हैं.
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चिकनकारी का सामान पसंद करते समय मैंने नोटिस किया कि विनय ने बार-बार मेरी पसंद की तारीफ़ की. एक बार कहा भी, “आप जो पसंद कर रही हैं, वो किसको ख़राब लग सकता है.” तब तक थोड़ी दूर पर बैठी एक फैमिली की बातें सुनकर हमारा ध्यान उधर गया. एक लड़की अपनी शादी के लिए शॉपिंग कर रही थी, वहां माहौल थोड़ा गर्म था. मैंने उधर देखा ही था कि वो उठकर मेरे पास आई, “आप मेरी हेल्प कर देंगी प्लीज़! मेरे साथ घर के बड़े आए हैं, उनकी और मेरी पसंद बिल्कुल भी मैच नहीं कर रही है. मुझे अपनी एंगेजमेंट के लिए चिकनकारी का एक गाउन लेना है और देखिए ना, ये लोग मुझे क्या दिखा रहे हैं.”
मुझे अटपटा तो लगा, लेकिन मैंने उसको मना नहीं किया. मैंने प्रयास किया कि उसके घरवालों का दिल भी ना टूटे और लड़की की पसंद के कपड़े भी सेलेक्ट हो जाएं. थोड़ी ही देर में एक गाउन उसको थमा कर मैंने कहा, “अच्छा, ये पहनकर आओ.” जैसे ही वो ट्रायल रूम से बाहर निकली, उसने तो भावुक होकर मुझे थैंक्स कहा ही, उसके घरवालों ने भी मुस्कुरा कर अपनी सहमति जताई.
“आपने तो कमाल कर दिया, गुंजन!” विनय ने तारीफ़ भरी निगाहों से मुझे देखते हुए कहा.
“डिज़ाइनर हूं, यही पढ़ा है, इसी फील्ड में काम किया है. इसमें इतनी तारीफ़ की कोई बात नहीं.”
जब हम लोग शोरूम से बाहर निकले, तब वह फैमिली भी बाहर खड़ी हुई मिल गई. उस लड़की ने आगे बढ़कर फिर से मुझे थैंक्स कहा. उसके वहां से जाते ही विनय ने कुछ ऐसा कह दिया जो मुझे भीतर तक अखर गया, “वैसे सही कहते हैं आपके घर के लोग.. नौकरी के अलावा भी बहुत कुछ ऐसा है जिसमें ख़ुश रहा जा सकता है.” यह कहते हुए विनय ने उस लड़की की ओर इशारा किया. मैं समझ गई, यहां भी बात मेरी शादी की हो रही है. मैं किसी तरह अपने ग़ुस्से पर नियंत्रण रखते हुए थोड़ी देर ही रुकी और बुझे मन से घर चली आई.
घर पहुंचते ही सबकी आंखों में एक ही सवाल था, जिसका जवाब मेरे चेहरे पर साफ़ लिखा था. पापा ने कुछ पूछा नहीं. रात में खाना खाने के बाद मम्मी और बुआ मेरे कमरे में आकर माहौल बनाने लगी थीं.
मैंने अपनी बात साफ़-साफ़ कह दी, “बुआ, मैं जिस लड़के को अपने लाइफ़ पार्टनर के रूप में देखती हूं वो विनय जैसा नहीं है. मुझे एक दोस्त चाहिए, जो मेरे सपनों को, मेरे तौर-तरीक़ों को समझते हुए साथ आगे बढ़े. उसको तो मेरी नौकरी...” मेरी बात पूरी होने से पहले ही बुआ चिल्लाने लगी थीं, “भाड़ में जाए तुम्हारी नौकरी! शादी से ज़्यादा ज़रूरी कुछ नहीं होता है, लड़का इतना अच्छा कमा रहा है, करना क्या है तुमको नौकरी करके...” यहां तक भी होता तो ठीक था, उसके बाद बुआ ने मम्मी को समझाना शुरू किया. बात तो पहले ही बिगड़ रही थी, लेकिन अब अति हो रही थी.
बुआ झुंझला गई थीं, “तुम लोगों ने गुंजन को ग़लत ढंग से पाला है. लड़की की पढ़ाई-लिखाई इतनी होनी ही नहीं चाहिए कि बिगड़ जाए. नौकरी का कीड़ा भरा है दिमाग़ में.” मैंने एक लंबी सांस खींची, बुआ को अपने पास लाकर बैठाया. धीरे-धीरे उनके हाथ सहलाते हुए कहना शुरू किया, “आपने मुझसे अक्सर कहा है, जब फूफाजी चले गए तब आपको बहुत परेशानी हुई, रुपए पैसे की भी हुई, है न बुआ? आपके पास ऐसी डिग्री होती, जिससे आप कमा सकतीं, तो ये सब नहीं होता न?”
बुआ चाहकर भी कुछ नहीं कह पा रही थीं, मेरी बात चुपचाप सुन रही थीं. ये उनके जीवन का कड़वा सच था जो उनके सामने लाना बेहद ज़रूरी था, “एक बात और है बुआ.. पहले ज़माना कुछ और था, अब सब पढ़ रहे हैं, सब बाहर निकलकर काम कर रहे हैं. ऐसे में लड़कों की नौकरी ज़रूरी और लड़कियों की नौकरी केवल टाइमपास क्यों मानी जाती है? मैं क्या करूं अपनी पढ़ाई का? इतने सालों मेहनत करके जो हासिल की, उस डिग्री में आग लगा दूं?” इतना कहकर मैं रोने लगी थी.

पता नहीं, बुआ को मेरी बात समझ में आई या नहीं, लेकिन उस रात के बाद से मम्मी की समझ में परिवर्तन ज़रूर दिखाई दिया. मेरे लिए इतना ही बहुत था. मैं जिस मानसिक द्वंद्व में थी, उसको कोई समझने वाला मेरे घर में है, मेरे पास है, ये राहत की बात थी. इस बीच विनय के दो-तीन मैसेज आए, मेरा हालचाल पूछा, मेरा जवाब हमेशा- ‘ठीक हूं’ ही रहा, इससे ज़्यादा एक शब्द भी नहीं. ये अच्छा हुआ था कि घर में ‘विनय’ नाम को लेकर बातें बंद थीं, मुझे क्या पता था कि अगले कुछ दिनों में ये नाम फिर से इतने बार लिया जाएगा!
‘नए साल के सेलिब्रेशन से तो आपको चिढ़ है, लखनऊ में सन्नाटा रहेगा फिर तो..’ एक सुबह अचानक विनय का मैसेज आना और वो भी इस तरह का? सच कहूं तो मैं अपनी मुस्कान रोक नहीं पाई थी, लेकिन अगले ही पल संभलकर लिखा था- ‘सबके लिए सेलिब्रेशन की वजह अलग-अलग होती है.’ तुरंत जवाब आया था- ‘आपके लिए एक वजह है मेरे पास, बताऊं? कॉल करता हूं.’ समय के खेल निराले होते हैं. जिस दिन मैं विनय से मिली थी, उसके बाद चिढ़ का एक अलग स्तर था. उसके अगले दिन ये मैसेज आता तो चिढ़ को दुगुना कर जाता, लेकिन इतने दिनों बाद मैसेज आना और फिर फोन पर बात होना.. समय बहुत कुछ सामान्य कर देता है. “कैसे हैं आप?”
“मैं ठीक हूं, आपसे कुछ डिस्कस करना था.” धड़कन बढ़ गई थी, अब इसकी तरफ़ से शादी की बात तो नहीं? “बोलिए.” मेरे कहते ही विनय ने मुझे लखनऊ में हुई बातें याद दिलाना शुरू की, मैंने उसे बताया था कि मुझे डिज़ाइनिंग का कितना शौक था. उसके बाद चिकनकारी गाउन वाली घटना भी उसने याद दिलाई. सारी बातों को एक साथ रखने के बाद उसने मुझसे अपना डिज़ाइन स्टूडियो खोलने की बात की. मैं तो सपनों में उड़ने ही लगी थी, लेकिन फिर लगा, ये सपना ही है बस!
“ये इतना आसान नहीं होगा विनय!”
“क्या गुंजन! तुम्हें इतना एक्सपीरियंस है, तुमने यही पढ़ाई की है, किस काम आएगी वो? जिस फील्ड में तुमने जॉब की है, उसी से जुड़ा हुआ है ये सब, पीछे क्यों हट रही हो?” बात करते-करते वो आप से तुम पर आ चुका था. मैंने महसूस किया कि मेरे स्टूडियो को लेकर उसका उत्साह दिखावा नहीं था, उसने बहुत सारी जानकारी भी हासिल की थी. एक-एक प्वाइंट मुझे समझा भी रहा था. अगले दो-तीन दिनों तक मैं इसी सिलसिले में कुछ लोगों से मिली. विनय से भी बात होती रही.
हफ्ते भर के अंदर ही स्थिति स्पष्ट हो चुकी थी. मुझे लगने लगा था कि ये सब उतना भी मुश्किल नहीं, जितना लग रहा था.
रात को विनय को फोन किया, तो मेरी आवाज़ में ख़ुशी साफ़ सुनी जा सकती थी, “क्या बात है! आज तो मैडम हंसकर बात कर रही हैं, अच्छा देखो चिढ़ मत जाना.” विनय ने फोन उठाते ही कहा.
“नहीं चिढ़ूंगी पक्का! आज बहुत कुछ पॉज़िटिव हुआ है, लग रहा है जल्दी ही स्टूडियो का काम शुरू भी हो जाएगा.” विनय ने आराम से पूरी बात सुनी, उसके बाद कुछ सोचकर पूछा, “पार्टी बनती है इस बात पर?”
“हां, बिल्कुल. आप जब लखनऊ आएंगे, तभी हो जाएगी.” एक पल के लिए सन्नाटा रहा, फिर धीरे से जवाब आया, “कल मिलो फिर, उसी जगह. शाम को आठ बजे.” इतना कहकर विनय ने फोन रख दिया.
मुझे कितना कुछ पूछना था, क्या वो यहां लखनऊ में है? या अचानक आने का प्लान बन गया? घर क्यों नहीं आ जाते? कहीं और मिलते हैं, वहीं पर क्यों? इनमें से कुछ भी मैं पूछ नहीं पाई. हालांकि जब घर से निकल रही थी तब याद आया कि आज तो उस कैफे में न्यू ईयर की पार्टी मनाई जा रही होगी. मेरी मनोदशा पहले जैसी होती तो मैं मना कर देती, लेकिन जब भीतर उजाला हो, तो बाहर की रोशनी भी सुहाती है.
“विनय को कल लंच पर बुला लेना, हम लोग भी मिल लेंगे.” जाते समय मम्मी ने जैसे ही कहा, मुझे हंसी आ गई, “आपने अभी तक उसे दामाद मानना छोड़ा नहीं, हम दोस्त हैं मम्मी.”
“और तुमने ही कहा था कि लाइफ पार्टनर के साथ दोस्ती वाला रिश्ता होना चाहिए, कहा था कि नहीं?” मम्मी ने मुझे मेरी ही बातों में उलझाकर रख दिया था. पूरे रास्ते मैं यही सोचती रही कि आख़िर मुझे चाहिए क्या? मान लो मैं आगे बढ़ने के लिए सोचूं भी, ज़रूरी तो नहीं कि विनय भी यही सोचे! इसी उधेड़बुन में जैसे ही कैफे की पार्किंग में कार लगाई, थोड़ी दूर पर ही हाथ में सफ़ेद फूलों का गुच्छा लिए विनय दिखाई दिया. मैं कार के भीतर ही बैठी रही, एकटक देखती रही. लंबा सा सफ़ेद कोट पहने हुए, बार-बार घड़ी में समय देखता हुआ वो लड़का किसी भी लड़की के सपनों का राजकुमार हो सकता था.
“हाय!” दूर से ही मैंने हाथ हिलाया.
“लेट हो गई हैं मैडम.” लेट तो मैं हो ही गई थी. कितना कटकर रही मैं, पता नहीं इस बीच क्या-क्या हो गया हो. विनय का जुड़ाव कहीं और...
“कहां खो गई? चलो, ऊपर चलें.. टैरस पर पार्टी है.” वहां का नज़ारा तो कुछ और ही था. सफ़ेद फूलों और सफ़ेद ही कपड़े से पूरी सजावट की गई थी. कुर्सियां, मेज़, सब कुछ सफ़ेद. मैंने देखा अधिकतर लोग सफ़ेद रंग के ही कपड़े पहने हुए थे.
“क्या ड्रेस कोड व्हाइट था? आपने भी पहना हुआ है, मुझे भी बता देते न. सबसे अलग दिख रही हूं.” मैंने आसपास देखते हुए, नाराज़गी दिखाई.
“तुमको बता देता कि पार्टी में आना है, तो तुम साफ़ मना कर देती. वैसे भी, तुम कुछ भी पहनकर आती.. अलग ही दिखती.” गिरते तापमान का असर था या विनय की बातों का, मेरा चेहरा ठंडा हो गया था. कोने की एक टेबल पर बैठे, कॉफी की चुस्की भरते हुए सब कुछ कितना भला लग रहा था. बस मेरे मन के भीतर एक दुख था, विनय को ग़लत समझने का. मुझे लगा कि ये मौक़ा है, जब सॉरी बोल देना चाहिए.
“उस दिन जब हम लोग मिले थे, जब शॉपिंग की थी, मैं अचानक चली आई थी, उसके बाद आपके मैसेज वगैरह को भी मैंने इग्नोर किया. मुझे... मुझे इन सबके लिए सॉरी बोलना था.” किसी तरह मैं इतना ही बोल पाई थी. विनय ने और कुछ कहने की बजाय सीधे पूछा, “वैसे उस दिन हुआ क्या था?”
“मैं नौकरी जाने की वजह से बहुत परेशान थी. घर में सबका कहना था कि नौकरी की टेंशन क्यों लेनी, शादी कर लो. जो बात इतनी इरिटेटिंग लगती है, वही बात आपने कह दी थी तो...” तब तक वेटर आकर स्नैक्स रखने लगा था. हम चुप रहे, उसके जाते ही विनय ने पूछा, “मैंने? मैंने कब कहा था? मैं तो ऐसा सोचता भी नहीं हूं. करियर अपनी जगह है, उसको क्यों इग्नोर करना?”
मैंने शोरूम के बाहर खड़ी लड़की वाली बात याद दिलाई, “वो लड़की, जिसकी शादी होने वाली थी, जिसका गाउन पसंद करवाने में मैंने हेल्प की थी. उसकी ओर इशारा करके आपने कहा था न कि.. मतलब शादी करके भी ख़ुुश रहा जा सकता है.”
मेरे इतना कहते ही विनय के चेहरे पर मुस्कान दिखी. उसके बाद उसकी हंसी नहीं रुकी. मैं चुपचाप कॉफी पीती रही. विनय की हंसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी.
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“तुम भी गुंजन.. तुम भी न...” विनय ने बस इतना कहा, उसके बाद फिर हंसी का फव्वारा फूट पड़ा. थोड़ी देर बाद ही उससे बोलते बना, “मैंने कहा था कि और कुछ करके भी ख़ुश रहा जा सकता है. मैंने ये नहीं कहा था कि इसकी तरह शादी कर लो. मेरा मतलब था कि जिस तरह तुमने उसका और घरवालों का इंटरेस्ट समझते हुए उसको कपड़े पसंद करवाए, अपने हुनर को पहचानते हुए इसी फील्ड में अपना काम शुरू करो. तभी तो मैंने वो सब तुमको सजेस्ट किया.”
शर्म से मेरी आंखें झुक गई थीं. हुआ क्या था और मुझे लगा क्या था? जिस एक घटना की वजह से विनय ने मेरे लिए इतना बड़ा सपना देखा, मुझे एक नई दिशा दिखाई, उसी घटना का दूसरा पहलू देखते हुए मुझे नकारात्मकता घेरती रही. कहते हैं न, कान वही सुनते हैं जो सुनना चाहते हैं. मेरे लिए विनय की ओर देख पाना भी संभव नहीं हो पा रहा था, उधर बैकग्राउंड में म्यूज़िक की आवाज़ तेज़ होती जा रही थी, बातें करना भी मुश्किल था.
“मैं उधर आ जाऊं?” विनय ने ज़ोर से पूछा, मेरे हां कहते ही वो बगल में आकर बैठ गया. “तुम इतना नर्वस क्यों हो रही हो?”
“इतना कुछ ख़राब मैंने आपके बारे में सोच लिया. दरअसल शादी शब्द इतना हावी हो गया था कि...” मेरे इतना कहते ही विनय ने पीछे मुड़कर देखा, जैसे चेक करना हो कि हमारी बातें कोई सुन तो नहीं रहा है.
“एक बात पूछूं गुंजन? उठकर चली मत जाना प्लीज़.” “नहीं जाऊंगी.” विनय के चेहरे पर बेचैनी साफ़ दिख रही थी. थोड़ा रुककर बात बढ़ाई, “तुमको अभी भी ये सब.. मतलब, डेटिंग, रिलेशनशिप, शादी की बात.. इन सबसे प्रॉब्लम होती है? अभी तो तुम करियर को लेकर पॉज़िटिव हो.” मैं क्या ही कहती? कैसा सवाल था ये? बहुत सोचकर भी मैं जवाब नहीं दे पाई, सवाल ही पूछ लिया, “आप ये क्यों पूछ रहे हैं?” विनय ने थोड़ी देर तक कॉफी मग के हैंडल की ओर देखा, एक बार मेरी ओर देखा. उसके बाद फिर मग पर नज़रें जमा दी, “नाराज़ मत होना. एक्चुअली मैं जब पहली बार तुमसे मिला था, तब से ही.. समझ जाओ अब, मान लो प्रपोज़ कर रहा हूं...” मैं अपने आपमें सिमटी जा रही थी, बिना एक भी शब्द बोले. बोलने को था ही क्या? विनय ने झिझकते हुए हाथ आगे बढ़ा दिया मैंने तुरंत थाम लिया था.
“मैंने अपनी मम्मी को भी बता दिया है गुंजन... लेकिन तुम्हारी फैमिली? अंकल, आंटी, बुआ, वो लोग आसानी से मानेंगे क्या?” मैं बताना चाह रही थी कि मेरे परिवार वाले कब से हाथों में फूल लिए खड़े हैं कि हम अग्नि के इर्द-गिर्द फेरे लें और वो लोग फूलों की बारिश करें.
विनय ने फिर पूछा, “मैं आकर मिल लूं? कब?” मैंने अपनी हंसी रोकते हुए कहा, “कल आ जाइए लंच पर, नए साल का पहला दिन है, नई शुरुआत के लिए अच्छा रहेगा.”

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